आकाशी पांडे:
देखो
दो अलग-अलग नदियाँ
कैसे एक-दूसरे की ओर बढ़ रही हैं।
एक अलकनंदा,
और दूसरी भागीरथी।।
जल का मिलना तो सहज है,
पर उनके बहाव में एक असहज तीव्रता है
मानो वे अपनी लय छोड़कर
किसी अनकहे अपराध का हिसाब लेने आई हों।।
ऊपर,
आकाश की निस्तब्ध गहराई में
बिजलियों की धारियाँ
इस क्षण को पत्थर पर उकेर रही हैं,
मानो कह रही हों
कुछ घटनाएँ समय की रेत में नहीं,
शाश्वत चट्टानों पर लिखी जाती हैं।।
और मैं
उस संगम के पास बैठी
अपनी हर खिड़की खोल चुकी थी
क्योंकि जो भीतर बंद है,
वो बाहर के तूफ़ान से ज़्यादा
मन के तूफ़ान को डराता है।।
भला,
जो अपने भीतर के शोर से भाग रहा हो
वो बाहर के गीत को कैसे सुन पाएगा?
तभी,
एक पथिक मेरे पास आकर ठहर गया।
उसके पंख
रात के सबसे गहरे रंग से भी गहरे थे
ऐसे गहरे,
जैसे समय का कोई भूला हुआ कोना
जहाँ प्रकाश भी कभी ठहरा न हो।
पर मैं नहीं डरी
क्योंकि भय तो अज्ञान का पुत्र है
और जब हम समझ लेते हैं
तो अंधकार भी बस एक और रंग बन जाता है।।
बादलों का उमड़ना,
और किसी की स्मृतियों-से भारी आँसू
धरती के हर जीव में
एक अनदेखा गीत बो रहे थे।।
तूफ़ान
एक अदृश्य गुरु,
जो सिखा रहा था
कि झुकना हार नहीं,
बल्कि उस ऊँचाई की तैयारी है
जहाँ से गिरना असंभव हो।।
बहुत दूर,
एक पुराना महल था
जिसकी दीवारें
समय के अभिमान से बनी थीं,
और जहाँ हर नया रंग
अशांति कहलाता था।।
पर अब
उन दीवारों में भी
बालू जैसी महीन दरारें उतर आई थीं
शायद यही समय का स्वभाव है
कोई भी किला,
चाहे जितना विशाल हो,
अंदर से बदले बिना
हमेशा खड़ा नहीं रह सकता।।
और देखो
अब बिजली का स्वर धीमा पड़ चुका है,
बादल अपनी पकड़ छोड़ रहे हैं।।
वे दो धाराएँ
अपने मनमुटाव को धोकर
गंगा बन गई हैं।।
अब वह
अपने गंतव्य तक पहुँचने को अधीर है
क्योंकि उसे पता है
कि सागर में मिलना
भले उसकी मिठास को बदल दे,
पर अस्तित्व का सत्य
अपनी सीमाओं को छोड़कर
अनंत में विलीन होना ही तो है
है न ..?
और देखो न
ये चाँदनी रात,
छँटते बादल,
और मधुर हवाएँ
उसके किनारों को छूते हुए
मानो कह रही हों
सत्य वही है,
जो बदलकर भी बना रहे
और वह है प्रेम।।

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