गिरीश कुमार:
छत्तीसगढ़ को लंबे समय से “धान का कटोरा” कहा जाता रहा है। यह पहचान जहाँ एक ओर धान के अधिक उत्पादन को दर्शाती है, वहीं दूसरी ओर समृद्ध कृषि परंपरा, स्थानीय बीजों की विविधता और प्रकृति के अनुरूप विकसित होती खेती की संस्कृति के आधार को भी व्यक्त करती है। विशेषकर उत्तर छत्तीसगढ़ (सरगुजा संभाग) के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कृषि न केवल जीविकोपार्जन का साधन रही है, बल्कि स्थानीय ज्ञान, संस्कृति और जैव विविधता का महत्वपूर्ण आधार भी रही है।
कुछ दशक पहले तक यहाँ के किसान अपनी जलवायु और मिट्टी के अनुकूल विकसित स्थानीय (लोकल) धान की अनेक किस्मों की खेती करते थे, जैसे केशर, छिनमौरी, श्रीकवल, दुबराज, जीराफूल, सफरी, बिश्नी, कलिंगा, करहन्नी, विष्णुभोग, सोनम, लोहंदी आदि। ऐसी दर्जनों पारंपरिक किस्में गाँवों में सामान्य रूप से बोई व उगाई जाती थीं। इन धानों की विशेषता यह थी कि ये अपेक्षाकृत कम वर्षा में भी अच्छी तरह तैयार हो जाते थे तथा रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर नहीं थे। गोबर की खाद और पारंपरिक कृषि पद्धति ही इनके लिए पर्याप्त होती थी।
स्थानीय ग्रामीण आदिवासी समाज की खाद्य सुरक्षा का आधार धान के अलावा खेतों में कुर्थी (कुल्थी) दाल की खेती भी होती थी, जबकि बारीक अनाजों में मेडो, मंझरी, सावां, कोदो, कुटकी, रमतिल्ला आदि जैसे पतले अनाज (मिलेट्स) भी भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। ये फसलें कम पानी में भी आसानी से तैयार हो जाया करती थीं। पौष्टिकता के साथ-साथ यह स्थानीय कृषि व्यवस्था को संतुलित बनाए रखने में भी मददगार थीं।
किन्तु पिछले लगभग पंद्रह–सोलह वर्षों में क्षेत्र का कृषि परिदृश्य तेजी से बदला है तथा बदलाव अब भी जारी है। सरकार व निजी बीज कंपनियों द्वारा उन्नत एवं संकर (हाईब्रिड) धान बीजों के आकर्षक प्रचार-प्रसार तथा स्थानीय दुकानदारों के माध्यम से निजी बीज कंपनियों के उत्पाद गाँव-गाँव तक पहुँचने के बाद किसानों ने बड़े पैमाने पर हाईब्रिड धान की खेती अपनाना शुरू कर दिया है। स्थानीय कृषि विभाग व अन्य निजी दुकानों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के हाईब्रिड बीज आदिवासी क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध होने लगे हैं, जिससे पारंपरिक, लोकल या स्थानीय बीजों की खेती धीरे-धीरे सिमटती जा रही है या लगभग समाप्त हो चुकी है। आज स्थिति यह है कि अनेक गाँवों में पुराने स्थानीय धानों की खेती लगभग समाप्ति के कगार पर पहुँच गई है। वहीं नई व युवा पीढ़ियों में भी अपने पुराने स्थानीय बीजों के प्रति किसी प्रकार का आकर्षण या लगाव का अभाव नज़र आता है। स्थिति यह है कि वे अपने स्थानीय धान बीजों के नाम से भी अब अनभिज्ञ दिखाई देते हैं।
आज कृषि परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण ‘उत्पादन’ है। किसानों का अनुभव है कि जहाँ पारंपरिक धान की उपज अपेक्षाकृत कम होती थी, वहीं हाईब्रिड धान से तीन से चार गुना तक अधिक उत्पादन प्राप्त होने लगा है। इससे परिवार के भोजन की आवश्यकता तो पूरी होती ही है, साथ-साथ अतिरिक्त धान को सरकारी उपार्जन केंद्रों (मंडियों) में बेचकर नकद आय अर्जित करना भी संभव हुआ है।
उल्लेखनीय है कि जब स्थानीय धानों की खेती प्रमुख रूप से की जाती थी, तब अधिकांश क्षेत्रों में सरकारी धान खरीदी की व्यवस्था भी नहीं थी। स्थानीय ग्रामीण समुदाय अपने अतिरिक्त धान से तैयार चावल को स्थानीय बाजारों में सीधे बेचा करते थे।
