कुमार दिलीप: 

30 जून 1972 को माता- सुखी टुडू, पिता- विजय कुमार टुडू के घर में कपूर कुमार टुडू ने जन्म लिया। 15 वर्ष के उम्र से 1987 में रवि कुमार के साथ चांडिल हॉस्टल में रहता था और अपनी पढ़ाई करता था। 

इसी क्रम में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथियों ने चांडिल डैम बनने के  विरोध में विस्थापित मुक्ति वाहिनी गठन की प्रक्रिया इस क्षेत्र में चला रहा था। 

(अरविंद अंजुम जी के अनुसार

कपूर बागी से मेरा घनिष्ठ परिचय न केवल 4 दशक  पुराना है बल्कि अत्यंत आत्मीय और पारिवारिक रहा है। 

जो मुझे याद है कपूर आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था मैं भी उन दिनों चांडिल क्षेत्र में आना जाना शुरू किया था एक बार चांडिल से लौटते हुए एक ही बस में कपूर से मुलाकात हो गई पजामा और कमीज पहने गोल मटोल चेहरे वाला 15-16 साल के कपूर ने मेरा भी जमशेदपुर तक का भाड़ा कंडक्टर को दे दिया। इसकी छाप मुझ पर पड़ी। उन दिनों हम लोग पैसे पैसे के मोहताज रहते थे। कभी तो पैसे के अभाव में बीच रास्ते में सरकारी बस से उतरे भी गए पर ऐसा ज्यादा कथा ही हुआ।अन्यथा कंडक्टर की मेहरबानी हुआ करती थी।

1996 में जब विकास भवन के सामने मेरे ऊपर हमला हुआ तब कपूर भी मेरे साथ था। हमला इतना अचानक हुआ था कि कोई कुछ कर भी नहीं सका। कोई बड़ी और घटना ना हो ऐसा सोचकर मैंने रैली स्थगित करने का अनुरोध किया और मुझे जमशेदपुर से आई हॉस्पिटल में भरती कर दिया गया। इस बीच कई घंटे कपूर गायब रहा। उसकी भी चिंता होने लगी बाद में पता चला कि वह घंटों अशोक के घर में चुपचाप बैठा हुआ था। शायद उसे इस बात का मलाल रहा हो कि उसके रहते ऐसी घटना हुई।

जब उसकी शादी और बच्चे हो गए तो एक बार मैंने उससे कहा कि एलआईसी की कोई पॉलिसी ले लो पर उसने कहा कि मरने के बाद कौन देखता है। बात तो सही है। मौत के बारे में ठीक भी हो सकता है पर जिंदगी के बारे में ऐसी बेपरवाही जिंदगी से रुखसत कर सकती है। ऐसा ही कुछ हो गया।

कपूर एक बेपरवाह इंसान था।(हम सब उसे याद करते रहेंगे)

अरविंद अंजुम का बस का भाड़ा दे दिया तब अरविंद अंजुम और कपूर कुमार में अच्छी मित्रता बनी। उसके बाद कपूर कुमार टुडू को कपूर बागी बनने में समय नहीं लगा। शुरुआत में छात्र – युवा संघर्ष वाहिनी में जुड़े। साधारण कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगे। विस्थापित मुक्ति वाहिनी के मुख्य कार्यकर्ता के रूप में चांडिल डैम के विस्थापितों की समस्या को लेकर के लगातार संघर्ष करता रहा।

1995 में झारखंड मुक्ति अभियान का गठन:

झारखंड के विभिन्न मुद्दों को उठाने के लिए मजबूत होते गए। अलग झारखंड की मांग को लेकर लोगों को संगठित करते रहे और झारखंड मुक्ति अभियान नामक एक संगठन स्थापित किया। बाद में वह बदल कर झारखंड मुक्ति वाहिनी बना। इस बैनर से डिमना डैम के विस्थापितों संगठित करते हुए आन्दोलन करते रहे।

1996 में दमला मुक्ति वाहिनी का गठन:

दलमा पहाड़ को बचाने के लिए 86 गांवों को संगठित करने के लिए दलमा मुक्ति वाहिनी बना कर आंदोलन किया। आज दलमा पहाड़ पूरा हराभरा एवं पशु पक्षियों से भरा हुआ है। 

