प्रेरणा:
“बेटियाँ केवल अपने भविष्य की राह नहीं बनातीं, वे पूरे समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती हैं।”
बालिकाओं को शिक्षा और अपने अधिकारों की समझ मिले, बालिकाओं को शिक्षा और अपने अधिकारों की समझ मिले, तो वे अपने जीवन और आसपास के समाज में बदलाव की पहल कर सकती हैं। इसी सोच के साथ चित्तौड़गढ़ ज़िले की भदेसर तहसील के अमरपुरा गाँव में आधारशिला शिक्षण केंद्र के माध्यम से काम किया जा रहा है।
आधारशिला से जुड़ी सभी बालिकाएँ सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत हैं। आधारशिला उनके विद्यालय का स्थान नहीं लेता, बल्कि विद्यालयी शिक्षा के साथ उन्हें ऐसा वातावरण प्रदान करता है, जहाँ वे अपने अधिकारों, ज़िम्मेदारियों, संविधान, नेतृत्व और सामाजिक सरोकारों को समझ सकें।
यहाँ विशेष रूप से आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर परिस्थितियों से आने वाली बालिकाओं के साथ कार्य किया जाता है। कई बालिकाओं के परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, कुछ बालिकाएँ घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण शिक्षा से दूर होने की स्थिति में रही हैं। आधारशिला उन्हें शिक्षा से जोड़े रखने के साथ-साथ आत्मविश्वासी और जागरूक नागरिक बनने के लिए तैयार करता है।
संविधान की समझ और साथ मिलकर सीखना
आधारशिला की एक महत्वपूर्ण पहल संविधान की समझ विकसित करना है। यहाँ जुड़ी बालिकाएँ संविधान की उद्देश्यिका को पढ़ती और समझती हैं। उन्हें समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता जैसे संवैधानिक मूल्यों के बारे में जानकारी दी जाती है।
बालिकाओं को केवल पढ़ाया नहीं जाता, बल्कि उन्हें अपनी बात रखने, प्रश्न पूछने, निर्णय लेने और सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर भी दिए जाते हैं। आधारशिला में बालिकाओं को अलग-अलग समूहों में संगठित किया गया है। इन समूहों के नाम कल्पना चावला, पी.टी. उषा, रानी लक्ष्मीबाई और कालीबाई जैसी प्रेरणादायक महिलाओं के नाम पर रखे गए हैं।
बालिकाएँ इन समूहों में मिलकर कार्य करती हैं। जो बालिकाएँ किसी विषय को अच्छी तरह समझती हैं, वे अपनी साथी बालिकाओं को सिखाती हैं। कबीर के दोहे, गीत, सामान्य ज्ञान के प्रश्नोत्तर, संविधान, सामाजिक मुद्दे और संगठन में मिलकर कार्य करने जैसी गतिविधियों के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
40 गाँवों में संविधान और बाल अधिकारों का संदेश
आधारशिला से जुड़ी बालिकाओं ने संविधान और बाल अधिकारों से जुड़े विषयों पर 40 गाँवों में नाटक प्रस्तुत किए। इन नाटकों के माध्यम से ग्रामीण समुदाय को संविधान, समानता, बाल विवाह, शिक्षा और बालिकाओं के अधिकारों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया।
इन प्रस्तुतियों की खास बात यह रही कि संदेश देने वाली कोई बाहरी टीम नहीं, बल्कि गाँव की अपनी बालिकाएँ थीं। उन्होंने स्वयं तैयारी की, संवाद सीखा और गाँव-गाँव जाकर लोगों के सामने अपनी बात रखी। इससे बालिकाओं में नेतृत्व, अभिव्यक्ति और सार्वजनिक रूप से बोलने का आत्मविश्वास विकसित हुआ।
अब गाँव की दूसरी बेटियों तक पहुँचा रही हैं शिक्षा का संदेश
