पल्लवी श्रीवास्तव:
मेरा नाम पल्लवी श्रीवास्तव है। मैं उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के रिसिया ब्लॉक के रायपुर गाँव में रहती हूँ। हमारा गाँव शांत और हरियाली से भरा है, जहाँ लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़े रहते हैं। मेरे परिवार में सात सदस्य हैं – मम्मी, पापा, चार बहनें और एक भाई। पापा प्राइवेट जॉब करते हैं, मम्मी गृहिणी हैं, और हम सभी भाई-बहन पढ़ाई कर रहे हैं। घर भले सादा है, लेकिन हम सबके मन में आगे बढ़ने और कुछ करने की चाह हमेशा रहती है।
मैं इस समय बी.एस.सी. कर रही हूँ, जिसमें मेरा विषय बायोलॉजी है। मेरे तीन मुख्य विषय हैं – रसायन विज्ञान, जंतु विज्ञान और वनस्पति विज्ञान। मुझे हमेशा से प्रकृति और जीवन के रहस्यों को समझने की जिज्ञासा रही है, इसलिए मैंने बायोलॉजी चुनी।
पिछले छह महीनों से मैं सरजू फाउंडेशन से जुड़ी हूँ। यहाँ मैंने बहुत कुछ सीखा – रिफ्लेक्शन मीटिंग कैसे करनी है, प्लान कैसे बनाना है, और समुदाय में लोगों से जुड़ाव कैसे बनाना चाहिए। मैंने यह भी समझा कि बच्चों के साथ विज्ञान और लाइब्रेरी को जोड़कर सीखने का माहौल कैसे बनाया जा सकता है।
यहाँ रहते हुए मुझे संविधान के बारे में गहराई से समझ मिली – उसके चार मूल्यों न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुता के बारे में सीखा। पहले मेरे अंदर भी जाति, धर्म और छुआछूत को लेकर कुछ भेदभावपूर्ण सोच थी, लेकिन इन मूल्यों को समझने के बाद मेरा दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया। अब मैं मानती हूँ कि हर इंसान बराबर है और हमें एक-दूसरे के साथ सम्मान और समानता से रहना चाहिए।
सीखने की इस यात्रा में मैंने यह भी जाना कि दुनिया कैसे बनी, पहला इंसान कौन था, आग की खोज कैसे हुई और कैसे आदिमानव धीरे-धीरे विकसित होकर आज का आधुनिक इंसान बना। मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि जाति, धर्म और लिंग जैसी बातें इंसानों ने बाद में खुद बनाई हैं – पहले तो सब सिर्फ इंसान थे।
हम अपनी समझ को और गहराई देने के लिए फिल्में भी देखते हैं। एक बार हमने ‘उस्मान पंडित’ फिल्म देखी, जिसने मेरी सोच को और व्यापक बनाया। फिर ‘मौलिक अधिकार’ पर बनी फिल्म से मुझे समझ आया कि हमारे अधिकार क्या हैं और संविधान के किस अनुच्छेद में समानता, न्याय और स्वतंत्रता की बात की गई है।
इन छह महीनों में मैंने अपने भीतर बहुत बदलाव महसूस किया है। अब मैं अधिक आत्मविश्वासी हूँ, खुलकर अपनी बात रख पाती हूँ और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करती हूँ। कभी-कभी सोचती हूँ, अगर मैं सरजू फाउंडेशन से न जुड़ती, तो शायद यह नहीं समझ पाती कि सीखना सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि अनुभवों और लोगों से भी होता है।
अब मेरी इच्छा है कि मेरे गाँव की लड़कियाँ भी आगे आएँ, अपने विचार रखें और समाज में बराबरी से अपनी जगह बनाएँ। मैं शुभी जी के साथ मिलकर बच्चों के लिए एक कोचिंग सेंटर चलाती हूँ, जहाँ हम उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ समाज और जीवन से जुड़ी नई बातें सिखाते हैं। इसके अलावा मैं गरिमा लाइब्रेरी भी चलाती हूँ, जहाँ बच्चे किताबें पढ़ते हैं, चर्चा करते हैं और सीखने की प्रक्रिया का आनंद लेते हैं।
लाइब्रेरी में हम बच्चों के साथ गैलरी वॉक करते हैं, जहाँ संविधान और विज्ञान से जुड़े पोस्टर लगाए जाते हैं। बच्चे सवाल पूछते हैं, विचार साझा करते हैं और समाज के बड़े मुद्दों को समझने की कोशिश करते हैं। हर रविवार मैं संडे लाइब्रेरी चलाती हूँ, जिसमें बच्चों के साथ वैज्ञानिक चेतना पर काम किया जाता है। मैं उन्हें नवोदय विद्यालय की किताबों से भी तैयारी करवाती हूँ ताकि उनका ज्ञान बढ़े और वे प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार हो सकें।
मैं बच्चों के साथ नेचर वॉक भी करती हूँ – हम खेतों और पेड़ों के बीच घूमते हैं, जहाँ मैं उन्हें पेड़-पौधों की पहचान और पर्यावरण से जुड़ी बातें सिखाती हूँ। मैं बताती हूँ कि पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, हवा को शुद्ध रखते हैं और धरती को हरा-भरा बनाते हैं। इस तरह बच्चे प्रकृति से जुड़ना और उसकी देखभाल करना सीखते हैं।
इसके अलावा मैं बच्चों के साथ समर कैंप भी आयोजित करती हूँ, जहाँ हम खेल-खेल में विज्ञान से जुड़ी गतिविधियाँ करवाते हैं ताकि बच्चे सीखने का आनंद ले सकें। हम दो दिवसीय स्पोर्ट्स कैंप भी रखते हैं, जिसमें बच्चे क्रिकेट, वॉलीबॉल, बैडमिंटन और फुटबॉल जैसे खेल खेलते हैं – इससे उनमें टीमवर्क और आत्मविश्वास दोनों बढ़ता है।
कोचिंग सेंटर में मैं बच्चों को संविधान के चार मूल्यों – न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुता – के बारे में सिखाती हूँ। मैं उन्हें समझाती हूँ कि ये मूल्य हमारे जीवन के हर हिस्से में ज़रूरी हैं। हमें अपने परिवार और समुदाय में समानता और बंधुता के साथ रहना चाहिए, और अपने अधिकारों को समझकर स्वतंत्र रूप से उनका प्रयोग करना चाहिए।
हम बच्चों के अभिभावकों से भी बातचीत करते हैं – यह समझने के लिए कि उनके बच्चों में क्या बदलाव आ रहे हैं, क्या उन्होंने घर पर सीखी बातों को साझा किया है, और उन्हें उससे क्या समझ मिली है। इसके अलावा मैं घर-घर लाइब्रेरी भी चलाती हूँ, जिसमें हम बच्चों के घर जाकर उन्हें किताबें देते हैं, और बाद में चर्चा करते हैं कि उन्होंने क्या पढ़ा और क्या समझा।

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