विलास भोंगाडे:
मेरी प्राथमिक शिक्षा जिल्हा परिषद प्राथमिक शाळा में हुई। सातवी कक्षा तक थी। याने सात वर्ग खोलियाँ थीं। एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात थे। पुराने घर जैसी कक्षा थी। दोनों तरफ डोम थे। पीछे और सामने एक खोली थी। डाये-बाये तरफ बहुत बड़ा मैदान था। एक तरफ वॉशरूम था। लड़की के लिये और लड़के के लिये भी। मैदी (बागड) शाळा को कंपाऊंड था। स्कूल बहुत अच्छी देखने में लगती थी। मैदान में कवायत (ड्रिल), खो-खो, कबड्डी, गलोरी, फुटबॉल खेळे जाते थे। और एक बाजू में परसबाग (सब्जियों की बगिया) थी। मेथी, पालक, संभार, चवळी भाजी, काकडी की वेली, कोहळी इत्यादी सब्जियाँ लगाई जाती थीं। वह गाँव में जाकर बेची जाती थी। उस पैसे से सामूहिक कार्यक्रम होते थे। हर सप्ताह में सरस्वती पूजन होता था। हर साल सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। स्कूल की ड्रेस खाकी पैंट और सफेद हाफ शर्ट थी। लड़कियाँ निळा स्कर्ट पहनकर आती थीं। शिक्षक पुरुष थे। वे सफेद खादी का शर्ट, धोतर व पायजमा पहनते थे और टोपी पहनते थे। स्कूल के सामने इमली के पेड़ थे। इसलिए सावली (छाँव) में ठंडावा (ठंडक) रहता था।
छटवी व सातवी कक्षा के लिये बैठने के लिये टेबल रहते थे। बाकी कक्षा के विद्यार्थी नीचे बैठते थे, लेकिन चटई (चटाई) रहती थी। स्कूल में सुबह प्रार्थना होती थी। शाम को भी प्रार्थना होकर सुट्टी होती थी।
स्कूल में मराठी बालभारती, गणित, नागरिकशास्त्र, शिवाजी महाराजांचा इतिहास, इंग्लिश, हिंदी, भूगोल पढ़ाया जाता था। पहली क्लास में अ, आ, इ, ऊ, क, ख, ग, घ, बाराखडी (वर्णमाला के अक्षरों की क्रमबद्ध जोड़ियाँ) पढ़ाई जाती थी। गल्लत (गलती) हो गई तो पीठ पर थप्पड़ पड़ती थी। या तो छड़ी हाथ पर पड़ती थी। अक्षर पर लक्ष (ध्यान) केंद्रित किया जाता था। सुंदर अक्षर के लिये बक्षीस (इनाम) या प्रोत्साहन मिलता था। शिक्षक के हाथ में रूल या तो शिंदी के पेड़ की छड़ी रहती थी। “छडी खाय झम झम, विद्या येई घम घम” ऐसी कहावत थी। शिक्षक प्रेमळ (स्नेही) थे। लेकिन डर था। आवाज बुलंद था व करारी था। हसने की भी और रोने की भी मुभा (छूट) थी। शिक्षक को विद्यार्थी को मारने का डर नहीं था। पालक (माता-पिता) तक्रार (शिकायत) लेकर नहीं आते थे। शिक्षक कथाकथन पद्धती (कहानी सुनाने की पद्धति) या गोष्टी स्वरूप (कहानी के रूप में) में पढ़ाते थे। कथा बताते थे, उससे रुची (दिलचस्पी) बढ़ती थी। हावभाव करते थे। किसी राजा, किसी कथा की कहानी बताकर पढ़ाते थे। मराठी भाषा, शब्द, शब्द अर्थ समझने में मजा आती थी। कविता के पीरियड में मजा आती थी। कभी हँसी भी होती थी।
विद्यार्थी को कभी नदी पर लेकर जाते थे या कभी खेती देखने लेकर जाते थे। इससे पानी का बहना व खेती कैसी की जाती है, बीज कैसे लगाए जाते हैं, यह समझ में आता था। कपास, ज्वारी, मूग, वारूळ (चींटियों का बना मिट्टी का टीला), गेहूँ, चना, जवस (अलसी), तील (तिल), भाजीपाला (सब्जियाँ), पीक (फसल) समझने आया।
