श्रेया कुमारी:

गाँव का स्कूल और माता-पिता का योगदान

मेरा नाम श्रेया है। मैं हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले की बैजनाथ तहसील के एक छोटे से गाँव की रहने वाली हूँ। मैंने अपनी पाँचवीं कक्षा तक की शुरुआती पढ़ाई अपने गाँव के ही सरकारी स्कूल से पूरी की। पाँचवीं तक हमारे स्कूल की पढ़ाई का माहौल काफ़ी अच्छा था।

वैसे स्कूल से कहीं ज़्यादा पढ़ाई हमारी घर पर होती थी। हमारे पिताजी स्कूल में पढ़ाए गए पाठ को घर पर और भी बेहतर तरीके से हमें दोबारा समझाते और याद करवाते थे। उनके इस प्रयास से हमारी पढ़ाई बहुत अच्छी हो जाती थी। घर पर पढ़ाई के दौरान जब हम कोई गलती करते थे तो माता-पिता हमें डांटते और मार भी देते थे, ताकि हम सही से सीख सकें। सच कहूँ तो माता-पिता के द्वारा घर पर जो हमारी पढ़ाई होती थी, वह बहुत ही शानदार थी क्योंकि वे हमें शिक्षकों से भी ज़्यादा समय देते थे और बहुत प्यार से समझाते थे।

सख्त टीचर और रसोई की आंटी

अपने उस स्कूल के दिनों की मुझे दो बातें बहुत गहराई से याद हैं। पहली बात हमारी तीसरी कक्षा की है। उस समय हमारे स्कूल में एक नए टीचर आए थे। वे मुझे एक रोमांचक लेकिन डरावनी कहानी की तरह याद हैं। वे स्वभाव से बेहद खड़ूस (सख्त) किस्म के इंसान थे। जब भी वे बच्चों को गृहकार्य या कोई काम देते और बच्चे उसे पूरा नहीं कर पाते तो वे अपनी पेन को बच्चों की उंगलियों के बीच में फंसाकर ज़ोर से दबा देते थे। उस समय दर्द के मारे हम बहुत रोते थे। पता नहीं क्यों वे हमारे साथ ऐसी हरकत करते थे, लेकिन आज भी जब मुझे कहीं कोई टीचर मिलते हैं तो मुझे उनका वह व्यवहार और हमारे साथ किया गया वह बर्ताव ज़रूर याद आ जाता है।

दूसरी बात जो मुझे आज भी याद है, वह हमारे पाँचवीं तक के स्कूल की रसोई से जुड़ी है। वहाँ हमारे लिए खाना बनाने वाली एक आंटी हुआ करती थीं। वे हमें दोपहर का भोजन (मिड-डे मील) देती थीं। अगर कभी कोई बच्चा दोबारा (दूसरी बार) खाना मांगने चला जाता तो वे ज़ोर से हमारी प्लेट में ही अपनी कड़छी मारकर गुस्सा ज़ाहिर करती थीं। असल में उस समय बात यह थी कि खाना बनाने वाली जो दो आंटियाँ थीं, वे बहुत सारा खाना बचाकर अपने घर ले जाती थीं। इसी वजह से अगर बच्चे ज़्यादा खाना मांगते तो वे थोड़ा-बहुत गुस्सा करने लगती थीं। यह बात भी मेरे मन में आज तक बैठी हुई है।

इन सबके बीच हमारे स्कूल के हेडमास्टर (प्रधानाचार्य) बहुत ही भले इंसान थे। वे बच्चों को खुद भी बहुत अच्छे से और लगन के साथ पढ़ाते थे। कुल मिलाकर हमारे पाँचवीं तक के उस स्कूल में शौचालय (टॉयलेट) की सुविधा ठीक-ठाक थी व बाकी सब कुछ ठीक था।

