फुलेश्वर ऋषि:
मेरा नाम फुलेश्वर है। मैं बिहार के कटिहार ज़िला के बरारी प्रखंड के सिक्कट पंचायत के एक छोटे से गाँव में रहता हूँ। यहाँ पर, ज़्यादातर दलित, ओबीसी जाति के लोगों का जीवन कभी खेती और मज़दूरी पर निर्भर था। उनके पास अपनी ज़मीन नहीं थी, इसलिए वे गाँव के बड़े किसानों के खेतों में मज़दूरी करते थे। बारिश अच्छी होती तो कुछ महीने काम मिल जाता, लेकिन बाकी समय परिवार का पालन-पोषण करना मुश्किल हो जाता था। फिर भी लोग गाँव में रहते थे। और गाँव में ही किसी तरह गुजारा हो जाता था।
लेकिन अब खेती से उतनी आमदनी नहीं होती। मज़दूरी के अवसर भी कम हो गए हैं। पहले लोग धान, मक्का, गेहूँ, सरसों की फसलों को हाथ से कटाई करते थे। लेकिन पिछले 7-8 सालों से फसलों की कटाई मशीन से करने लगे हैं, जिसके चलते गाँव में बढ़ती महँगाई और रोज़गार की कमी ने लोगों को गाँव छोड़कर दूसरे राज्य में काम करने के लिए मजबूर कर दिया।
हर साल कई लोग परिवार छोड़कर जाते हैं, तो कई लोग परिवार समेत अपने गाँव से सैकड़ों किलोमीटर दूर पंजाब और दिल्ली जैसे शहरों में मज़दूरी करने जाते हैं। वहाँ वे निर्माण कार्य और फैक्ट्रियों में काम करते हैं। शहर में काम तो मिल जाता है, लेकिन परिवार से दूर रहने का दर्द हमेशा बना रहता है। जिनके पत्नी और बच्चे गाँव में ही रहते हैं, वहाँ बच्चों की पढ़ाई और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ खासकर महिलाओं के कंधों पर होती हैं। समय पर पैसा न होने से कितने बच्चों की पढ़ाई छूट रही है, कई लोगों का समय पर इलाज न होने से 40-45 के उम्र में ही मृत्यु हो रही हैं।
पलायन ने लोगों की ज़िंदगी बदल दी है। अब गाँव में पहले जैसी रौनक नहीं रही। युवा रोज़गार की तलाश में बाहर चले जाते हैं। खेती पीछे छूटती जा रही है और गाँव का सामाजिक जीवन भी बदल रहा है।
फिर भी, मेरे मन में एक उम्मीद है। सभी के बच्चे पढ़ें, अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और उन्हें मज़दूरी और पलायन की कठिन ज़िंदगी न जीनी पड़े। यह कहानी केवल मेरे गाँव की नहीं, बल्कि बिहार के हज़ारों ग्रामीण परिवारों की कहानी है, जो खेती, मज़दूरी, पलायन और बदलते ग्रामीण जीवन के बीच संघर्ष और उम्मीद के साथ अपना भविष्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

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