आधारशिला से जुड़ी बालिकाएँ अपने गाँव में जाकर उन बालिकाओं से भी संपर्क करती हैं, जो किसी कारण से विद्यालय नहीं जा रही हैं। वे उन्हें शिक्षा के महत्व के बारे में समझाती हैं और पुनः विद्यालय से जोड़ने का प्रयास करती हैं। इस पहल में गाँव की महिलाएँ भी जुड़ रही हैं।
कुछ बालिकाएँ अपने ही गाँव में किशोरियों के साथ काम कर रही हैं और रात्रि पाठशाला चला रही हैं। जो लड़कियाँ स्कूल से ड्रॉपआउट हो गई हैं, उनको वापस जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
इन बालिकाओं ने 3 साल पहले अपना स्कूल छोड़ दिया था, पर स्कूल में इनका नामांकन बना हुआ था। इन बालिकाओं को अपने साथ जोड़कर वापस इनका स्कूल जाना शुरू करवाया। अब इनको पढ़ाई करना बहुत अच्छा लगता है, पर यह कहती हैं, “हमारे माता-पिता हमें पढ़ने नहीं देते हैं। वह कहते हैं कि तुम पढ़ने जाओगी तो गाय, भैंस, बकरी चराने कौन जाएगा, घर का काम कौन देखेगा और छोटी बहन-भाइयों को कौन रखेगा।”
तो उन्होंने कहा कि आप हमारे माता-पिता से बात करो ना, हम स्कूल से आकर घर का काम करेंगे और फिर रात को पढ़ाई करेंगे। और यह भी बोलती हैं कि हमें जरूरत की सामग्री, जैसे कॉपी-किताब, हमारे मम्मी-पापा नहीं दिला सकते, तो आप दिलाना। तो यह एक नई शुरुआत और एक नई पहल है।
शिक्षा से बदलाव की ओर: पूजा की कहानी
मेरा नाम पूजा मीणा है। गाँव का नाम शिवपूरी है, जो कि धरियावाद तहसील के प्रतापगढ़ ज़िले में आता है और राज्य राजस्थान है। हम 5 भाई-बहन हैं। पापा मजदूरी करते हैं और माँ घर का काम करती हैं।
गाँव में शिक्षा के अभाव के कारण गाँव के लोगों को शिक्षा का महत्व पता नहीं होता। गाँव के स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है और बच्चों पर उतनी मेहनत नहीं की जाती, जितनी मेहनत करनी चाहिए। गाँव में अधिकतर बालिकाओं का बालविवाह हो जाता है। किसी की आर्थिक स्थिति खराब होती है। कई बालिकाओं को घरेलू कार्यों में बाँधकर रखा जाता है और घर तक सीमित रखा जाता है। इस वजह से कुछ बालिकाएँ शिक्षा से वंचित रह जाती हैं।
और सबसे बड़ी बात कि गाँव में पढ़ने का माहौल नहीं होता। बालिकाओं को अगर स्कूल भेजते हैं तो भी वापस घर आकर पढ़ाई नहीं हो पाती है, तो वह शिक्षा से जुड़ नहीं पाती हैं। उनमें एक डर-सा रहता है। वो अपनी बात कहीं पे नहीं रख सकती हैं और कहीं बोल नहीं सकती हैं। यह सब कमी उनमें रह जाती है।
मेरे गाँव की एक बालिका नारायणी मीणा आधारशिला में पढ़ती थी। मैं उससे प्रेरित होकर 2014 में आधारशिला से जुड़ गई। जब मैं गाँव से यहाँ आई, मुझे कुछ नहीं आता था। मैं पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती थी।
आधारशिला से जुड़ने के बाद मैंने पढ़ना-लिखना सीखा और धीरे-धीरे अपने अंदर का डर कम हुआ। यहाँ मुझे अपनी बात रखने, बोलने और लोगों के सामने खड़े होकर अपनी बात कहने का हौसला मिला। गीत, कविता और अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मुझे अपने अधिकारों और ज़िम्मेदारियों को समझने का अवसर मिला।
आज मैं चाहती हूँ कि जिस तरह आधारशिला ने मुझे शिक्षा से जोड़े रखा, उसी तरह मैं अपने जैसे कई बालिकाओं को तैयार करूँगी, जो गाँव में स्कूल नहीं जाती हैं, उनको स्कूल से जोड़ूँगी।
