गुफरान :
भारत में बहुत से लोग हैं जो यहाँ जन्मे, पले, बड़े हुए, लेकिन भारत को समझ नहीं पाए। और एक टॉम अल्टर थे—जो विदेशी खून से पैदा हुए, लेकिन भारतीय आत्मा में ढल गए। एक ऐसा चेहरा जो गोरा था, पर जिस पर हिंदुस्तान का हर रंग दिखाई देता था—कभी शायर ग़ालिब का, कभी मौलाना आज़ाद का, कभी एक किसान का, तो कभी एक पत्रकार का।
टॉम अल्टर का जन्म 22 जून 1950 को मसूरी की पहाड़ियों में हुआ था। उनके माता-पिता अमेरिकी से मिशनरी थे, लेकिन टॉम कभी अपने ‘अमेरिकन’ होने को लेकर नहीं रुके। उन्होंने न तो अपने चेहरे को ढालने की कोशिश की, न अपने उच्चारण को छुपाया, बल्कि एक नई परिभाषा गढ़ी—एक ऐसा कलाकार जो भारत के सबसे लोकल किरदारों को निभा सकता है और उसे देखकर लोगों को लगता है कि “यही तो हमारा आदमी है।”
शिक्षा और आत्मा की तलाश
टॉम की पढ़ाई मसूरी के Woodstock स्कूल से हुई और बाद में वे पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) पहुँचे। यहीं से उनके अभिनय जीवन की असली शुरुआत हुई। FTII में उन्होंने अभिनय को पेशा नहीं, एक सामाजिक उत्तरदायित्व की तरह देखा। उनके लिए मंच पर खड़ा होना, जनता की पीड़ा को आवाज़ देना था। यही कारण था कि टॉम हमेशा ऐसे किरदारों की ओर खिंचते थे जो सत्ता से नहीं, सच्चाई से जुड़े होते थे।
सिनेमा और टेलीविजन का सजग कलाकार
उन्होंने करीब 300 से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय किया। ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘गांधी’, ‘क्रांति’, ‘जूनून’, ‘परिंदा’, ‘वीर ज़ारा’—इन फिल्मों में उन्होंने भले ही कभी साइड रोल निभाया हो, लेकिन उनके हर दृश्य में एक गंभीरता थी। ऐसा लगता था कि वे सिनेमा में अभिनय नहीं, बल्कि इतिहास को जी रहे हों। टेलीविजन पर ‘शक्तिमान’ और ‘कैप्टन व्योम’ जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए उन्होंने नई पीढ़ी तक अपनी सोच पहुंचाई।
रंगमंच की आत्मा
पर टॉम की आत्मा सिनेमा में नहीं, रंगमंच में बसती थी। उन्होंने ग़ालिब, मौलाना आज़ाद, साहिर लुधियानवी, भगत सिंह जैसे किरदारों को मंच पर जिया। उनके नाटक ‘Ghalib In Delhi’ में जब वे ग़ालिब बनते थे, तो दर्शकों को लगता था कि खुद मिर्ज़ा साहब लौट आए हैं। उनकी आवाज़, उर्दू की अदायगी, शरीर की भाषा—सब कुछ किसी सूफी कवि की तरह आत्मा को छू जाता था।
पत्रकार और लेखक: समाज का दस्तावेज़कार
टॉम केवल अभिनय तक सीमित नहीं थे। वे पत्रकार भी थे—‘Sportsweek’, ‘Outlook’, ‘Cricket Talk’ जैसे पत्रिकाओं में उन्होंने खेल, सिनेमा और समाज पर लिखा। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सचिन तेंदुलकर का वीडियो इंटरव्यू किया था। उनकी किताबें—‘The Longest Race’, ‘Rerun at Rialto’, ‘The Best in the World’—भारतीय समाज को एक अंतरदृष्टि से देखने की कोशिश हैं।
समाज के प्रति नज़रिया
टॉम अल्टर मानते थे कि कलाकार का काम सत्ता के आगे झुकना नहीं, बल्कि उसके सामने आइना रखना है। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था— “मैं यह तय नहीं कर सकता कि मेरा नाम क्या है या मेरा रंग कैसा है, लेकिन मैं यह तय कर सकता हूँ कि मैं किसके साथ खड़ा हूँ।”
वे बार-बार भारत की साझी संस्कृति, उसकी भाषा, उसकी तहज़ीब के पक्ष में खड़े हुए। जब उर्दू को शक की निगाह से देखा जाने लगा, तब एक ‘अंग्रेज़’ उस भाषा का सबसे मज़बूत पक्षधर बनकर सामने आया। उन्होंने भारत को मज़हब की दीवारों में नहीं, संस्कृति की नदियों में देखा।
अंतिम विदाई और अमर विरासत
2017 में टॉम अल्टर को त्वचा कैंसर (Squamous Cell Carcinoma) हो गया। इलाज चला, लेकिन 29 सितंबर 2017 को वे दुनिया से रुख्सत हो गए। एक ऐसा अभिनेता चला गया जिसने अभिनय को साधना की तरह जिया। लेकिन क्या वे वाकई चले गए? जब कोई ग़ालिब की ग़ज़ल पढ़ेगा, जब किसी नुक्कड़ पर नाटक होगा, जब कोई बच्चा ‘शक्तिमान’ देखेगा, या कोई उर्दू का लफ्ज़ उच्चारण करेगा—टॉम वहाँ ज़रूर होंगे। एक आवाज़ बनकर। एक आत्मा बनकर।
एक आख़िरी पंक्ति
टॉम अल्टर इस देश में केवल रहने नहीं आए थे, वे इसे समझने और उसकी आत्मा से एक होने आए थे। उनका जीवन एक सवाल की तरह था— “क्या भारतीय होने का मतलब केवल नाम, जाति और धर्म है? या वह एक सोच है, जो इस मिट्टी, भाषा और उसके दुख-दर्द में घुल जाने का नाम है?”
टॉम ने इस सवाल का जवाब अपने जीवन से दिया—और हम शायद अभी भी उस उत्तर को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
फीचर्ड फोटो आभार : द न्यू इंडियन एक्सप्रेस और द स्क्रॉल

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