आज के विद्यार्थी को यह सब मालूमात (जानकारी) नहीं। पेड़ जानते नहीं। फल नीचे लगता है या ऊपर लगता है, पता नहीं। एक इंग्लिश स्कूल में जाने वाला बच्चा बोला था, गाजर ऊपर पेड़ को लगते थे। मुझे बहुत हँसी आयी। यह समझ आज इंग्लिश स्कूल में जाने वाले बच्चे को पता नहीं। पेड़, पत्ते, फल, बीज मालूम नहीं। स्कूल की परीक्षा चौथी व सातवी कक्षा की बोर्ड की परीक्षा रहती थी। यह गाँव से दूर गाँव में रहती थी। वहाँ जाकर दूसरे के घर में रहना पड़ता था। अभ्यास (पढ़ाई) करना पड़ता था। खेळ (खेल), नाटक की प्रॅक्टिस करवा लेते शिक्षक। पौराणिक कथा पर या शिवाजी महाराज पर नाटक बिठाकर गाँव में प्रदर्शन करते थे। शिक्षक गाँव के परिसर (आसपास के इलाके) में घूमकर बच्चे की पढ़ाई के बारे में देखते थे। पालक को पूछते थे। आज ऐसा कुछ दिखता नहीं। यह स्कूली व्यवस्था में बदलाव दिखता है।
पहले स्कूल में चपराशी रहता नहीं था। विद्यार्थी साफ-सफाई, पानी लाने का काम करते थे। स्वतंत्र दिन, गणराज्य दिन को स्कूली मैदान सजाया जाता था। रांगोळी (फर्श पर बनाई जाने वाली रंगीन आकृति) की रेषा (रेखाएँ), गांधी का फोटो, तोरण (सजावटी बंदनवार), प्रभात फेरी होती थी। शिक्षक, सरपंच मार्गदर्शन करते थे। प्रसाद बाँटा जाता था।
विद्यार्थी को स्कुली किताबें लेनी पड़ती थीं। वही, पेन (टाक, शाई वाला), पेन्सिल, कंपास लेते थे। किसी का यह दप्तर (स्कूल बैग) पूरा नहीं होता था। गरीब बच्चे थे। पीरियड वाइज किताबें थैली में डालकर जाते थे। आज तो बॅग आ गया। गुरुकिल्ली (मुख्य सूत्र / कुंजी) रहती थी। आज तो विद्यार्थी स्कूल में जाते ही नहीं। आज पैसे बिगर (बिना पैसे) कुछ नहीं होता। स्कूल के सामने गोळी, बिस्कीट, बेर की छोटी दुकान रहती थी। आज तो अलग खाणे-पिने (खाने-पीने) की दुकानें दिखती हैं। आज गाँव के स्कूल में बच्चे नहीं मिलते। जिल्हा परिषद, महानगर पालिका की स्कूल बंद हो रही हैं। स्कूल है तो शिक्षक नहीं। गाँव में शिक्षक रहता नहीं। सात कक्षा के लिये अभी एक ही शिक्षक दिखता है। शिक्षक के बच्चे स्कूल में रहते थे। आज नहीं दिखते। शहर में भी ऐसी स्थिति है।
स्कूल में नियमित बच्चे होना चाहिए। पूरे शिक्षक हों। शिक्षक अभ्यास करने वाले हों। स्कूल में परसबाग (सब्जियों की बगिया) हो, मैदान हो। स्कूल साफ-सुथरी हो। स्कूल के टीचर का अवांतर वाचन (अतिरिक्त पठन), इतिहास मालूम हो, सादरीकरण (प्रस्तुति) अच्छा हो। वॉशरूम, पानी की व्यवस्था हो। खेल-कूद, गाणी (गाने), नृत्य, नाटक, एकपात्री प्रयोग (एक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अभिनय) शिकाये जाएँ। खेल-कूद का वातावरण हो। निसर्ग (प्रकृति), खेत, हरियाली, बँक का नॉलेज देना चाहिए। इंग्लिश के साथ मातृभाषा (माँ की भाषा) का अभ्यास हो। नये तंत्र (नई तकनीक) पढ़ाये जाएँ। स्वावलंबी शिक्षा हो। जिसमें विद्यार्थी की रुची हो। आनंद मिले। स्कूल का आनंद मिले। पढ़ाई और होमवर्क में आनंद मिले। स्कूल का वातावरण आनंददायी हो। तभी कुछ नया बदलाव आएगा। “महात्मा फुले म्हणतात त्याप्रमाणे स्त्री पुरुष कष्टकरी व्हावे आणि कुटुंब पोसावे आनंदाने.” शिक्षण असे असावे की, काम आणि कार्य याचा सन्मान हो। मनुष्य का सन्मान करने वाली शिक्षा नीति हो। मनुष्य जोड़ने वाली शिक्षा नीति हो। निसर्ग (प्रकृति) और मनुष्य का संघर्ष एक समान है। उसे समझने वाली शिक्षा नीति हो। स्त्री पुरुष समान समझने वाली शिक्षा नीति हो। गरीब श्रीमंत (गरीब-अमीर) भेद करने वाली शिक्षा नीति ना हो। जाती भेद (जाति का भेद) करने वाली शिक्षा नीति ना हो। पृथ्वी की उत्पत्ती (उत्पत्ति), मानव की उत्पत्ती (उत्पत्ति), निसर्ग (प्रकृति) और श्रम (मेहनत) समझने वाली शिक्षा नीति हो। तब कहीं शिक्षा पूरी होगी। मानव का विकास और देश का विकास होगा।

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