बड़े गाँव का नया स्कूल और इंग्लिश टीचर का भेदभाव

पाँचवीं पास करने के बाद हम अपने गाँव के स्कूल को छोड़कर नीचे वाले गाँव में चले गए। वहाँ स्कूल भी काफी बड़ा था। आगे की पढ़ाई के लिए हम उसी स्कूल में जाने लगे। उस नए स्कूल की एक बात मुझे आज भी अच्छी तरह याद है। अक्सर स्कूल में जब भी कोई प्रतियोगिता (कंपटीशन) होती थी तो गाँव का स्कूल होने के कारण वहाँ कुछ गिने-चुने बच्चे ही आगे रहते थे, जो बोलने में थोड़े ठीक थे, स्कूल में थोड़े प्रचलित थे और पढ़ाई में भी अच्छे थे।

हमारे एक इंग्लिश के टीचर थे, उनका व्यवहार कुछ अजीब था। हमारी क्लास में एक ऐसा बच्चा था जो किसी इंग्लिश मीडियम स्कूल से पढ़ाई छोड़कर हमारे इस सरकारी स्कूल में आया था। वह लड़का इंग्लिश बोलने और समझने में थोड़ा ठीक था, जबकि बाकी बच्चे इंग्लिश में थोड़े ढीले (कमज़ोर) थे। इसके कारण वे टीचर क्या करते थे कि जब भी क्लास में आते तो बस उसी बच्चे से सवाल पूछते, उसी को खड़ा करते, उसी से पाठ (लेसन) पढ़वाते और सारा ध्यान उसी पर रखते थे। बाकी के बच्चों पर ध्यान देने के बजाय वे उन्हें खरी-खोटी सुनाते और गालियां तक देते थे कि तुम लोग घर पर पढ़ते नहीं हो, ध्यान नहीं देते हो।

आज जब मुझे वह बात याद आती है तो मन में यही ख्याल आता है कि काश! उन टीचर ने उस एक लड़के को छोड़कर बाकी बच्चों पर भी थोड़ा ध्यान दिया होता। वह लड़का तो पहले से ही इंग्लिश मीडियम स्कूल से पढ़कर आया था। वह तो खुद से भी अपना काम कर लेता और चीज़ों को समझ लेता। असल ज़रूरत तो उन बच्चों को थी जो इंग्लिश में थोड़े कमज़ोर या ढीले थे या जो पढ़ाई में थोड़े कम थे। उन टीचर को जितना ध्यान बाकी बच्चों पर देना चाहिए था, उन्होंने उतना ध्यान बिल्कुल नहीं दिया। मुझे लगता है कि अगर आपकी दसवीं और बारहवीं तक की पढ़ाई अच्छी हो और दसवीं तक आप सभी विषयों में थोड़े-अच्छे हों तो आगे चलकर आप किसी भी नौकरी (जॉब) या प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अच्छे से तैयार हो सकते हैं।

इतिहास की परीक्षा का वो दिन और MA तक का सफर

इसके अलावा मुझे स्कूल के दिनों की एक और बात अच्छी तरह याद है। मैं इतिहास (विषय) में बहुत अच्छी थी क्योंकि मुझे शुरू से ही इतिहास पढ़ना काफी पसंद था। एक बार जब हमारे पेपर हुए तो हमें उत्तर लिखने के लिए सप्लीमेंट्री शीट्स (अतिरिक्त कॉपियाँ) मिली थीं। उन कॉपियों को मुख्य कॉपी के साथ बांधने के लिए एक धागा दिया जाता था। मैंने भी अपना पूरा पेपर अच्छे से लिखा, सारे सवालों के जवाब दिए और सप्लीमेंट्री शीट को धागे से बांध दिया। लेकिन पता नहीं कैसे मेरे द्वारा बांधी गई वह शीट खुल गई।

जब मैडम ने हमें पेपर जांचकर वापस दिया तो उन्होंने मुझसे कहा कि मेरे 50 में से सिर्फ 24 नंबर आए हैं। मैं हैरान रह गई। इसके ठीक बाद मेरा रोल नंबर दोबारा आया तो मैडम चौंक गईं और बोलीं, यह क्या हुआ, एक ही रोल नंबर दो बार कैसे आ गया।

