जितेन्द्र तबियाड:
मैं बहुत ही गरीब परिवार में, एक छोटे से गाँव डेडली आसियाबाद, ज़िला डूंगरपुर, राजस्थान में पला-बढ़ा हूँ। मुझे पढ़ने का बहुत जुनून था। मैं हमेशा से पढ़ाई और खेलों में ध्यान देता था। दूसरी क्लास में मुझे कबड्डी खेल के बारे में सिखाया गया। फिर हमारी टीम लगातार खेलों में हिस्सा लेने लगी। हमारा खेल के प्रति प्रेम और जुनून और बढ़ता गया। धीरे-धीरे हमारा ग्राम पंचायत स्तर से लेकर ज़िला स्तर पर सिलेक्शन होने लगा। फिर मेरा स्टेट लेवल पर सिलेक्शन हुआ, लेकिन मैं बहुत बीमार रहा, जिसकी वजह से मेरी पढ़ाई और खेल दोनों छूट गए। मैं अंदर से बहुत टूट गया था। जो मेरा एक सपना था, कबड्डी प्लेयर बनने का और देश स्तर पर खेलने का, वो सपना बनकर ही रह गया।
उसके बाद मुझे कुछ सालों तक कोई रास्ता नहीं मिला, क्योंकि मेरा परिवार भी आर्थिक स्थिति से कमज़ोर था। उसके बाद मैंने एक स्वयं फैसला किया, जो मेरा सपना पूरा कर सकता था। मैंने कबड्डी प्लेयर्स को नियमित सिखाने की ज़िद ठान ली और नियमित बच्चों को प्रैक्टिस कराना शुरू किया। मेरा बहुत विरोध किया गया, फिर भी मैं हिम्मत नहीं हारा और निरंतर प्रयास करता रहा और आज भी जारी है।
हमारे पास खेल मैदान भी नहीं है, फिर भी खेतों के माध्यम से खेल सिखाने का प्रयास जारी है। आज भी राजनीतिक दल दबाव बनाते हैं, फिर भी मैं हिम्मत हारने वाला नहीं हूँ।
ये उन लोगों से कहना चाहता हूँ, मैं युवाओं को आगे बढ़ाने में पूरा जीवन समर्पित करूँगा। खेल एक आपसी भाईचारे का प्रतीक है।

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