जीवतलाल परमार:
दक्षिण राजस्थान का आदिवासी अंचल अपनी समृद्ध संस्कृति, प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव और पारंपरिक कृषि व्यवस्था के लिए सदियों से जाना जाता रहा है। यहाँ खेती केवल अन्न उत्पादन का साधन नहीं थी, बल्कि जीवन-दर्शन, आस्था, सामुदायिक सहयोग और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव भी थी। खेती का प्रत्येक चरण किसी न किसी परंपरा, लोकविश्वास और सामाजिक मूल्य से जुड़ा हुआ था।
बरसात की पहली बूंदें गिरते ही गाँवों में खेती की तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। खेत में हल उतारने से पहले बैलों को नहलाकर सजाया जाता, उनकी पूजा की जाती और हल को भी श्रद्धापूर्वक पूजकर कृषि कार्य का शुभारंभ किया जाता था। आदिवासी समाज की एक महत्वपूर्ण परंपरा यह रही है कि यह शुभ अनुष्ठान घर की एक कुंवारी कन्या के हाथों संपन्न कराया जाता था। यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं था, बल्कि नई सृष्टि, समृद्धि और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता था।
उस समय खेती पूरी तरह देशी बीजों पर आधारित थी। कोदरा, कुरी, बटी धान, देशी मक्का, उड़द, कलती, तुअर, मूंग जैसी अनेक पारंपरिक फसलें प्रत्येक किसान के घर में उपलब्ध रहती थीं। किसान स्वयं अपने खेतों से उत्तम बीजों का चयन करता था और उन्हें पारंपरिक तरीकों से सुरक्षित रखता था। मिट्टी के कोठार, मटके, बाँस की टोकरियाँ, राख, नीम की पत्तियाँ और स्थानीय ज्ञान पर आधारित अनेक विधियाँ बीज संरक्षण का हिस्सा थीं। यही कारण था कि किसान बीज के लिए किसी बाजार का मोहताज नहीं था। हर मौसम के लिए आवश्यक बीज उसके अपने घर में सुरक्षित रहते थे।
यह व्यवस्था केवल आत्मनिर्भर कृषि का उदाहरण नहीं थी, बल्कि जैव विविधता और खाद्य सुरक्षा की भी मजबूत नींव थी। देशी बीज स्थानीय जलवायु के अनुकूल होते थे, कम संसाधनों में भी अच्छी पैदावार देते थे और सूखा तथा विपरीत मौसम जैसी परिस्थितियों का सामना करने में अधिक सक्षम होते थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि इन बीजों के साथ किसानों की पीढ़ियों का अनुभव और लोकज्ञान भी सुरक्षित रहता था।
लेकिन समय के साथ आधुनिक कृषि व्यवस्था ने ग्रामीण जीवन में व्यापक परिवर्तन किए। संकर बीजों, रासायनिक उर्वरकों और बाजार आधारित खेती ने पारंपरिक कृषि प्रणाली को पीछे धकेल दिया। आज अधिकांश किसान हर वर्ष बीज खरीदने के लिए बाजार पर निर्भर हैं। इसके साथ ही खेती से जुड़े अनेक रीति-रिवाज, लोकाचार और सांस्कृतिक परंपराएँ भी धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। नई पीढ़ी का बड़ा वर्ग इन परंपराओं के महत्व और उनके वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक पक्ष से अनभिज्ञ है।
फिर भी दक्षिण राजस्थान के कुछ गाँवों में आज भी इन परंपराओं के जीवंत प्रमाण मिलते हैं। कुछ परिवार देशी बीजों का संरक्षण कर रहे हैं और खेती की पुरानी पद्धतियों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। ये प्रयास केवल कृषि को बचाने के नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और लोकविरासत को सुरक्षित रखने के प्रयास हैं।

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