बाबूलाल दाहिया:
मित्रों! जब से ट्रंप अमरीका का राष्ट्रपति बना तबसे भारत के लिए कुछ न कुछ ऊल-जलूल बातें करता ही रहता है।
कभी टैरिफ लगाने की बात करेगा तो कभी ऐसी बातें करने लगेगा जैसे भारत उसके ही रहमों करम पर जी रहा हो? वैसे पहले भी वहाँ जो भी राष्ट्रपति हुए, वह भारत के लिए हमेशा हसिया की तरह टेंढ़ ही रहे। पर यह कुछ अधिक ही टेढ़ा दिख रहा है।
रूस के पराभाव के पश्चात जब अमरीका की दादागिरी विश्व में अपने चरम पर थी तब निदा फाजली जी का एक दोहा बड़ा ही सटीक हुआ करता था कि –
सात समंदर पार से,
कोइ करे ब्यापार।
पहले भेजे सरहदें,
फिर भेजे हथियार।।
प्राचीन समय की लड़ाइयां आमने-सामने की होती। कोई शासक अपनी भारी भरकम सेना लेकर जाता और हथियारों के बूते दूसरे को पराजित कर देता। लेकिन आज की लड़ाई फौज की नहींं व्यापारिक प्रतिस्पर्धा या व्यापारिक साम्राज्य की है। तभी तो ट्रंप बार-बार दोहराता रहता है कि “मैंने भारत-पाकिस्तान को कहा कि अगर तुम युद्ध समाप्त नहीं किए तो तुम्हारा हमारा व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त।”
ठीक उसी प्रकार का जैसे गाँव में किसी व्यक्ति का सोशल बायकॉट (बहिष्कार) करना हो तो उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता था। परन्तु वर्तमान में किसान भी उसी आर्थिक साम्राज्यवाद के शिकंजे में फंसा दिख रहा है। खेतों में उपज तो भरपूर दिखती है और उधर कृषि मंत्री, प्रधानमंत्री भी अगर चाहें तो किसानों की उस उपलब्धि पर अपनी पीठ ठोक लें। लेकिन लाभ के नाम पर उसे कुछ नहींं, सारी खेती किसी अदृश्य पूंजीवाद के लिए। यही कारण है कि किसानों की दशा देख मुझे अब महाभारत का बर्बरीक याद आ रहा है।
कहते हैं, भीम के पुत्र राक्षश घटोत्कच का बेटा बर्बरीक जब अपने दादा भीम, अर्जुन के मदद के लिए महाभारत युद्ध में शामिल होने आया तो कूटनीतिज्ञ श्री कृष्ण उसका सिर काट कर एक टीले में रख दिया कि “ले बेटा तू खुद लड़ने के बजाय यहीं से युद्ध देखते रहना।”
जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुवा और अर्जुन, भीम आदि योद्धा अपनी-अपनी बहादुरी बखानते उछल-कूद रहे थे तो श्री कृष्ण ने कहा “तुम अपनी बहादुरी बखानने के बजाय पूरा युद्ध देखने वाले बर्बरीक से क्यों नहीं पूछ लेते?” आखिर बर्बरीक से ही पूछा गया। पर उसने कहा कि “मैने अपने दादा भीम, अर्जुन आदि को किसी को भी लड़ते नहीं देखा? हाँ, कोई एक अदृश्य महाशक्ति अवश्य थी जो सभी का संघार कर रही थी।”
महाभारत इतिहास नहीं एक प्राचीन पौराणिक ग्रन्थ है। उसमें बहुत सारी चमत्कार पूर्ण कथाएं भी हैं। पर यही स्थिति आज हमारे देश के खेती की बनचुकी है। भले ही किसान या कोई मंत्री अपनी उपलब्धि बताते रहें, वस्तुतः यह खेती अब आर्थिक साम्राज्य वाद रूपी एक अदृश्य शक्ति की साजिश के सिवाय कुछ नहीं है। पैसा लगाकर काम तो किसान कर रहा है, पर लाभ दूसरों के पास जा रहा है।
पहले किसान की खेती अपने बूते की थी। उसमें बीज, खाद, हल-बैल और श्रम के साथ अपना ही सब कुछ होता था। लेकिन आज अदृश्य शक्ति जैसा काम आर्थिक साम्राज्यवाद थोपती बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, बगैर हथियार और युद्ध के कर रही हैं। उधर उनका हित रक्षक अंतर राष्ट्रीय मुद्रा कोष भी मदद गार है। क्योंकि उसके मुद्रा के सामने विकासशील देश और तीसरी दुनिया के देश सभी नत मस्तक हैं। यही कारण है कि अपने बीज सम्प्रभुता को खोकर किसान हर वर्ष ऐसे कीमती बीजों को क्रयकर उगा रहा है जो दूसरे साल फिर बोने के काम नहीं आते।
आज यह सब उसी साजिश का हिस्सा है कि भरपूर फसल लेकर भी किसान कर्ज के बोझ में लदा हुआ है। क्यूंकि देशी बीज, हल-बैल आदि की सम्प्रभुता खतम कर के ही किसी देश को आर्थिक रूप से गुलाम बनाया जा सकता है। तभी तो विश्व भर में बीज बेचने वाली इन कम्पनियों के बीज व्यापार को देखा जाय तो इनका साल भर का टर्न ओवर भारत और पाकिस्तान के वार्षिक बजट से भी बड़ा है।
यही कारण है कि खेती तो किसान कर रहा है, पर लाभ दूसरे के जेब में केंद्रित हो रहा है। और समस्त पैसा खाद, बीज, निंदा नाशक, कीट नाशक, जुताई, कटाई के रास्ते निकल शहर जा उन्ही कम्पनियों के पास पहुँच जाता है।

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