मैं उन कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाऊँगी, जिनसे बालिकाओं की ज़िंदगी बरबाद होती है। मैं बालविवाह नहीं करूँगी और बालिकाओं के लिए आदर्श बनूँगी। उनको भी ऐसे ही मोटिवेशन दूँगी, जैसे मुझे मेरे गुरूजनों ने दिया और शिक्षा से जोड़े रखा।
संघर्ष से आगे बढ़ने तक: शिक्षा के साथ आशा की यात्रा
आर्थिक परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हौसला मजबूत हो और शिक्षा का साथ मिल जाए, तो आगे बढ़ने के रास्ते खुल सकते हैं। ऐसी ही कहानी है आशा की, जो सीमित संसाधनों वाले परिवार से होने के बावजूद अपनी मेहनत और लगन के साथ लगातार आगे बढ़ रही है।
आशा अपने परिवार के साथ गाँव में रहती है। उसके पिता मजदूरी का काम करते हैं, जिससे परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं। माँ भी घर के काम के साथ परिवार की ज़िम्मेदारियों में सहयोग करती हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद आशा ने पढ़ाई को कभी अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।
शिक्षा शिविर ने दिखाई नई राह
आशा वर्ष 2015 में आधारशिला शिक्षा शिविर से जुड़ी। उस समय उसके सामने पढ़ाई जारी रखने को लेकर कई चुनौतियाँ थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति और स्कूल की दूरी के कारण उसकी शिक्षा प्रभावित हो रही थी। लेकिन आधारशिला शिक्षा शिविर से जुड़ने के बाद उसे पढ़ाई के साथ-साथ विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर मिला।
शिविर में उसने संगीत, नृत्य, कंप्यूटर, सिलाई-कढ़ाई और नाटक जैसी गतिविधियों में हिस्सा लिया। इन गतिविधियों ने उसके आत्मविश्वास को बढ़ाया और लोगों के सामने अपनी बात रखने का साहस दिया।
आशा ने शिक्षा को लेकर अपनी मेहनत जारी रखी और आगे बढ़ते हुए कक्षा 10 में 67 प्रतिशत तथा कक्षा 12 में 77.8 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। यह उपलब्धि उसके लिए ही नहीं, बल्कि उसके परिवार और गाँव के लिए भी गर्व की बात बनी।
अजीम प्रेमजी छात्रवृत्ति बनी सहारा
आगे की पढ़ाई के लिए आर्थिक समस्या उसके सामने फिर एक बड़ी चुनौती थी। इसी दौरान उसे अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की छात्रवृत्ति मिली। छात्रवृत्ति के माध्यम से उसे उच्च शिक्षा जारी रखने में मदद मिली।
इसी संघर्ष को जारी रखते हुए उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी है। आशा, आधारशिला से अभी भी जुड़ी हैं और बी.ए. द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही हैं।
इन बालिकाओं की कहानियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन इन सभी में शिक्षा से जुड़ने, अपनी बात रखने और अपने जीवन को लेकर निर्णय लेने की कोशिश दिखाई देती है। आधारशिला से जुड़कर कुछ बालिकाएँ अपनी पढ़ाई जारी रख रही हैं, तो कुछ दूसरी लड़कियों को स्कूल और पढ़ाई से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं।
अमरपुरा की इन बालिकाओं की सीख और कोशिशें अभी जारी हैं। उनके लिए शिक्षा केवल स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों को समझने, अपनी बात रखने और अपने आसपास की दूसरी बालिकाओं तक पहुँचने का माध्यम भी बन रही है।

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