महिला मुक्ति वाहिनी में कपूर बागी की भूमिका:

पलायन रोकने , ग्राम सभा, सशक्तिकरण, जल,जंगल, जमीन बचाने को लेकर गांव गांव में जाकर महिलाओं को संगठित करने का काम किया। महिलाओं को संगठित करने के लिए महिला मुक्ति वाहिनी बनाया। 

अलग-अलग रूपों में संगठन बना बनाकर उन्होंने लगातार काम किया। 

जब कपूर बागी की उम्र 30 वर्ष हुआ तो उन्होंने जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी (जसवा) में शामिल हो गया। तब से लेकर अब तक उसी संगठन में शामिल रहा और जनहित में संघर्ष के रस्ते पर चलता रहा। 

झारखंडियों के लिए कपूर:

विस्थापन विरोधी एकता मंच का गठन। झारखंड आंदोलन तेज होता गया और अंततः 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड बन गया। अलग झारखंड बनने के बाद झारखंड आंदोलनकारी साथियों ने चैन की सांस ली, कि अब हमारी अपनी गांव की, ग्रामीणों की, आदिवासियों की, झारखंडियों की राज होगी। परंतु धीरे-धीरे सत्ता के लालच में सत्ताधारियों ने झारखंड को अन्य राज्य की तरह ही लूट का अड्डा बना दिया। लगातार एम ओ यू होता गया। लगातार विस्थापन, पलायन, जल, जंगल, जमीन की लूट होता गया। इसी लूट के खिलाफ में कपूर बागी आंदोलन करने के लिए झारखंडियों के नेतृत्व करने लगे। पूरी कोल्हान में लगातार घूमता रहा। आंदोलन को नेतृत्व देते रहे। धीरे-धीरे पूरे झारखंड में 102 एम ओ यू हो चुके थे।

विस्थापन विरोधी नवनिर्माण मोर्चा का गठन 

कपूर बागी के लगातार आंदोलन और उनके धूरी में रहने वाले साथियों के संघर्ष के साथ पूरे झारखंड स्तर का मोर्चा बना। कपूर बागी कोल्हान में एक स्तंभ की तरह रहा करते थे। कोविड 19 के बाद कपूर बागी के मां, सुखी टुडू के घर में दुःख का पहाड़ टूटने लगा। पूर्व में ही पति का सहारा छूट गया था। किसी तरह हिम्मत के साथ तीनों बेटा को पढ़ा लिखा कर बड़ा किया। पर सुखी को सुख का दिन देखने को न मिला। 

वर्ष 2023 में कपूर बागी का मंझला भाई किशोर कुमार टुडू का किडनी फेलियर के कारण देहांत हो गया। जिससे पूरे परिवार को काफी आहत हुआ। किशोर कुमार घर में स्तंभ की तरह बने रहते थे। 

छोटा भाई अनूप कुमार टुडू का किडनी फेलियर के कारण 25 जून 2024 को देहांत हो गया। लगातार इस दो वर्षों में कपूर बागी और उनके परिवार को शारीरिक, आर्थिक तथा मानसिक रूप से तोड़ दिया।

छोटे भाई के देहांत के ठीक सात दिन बाद 2 जुलाई 2024 को बाथरूम में फिसलने के कारण कपूर बागी का दाहिना पैर टूट गया। इसके बाद तो अस्पताल और घर आना जाना लगा रहा। पैर टूटने के कारण चलना फिरना कम हो गया। जिससे उनका किडनी में प्रॉब्लम हो गया। पत्नी सुकुरमनी, बड़ा बेटा उमुल, बेटी दुलारी, छोटा बेटा बाबूलाल और बूढ़ी मां सुखी टुडू को छोड़ कर 6 मई 2025 शाम में अपनी देह त्याग कर हमें छोड़ गए। उसके बाद कपूर बागी केवल हमारे यादों में रहेंगे। 

कपूर बागी को अंतिम जोहार!!

Author

  • कुमार दिलीप झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले से एक सामाजिक अगुआ और युवा बुद्धिजीवी हैं। वह राज्य के सोशल ऑडिट यूनिट में कार्यरत हैं। वह पिछले एक दशक से युवाओं को सामाजिक बदलाव के प्रक्रिया में जोड़ने के लिए सक्रिय प्रयास करते आये हैं।

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