असल में धागा खुल जाने की वजह से मेरी अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका अलग हो गई थी और वह किसी दूसरे बच्चे के पेपर के साथ मिक्स हो गई थी। जब मैंने अपनी दोनों कॉपियों के नंबरों को आपस में जोड़ा तो मेरे कुल 50 में से 49 नंबर बन रहे थे। यह देखकर मैं बेहद खुश हुई क्योंकि इतिहास जैसे पसंदीदा विषय में इतने शानदार नंबर आना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। मुझे उस समय मिले वे अच्छे नंबर आज भी याद हैं। उसी घटना और इतिहास के प्रति मेरे इसी लगाव का नतीजा है कि आगे चलकर मैंने अपनी ग्रेजुएशन (स्नातक) की पढ़ाई और उसके बाद एम.ए. भी इतिहास विषय में ही पूरी की।

बुनियादी समस्याएँ और लड़कियों का संघर्ष

इतिहास में एम.ए. करने के बाद जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे यही लगता है कि अगर आपकी दसवीं तक की पढ़ाई अच्छी हो और किसी विषय में आपकी मज़बूत पकड़ बन जाए तो आगे की राह आसान हो जाती है।

पढ़ाई के साथ-साथ मुझे अपने उस स्कूल की एक और बात आज भी अच्छी तरह याद है, जो वहाँ की बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी है। हमारे स्कूल में जो शौचालय थे, वे करीब 3 से 4 लड़कियों के लिए और 3 से 4 लड़कों के हिसाब से बने थे। लेकिन उन शौचालयों में कभी भी पानी नहीं आता था। पानी की हमेशा दिक्कत रहती थी। प्रशासन ने वहाँ 500 लीटर की एक पानी की टंकी तो लगवा रखी थी, लेकिन उसमें कभी-कभार ही पानी आता था। अगर कभी उस टंकी में पानी आ गया तो ठीक, वरना ज़्यादातर समय वह खाली ही रहती थी। शौचालयों को बस एक बार बना कर छोड़ दिया गया था, पर रख-रखाव और पानी के अभाव में वे ऐसे ही बेकार पड़े रहते थे।

आज मुझे लगता है कि गाँव के जो सरकारी स्कूल होते हैं, वहाँ बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए बहुत ज़्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे हालातों में लड़के तो फिर भी किसी तरह बाहर चले जाते हैं, लेकिन लड़कियों के लिए यह स्थिति बहुत ज़्यादा कष्टदायक होती है। हमारे समय में शौचालयों में पानी न आने की वजह से लड़कियों को हर दिन बहुत बड़ी दिक्कत उठानी पड़ती थी।

खेल का मैदान और जातिगत भेदभाव का सामना

मुझे आज भी याद है कि हमारे स्कूल में जो शारीरिक शिक्षा के शिक्षक होते थे, वे बहुत सख्त स्वभाव के थे। वे खेलकूद में ज़्यादातर पहले से खेलते आ रहे बच्चों को ही आगे बढ़ाते थे, जो पहले से वॉलीबॉल या फुटबॉल खेलते थे। बाकी के बच्चों पर वे ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे।

लेकिन जब हमारे स्कूल में एथलेटिक्स (दौड़) की शुरुआत हुई तो शिक्षक ने सभी बच्चों को एक साथ मैदान में बुलाया। वहाँ सबका ट्रायल लिया गया और अच्छी बात यह रही कि उस ट्रायल में मेरा भी चयन हो गया। हमारी ट्रेनिंग के लिए हमारे दूसरे स्कूल से एक लड़का आया हुआ था। शिक्षक ने उसे ज़िम्मेदारी दी थी कि वह बच्चों को थोड़ी-बहुत रनिंग (दौड़) की तकनीक और अभ्यास सिखाए।

