गुफरान:
अवध की धरती को लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब का पालना कहते हैं। यहाँ की रियासत का इतिहास सिर्फ़ नवाबी ठाठ-बाट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस साझी संस्कृति की दास्तान है, जहाँ हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के साथ मिलकर जीते-बढ़ते रहे। अयोध्या-फ़ैज़ाबाद और लखनऊ की गलियाँ इस बात की गवाह हैं कि यहाँ सद्भाव हवा में घुला हुआ था। आज भी बुज़ुर्गों की ज़ुबान पर यह कहावत सुनाई देती है “अवध में नफ़रत टिके ना, यहाँ की हवा में मोहब्बत घुली है।”
नवाबी दौर में समाज का रंग सबसे अधिक दिखाई देता है। नवाब आसफ़ुद्दौला ने जब अकाल के दिनों में बड़ा इमामबाड़ा बनवाया, तो लोग इसे रोज़गार और राहत का प्रतीक मानते थे। तभी से मशहूर कहावत चली “आसफ़ुद्दौला ने लखनऊ बसाया और भूखे को रोटी खिलाया।” फ़ैज़ाबाद और लखनऊ के दरबार केवल शाही ठिकाने नहीं थे, बल्कि वहाँ कवियों, कलाकारों, साधुओं और फ़क़ीरों को भी सम्मान मिलता था। मंदिरों और मस्जिदों, दोनों को संरक्षण दिया गया। यही कारण है कि यहाँ के समाज ने शासकों को “अपना” माना।
अवध के त्योहारों में साझी संस्कृति सबसे सुंदर रूप में दिखती थी। मुहर्रम के ताज़िये बनाने में हिंदू कारीगर आगे रहते और कहते “हुसैन सबके हैं, मातम इंसानियत का है।” होली पर मुस्लिम गायक अवधी फाग गाते और दिवाली की रात बिरयानी और खीर की खुशबू एक साथ उठती। वाजिद अली शाह ने तो खुद कृष्ण-लीला में राधा का वेश धारण कर रंगमंच पर उतरकर इस मेलजोल को नया आयाम दिया। यही वजह है कि अवध की पहचान आज भी त्योहारों की साझेदारी से जुड़ी हुई है।
भाषा और साहित्य में भी यह गंगा-जमुनी तहज़ीब झलकती थी। अवधी, हिंदी और उर्दू का मिलाजुला रूप यहाँ रोज़मर्रा की बोली थी। लोगों का कहना था “उर्दू-हिंदी जुमला जुड़वाँ बहिनें, अवध की कोख से जनमलिन।” यही मिश्रण ठुमरी, दादरा और कव्वाली जैसे संगीत रूपों में भी सुनाई देता था। संगीत के ये रंग न किसी मज़हब में बँधते थे और न ही किसी जाति में।
रसोई भी अवध की साझी संस्कृति की प्रतीक बनी। कबाब और बिरयानी की खुशबू में पूड़ी-खीर और मालपुए का स्वाद घुला होता था। लोग मज़ाक में कहते “कबाब बिना पराठा अधूरा, खीर बिना बिरयानी अधूरी।” यानी यहाँ का खाना भी हिंदू-मुसलमान की तरह साथ-साथ रहता था।
1857 की क्रांति ने इस तहज़ीब को और मज़बूत किया। जब अंग्रेज़ों ने अवध की रियासत को छीन लिया, तो हिंदू और मुसलमान दोनों ने मिलकर विद्रोह किया। बेगम हज़रत महल के साथ साधु-संत और मौलवी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए। गाँव-कस्बों में यह कहावत गूँज उठी“मस्जिद-मंदिर संग-संग, आज़ादी खातिर संग्राम।” यही वजह थी कि अवध की धरती विद्रोह का सबसे बड़ा केंद्र बनी और इसने दिखा दिया कि असली ताक़त साझे संघर्ष में है।
लेकिन अंग्रेज़ों की “फ़ूट डालो और राज करो” नीति ने इस सद्भाव पर चोट की। दुर्भाग्यवश आज़ादी के बाद भी यह परंपरा कई बार राजनीति के नाम पर चुनौती का सामना करती रही। पिछले कुछ दशकों में अयोध्या-फ़ैज़ाबाद ही वह जगह बनी, जहाँ सद्भाव की सबसे बड़ी परीक्षा हुई। मंदिर-मस्जिद विवाद ने इस शहर की साझी स्मृति को बाँटने की कोशिश की। फिर भी, इस विभाजन के बावजूद समाज की गहराई में सद्भाव आज भी मौजूद है। मोहल्लों में एक-दूसरे के घरों में त्यौहारों पर दावतें चलती हैं। बीड़ी मज़दूर और निर्माण मज़दूरों के घरों में यह फर्क नहीं होता कि किसका बच्चा होली खेल रहा है और किसका बच्चा मुहर्रम में मातम कर रहा है।
यही वजह है कि अवध का इतिहास आज भी हमें आईना दिखाता है। जब समाज में नफ़रत और विभाजन की राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा हो, तब अवध की गंगा-जमुनी तहज़ीब यह सिखाती है कि “सद्भाव ही इंसानियत की असली ताक़त है।” अवध के अनुभव हमें बताते हैं कि अगर मिलकर जीना है, तो मंदिर और मस्जिद की दीवारों को नहीं, बल्कि दिलों के दरवाज़ों को खोलना होगा।
फीचर्ड फोटो आभार: आर्ट एंड कल्चर गूगल

Leave a Reply