हालांकि, वर्तमान में हाईब्रिड बीज से अधिक उत्पादन के साथ नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। हाईब्रिड धान की खेती रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर मानी जाती है। किसानों के अनुसार, इसकी बुआई से पहले खेती की जमीन में डीएपी और यूरिया का प्रयोग करना लगभग आवश्यक हो गया है। फसल तैयार होने के दौरान भी कीट एवं रोग नियंत्रण के लिए विभिन्न रासायनिक दवाओं का उपयोग निरंतर करना पड़ता है। जबकि इसके विपरीत स्थानीय धान की खेती गोबर खाद और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के सहारे ही बिना भारी-भरकम लागत के सफलतापूर्वक की जाती थी तथा तैयार चावल का स्वाद व खुशबू भूख के साथ मन को भी तृप्त करने वाली होती थी।
आज हाईब्रिड धान उत्पाद के भंडारण के स्तर पर भी किसानों ने महत्वपूर्ण बदलाव महसूस किया है। ग्रामीणों का कहना है कि हाईब्रिड धान को घरों में संग्रहित करने के कुछ समय बाद ही उसमें एक विशेष प्रकार का कीट लग जाना आम घटना है। स्थानीय बोली में इस कीट को “पिपली” कहा जाता है। यह कीट धीरे-धीरे धान के भीतर के चावल को चूस लेते हैं या नष्ट कर देते हैं। इससे बचाव के लिए भंडारित धान में भारी रासायनिक दवाओं का उपयोग करना पड़ता है। इसके विपरीत पुराने स्थानीय धानों को कई वर्षों तक बिना किसी रासायनिक दवा के सुरक्षित रखा जाता था और उनमें इस प्रकार की समस्या न के बराबर देखने को मिलती थी।
इसी प्रकार मोटे, पतले या बारीक अनाजों की खेती भी लगभग समाप्त होती जा रही है या कहीं-कहीं एक्का-दुक्का किसान ही इसकी खेती करते दिखाई देते हैं।
हाईब्रिड धान बीज से अधिक उत्पादन और सरकारी खरीद की सुविधा मिलने से किसानों का झुकाव लगभग पूरी तरह संकर धान की ओर हो गया है। परिणामस्वरूप मेडो, मंझरी, सावां, कोदो, कुटकी, रमतिल्ला आदि जैसी पारंपरिक फसलों के बीज धीरे-धीरे गाँवों से लुप्त होने लगे हैं। आज अनेक युवा किसान इन फसलों के नाम तक भूलने लगे हैं, जबकि कभी यही स्थानीय खाद्य संस्कृति और पोषण लोगों की आजीविका व सुरक्षा का आधार हुआ करते थे।
बाज़ारवादी कृषि संस्कृति ने न केवल पारंपरिक खेती की तकनीकों को बदला है, बल्कि कृषि जैव विविधता, स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और खाद्य संस्कृति के क्षरण के साथ-साथ कृषि भूमि और जल को भी लगातार विषाक्त बनाया है।
खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से अधिक उत्पादन और आर्थिक लाभ निश्चित रूप से किसानों के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके साथ-साथ स्थानीय बीजों का संरक्षण, पारंपरिक फसलों का पुनर्जीवन और टिकाऊ व स्वास्थ्य-सुरक्षित कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना भी उतना ही आवश्यक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि स्थानीय धान की पारंपरिक किस्मों और मोटे, पतले या बारीक अनाजों का वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए। इन फसलों के उत्पादन के लिए किसानों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही, गाँव स्तर पर सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए जाएँ, किसानों को देशी बीजों के संरक्षण के लिए सहयोग दिया जाए और इनके पोषण, जलवायु-अनुकूलता तथा जैव विविधता में योगदान को नीति निर्माण का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
यदि समय रहते इस दिशा में उचित प्रयास नहीं किए गए, तो उत्तर छत्तीसगढ़ की समृद्ध विविध खाद्य बीजों की पारंपरिक कृषि विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल दुखद स्मरण और इतिहास बनकर रह जाएगी।












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