वह लड़का हमारे साथ बहुत ज़्यादा भेदभाव करता था। खासकर मेरे साथ और हमारी जाति के अन्य बच्चों के साथ उसका व्यवहार बहुत खराब था। वह एक राजपूत परिवार से था और सामान्य वर्ग (General Category) में आता था। जबकि हम एक अनुसूचित जाति (SC) परिवार से थे। हमने ज़्यादातर देखा कि वह बाकी लड़कियों से बहुत तमीज़ से बात करता था और उन्हें ज़्यादा नहीं डांटता था। लेकिन हमें वह बात-बात पर बहुत ज़्यादा डांटता रहता था। हमसे तरह-तरह की बातें कहता था और हमें मानसिक रूप से बहुत परेशान करता था।

मेहनत की जीत और भेदभाव की हार

उस लड़के के उस खराब व्यवहार के कारण आज भी अगर वह लड़का मुझे कहीं दिखाई देता है तो मेरा उससे बात करने का बिल्कुल मन नहीं करता। लेकिन हमने उस लड़के की बदतमीज़ी पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उसके बाद जब भी हमारे टूर्नामेंट हुए तो हमने बहुत जी-तोड़ मेहनत की। मुझे आज भी गर्व है कि हमारी मेहनत रंग लाई और हम स्कूल के लिए मेडल लेकर आए।

वहीं दूसरी तरफ जो लड़का जाति के आधार पर हमसे इतना भेदभाव करता था, वह आज तक कोई मेडल या ऐसी कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया और जीवन में कहीं आगे नहीं बढ़ सका। वह बस हमें परेशान करना जानता था और हमारी जाति के आधार पर हमें छोटा महसूस करवाता था। मैंने अपनी पढ़ाई और अपनी रनिंग दोनों पर अच्छे से ध्यान दिया और इसी हौसले के दम पर मैंने 12वीं की पढ़ाई बहुत अच्छी तरह पूरी की।

12वीं के बाद जब हम कॉलेज या यूनिवर्सिटी जाते हैं तो वहाँ माहौल बदल जाता है। वहाँ आपको केवल लेक्चर मिलते हैं और प्रोफेसरों को इस बात से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता कि आप पढ़ रहे हैं या नहीं या आप पास हो रहे हैं या फेल।

मेरी नज़रों में एक अच्छा स्कूल कैसा होना चाहिए

जब तक मैंने 12वीं तक की पढ़ाई की, तब तक मुझे हमारी स्कूली व्यवस्था में एक चीज़ बहुत ही गलत लगी। वह यह थी कि ज़्यादातर शिक्षक सिर्फ़ उन बच्चों को ही ज़्यादा महत्व और सम्मान देते हैं जो पहले से पढ़ने में अच्छे होते हैं। वे उन्हीं बच्चों को पकड़कर पढ़ाते हैं, उन्हीं को सारी बातें बताते हैं और उन्हीं को हर जगह आगे बढ़ाते हैं। इसके विपरीत जो बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं होता या थोड़ा कमज़ोर होता है, उसे शिक्षक ऐसे ही किनारे कर देते हैं मानो उन्होंने मान लिया हो कि ठीक है, इन्होंने तो पढ़ना ही नहीं है। वे बस क्लास में आते हैं और कमज़ोर बच्चों से कहते हैं, आप तो पढ़ेंगे ही नहीं, आप तो जीवन में कुछ नहीं करेंगे। यह रवैया बिल्कुल भी सही नहीं है।

मुझे लगता है कि शिक्षकों को सिर्फ तेज़ बच्चों के पीछे नहीं भागना चाहिए। बल्कि जो बच्चा थोड़ा कमज़ोर है या एक-दो बार में चीज़ों को नहीं समझ पाया, उस पर ज़्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। एक अच्छा स्कूल वही है जहाँ शिक्षक सभी बच्चों पर बराबर ध्यान दें।

स्कूलों में प्रतियोगिता का मतलब सिर्फ क्विज या खेल प्रतियोगिता नहीं होना चाहिए, बल्कि हर तरह की रचनात्मक (Creative) गतिविधियाँ होनी चाहिए। जो बच्चे पढ़ाई में अच्छे होते हैं, वे आगे चलकर शिक्षक या इंजीनियर बन जाते हैं। लेकिन बाकी लोग भी तो हैं जो समाज में अलग-अलग तरह के ज़रूरी काम कर रहे हैं, कोई घर बना रहा है, कोई अलमारियां बना रहा है तो कोई फर्श बना रहा है। या कोई पेंटर का काम कर रहा है, ये सभी ऐसे काम हैं जिनसे बहुत अच्छी कमाई होती है, लेकिन स्कूल के समय बच्चे इन कामों के बारे में सोच ही नहीं पाते। अगर स्कूल में इन अलग-अलग हुनरों (Skills) से जुड़ी प्रतियोगिताएं हों तो बच्चों को यह समझने में स्पष्टता होगी कि वे आगे चलकर क्या-क्या कर सकते हैं।

ज़्यादातर बच्चों को 12वीं तक यह साफ ही नहीं होता कि उन्हें आगे करना क्या है। कई बार ऐसा भी होता है कि अच्छे पढ़ने वाले बच्चे भी आगे नहीं पढ़ पाते क्योंकि उनके माता-पिता के पास पढ़ाई पर खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते। पैसों की तंगी की वजह से कई बार होनहार बच्चे पीछे रह जाते हैं। इसके अलावा कई बार बच्चा पढ़ने में तो अच्छा होता है, पर उसे 12वीं तक समझ ही नहीं आता कि उसे आगे किस क्षेत्र में जाना है। बाद में बच्चों पर चीज़ें थोप दी जाती हैं। माता-पिता कहते हैं, तुम यह कर लो, तुम वह कर लो, कॉलेज में यह पढ़ लो, शिक्षक बन जाओ या इंजीनियरिंग कर लो।

अगर 12वीं तक ही बच्चों को अपने बारे में थोड़ी स्पष्टता मिल जाए तो उनके आगे का रास्ता आसान हो सकता है। जब बच्चे किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं और उसमें जीतते हैं तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है कि नहीं, हम भी यह काम कर सकते हैं और इस क्षेत्र में आगे जा सकते हैं। इससे बच्चों का दृष्टिकोण और सोच साफ होती है। इसलिए स्कूलों में हर तरह की गतिविधियां होनी चाहिए ताकि बच्चे अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट हो सकें।

इसके अलावा मुझे लगता है कि बच्चों को स्कूल में नेतृत्व (Leadership) की भावना भी सिखानी चाहिए। ज़्यादातर स्कूलों में सिर्फ एक-दो बच्चे ऐसे होते हैं जो बोलने में अच्छे होते हैं और उन्हीं को हर मंच या कार्यक्रम में आगे कर दिया जाता है। बाकी बच्चों को उतना मौका मिल ही नहीं पाता। प्रतियोगिताओं के माध्यम से सभी बच्चों को कुछ न कुछ सिखाना चाहिए और उन्हें नेतृत्व करने का अवसर देना चाहिए। इसके लिए माता-पिता और शिक्षकों को भी इस दिशा में जागरूक होने की जरूरत है।

कुल मिलाकर स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ अंग्रेजी और गणित जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही विभिन्न प्रकार की गतिविधियों (Activities) का आयोजन होना चाहिए ताकि बच्चों की सोच और उनका दृष्टिकोण स्पष्ट हो सके। इससे बच्चे आगे चलकर जिंदगी की राह में भटकेंगे नहीं कि उन्हें क्या करना चाहिए था और उन्होंने क्या नहीं किया। बल्कि वे स्कूल के समय से ही अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट और आत्मविश्वासी रहेंगे और जीवन में कुछ बहुत अच्छा मुकाम हासिल कर सकेंगे।

Author

  • श्रेया, हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वर्तमान में श्रेया अपनी ग्रेजुएशन कर रही हैं और पिछले एक साल से क्षेत्रीय संगठन से जुड़कर काम भी कर रही हैं।

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