रोहित चौहान : 

हर साल 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ मनाया जाता है। यह दिन पूरी दुनिया के मेहनतकशों की संघर्षशील विरासत और उनके हकों की याद दिलाता है। लेकिन भारत जैसे देश में, जहाँ सामाजिक ढांचे में जाति एक गहराई से जड़ जमाई हुई सच्चाई है, वहां श्रमिक अधिकारों की बात केवल मजदूरी या काम के घंटे तक सीमित नहीं रह सकती। यह सवाल बन जाता है पहचान, सम्मान और बराबरी का। इस व्यापक प्रश्न को सबसे पहले और सबसे गहराई से जिसने छुआ, वह थे डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर।

श्रमिकों के बीच एक विद्वान का प्रवेश

1920 के दशक में जब भारत में उद्योग और पूंजीवाद तेजी से बढ़ रहा था, तब इसके साथ ही एक नया शोषण भी आकार ले रहा था, मजदूरों का, विशेषकर दलित मजदूरों का। बंबई की कपड़ा मिलों, रेलवे वर्कशॉप और खानों में काम करने वाले श्रमिक 14 से 16 घंटे तक बिना पर्याप्त सुरक्षा और वेतन के काम करने को मजबूर थे। आंबेडकर ने इसे सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के रूप में देखा।

1918 से ही आंबेडकर श्रम मामलों में रुचि ले रहे थे। उन्होंने The Bombay Chronicle, Labour Gazette जैसी जगहों पर लेख लिखे। वे मानते थे कि भारत में मजदूरों की दुर्दशा के पीछे केवल पूंजीपतियों की मनमानी नहीं, बल्कि जाति आधारित विभाजन भी बड़ी वजह है।

1928 में वे बंबई टेक्सटाइल लेबर यूनियन से जुड़े। हालांकि यह यूनियन पहले से मौजूद थी, लेकिन उन्होंने मजदूरों के बीच जाकर यह समझाया कि बिना सामाजिक समानता के कोई भी श्रमिक आंदोलन टिकाऊ नहीं हो सकता। उनकी मौजूदगी में यूनियन में जातिगत असमानता पर सवाल उठे। कई मौकों पर उन्होंने यह साफ किया कि अगर ट्रेड यूनियनें ही दलित मजदूरों को बराबरी का दर्जा नहीं देंगी, तो एक नई दिशा में संघर्ष जरूरी होगा।

यूनियन के भीतर जातिगत भेदभाव

बाबासाहेब ने यह देखा कि श्रमिक आंदोलनों में नेतृत्व की बागडोर प्रायः उच्च जातियों के हाथ में होती थी, और दलित मजदूरों को नीतिगत निर्णयों से दूर रखा जाता था। कपड़ा मिलों में काम करने वाले दलित श्रमिकों को यूनियनों में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता था, उनके मुद्दे हाशिए पर रहते थे।

ऐसे में आंबेडकर ने श्रमिक आंदोलनों की आलोचना करते हुए यह कहा कि जब तक यूनियनें खुद अपने भीतर जातिगत पूर्वाग्रह खत्म नहीं करेंगी, तब तक वे किसी क्रांति की बात नहीं कर सकतीं। उन्होंने मजदूरों के बीच समानता और बंधुत्व के सिद्धांत को फैलाया। ऐसा माना जाता है कि इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने कुछ जगहों पर स्वतंत्र और समावेशी यूनियनों के गठन का समर्थन किया।

1930 के दशक में जब उन्होंने Independent Labour Party की स्थापना की, तब यह केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि यह एक समतावादी मजदूर आंदोलन का भी प्रारूप था। उन्होंने कहा था:

“हमारी पार्टी न तो केवल पूंजीवाद के विरुद्ध है और न ही केवल जातिवाद के विरुद्ध, बल्कि यह दोनों के साझा उत्पीड़न के विरुद्ध है।”

राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का विस्तार

डॉ. आंबेडकर का संघर्ष सिर्फ सड़कों और फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका बौद्धिक संघर्ष भी उतना ही सशक्त था। 1936 में लिखी गई उनकी प्रसिद्ध कृति जाति का उन्मूलन में उन्होंने जाति व्यवस्था को न सिर्फ एक सामाजिक बुराई, बल्कि श्रमिक वर्ग की एकता के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बताया। उनका तर्क था:

जाति श्रम का विभाजन नहीं है, यह श्रमिकों का विभाजन है।” [1]

यह पंक्ति सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय मजदूर आंदोलन के लिए चुनौती भी है। उन्होंने मार्क्सवादी सोच को भारत की वास्तविकता से जोड़ते हुए यह कहा कि यहाँ वर्ग और जाति को एक साथ समझना होगा।

उनका लेख बुद्ध और मार्क्स भी इस बात का गवाह है कि वे किसी भी परिवर्तन को केवल आर्थिक नहीं, नैतिक और सामाजिक धरातल पर भी देखते थे। उनके अनुसार, शोषण का अंत केवल साधनों के पुनर्वितरण से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के विस्तार से होगा।

उनकी एक और अहम रचना “Small Holdings in India and Their Remedies” (1918) में उन्होंने किसानों और खेत मजदूरों की स्थिति का अध्ययन करते हुए स्पष्ट किया कि आर्थिक न्याय तभी संभव है जब छोटे किसानों को संस्थागत समर्थन मिले और श्रम की उपेक्षा न हो।

संविधान निर्माण और श्रमिक अधिकार

डॉ. आंबेडकर जब संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष बने, तब उन्होंने उन अनुभवों और संघर्षों को संविधान में स्थान देने का प्रयास किया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि:

  • सभी नागरिकों को संगठन बनाने का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(ग)) मिले।
  • बंधुआ मजदूरी पर रोक (अनुच्छेद 23) लगे।
  • मानवोचित कार्य स्थितियाँ और मातृत्व लाभ (अनुच्छेद 42) सुनिश्चित किए जाएं।

वे श्रम मंत्रालय के तहत बनी कई समितियों के साथ जुड़े और भारतीय श्रम सम्मेलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने 8 घंटे के कार्य दिवस, न्यूनतम वेतन, स्वास्थ्य सुरक्षा और श्रमिकों के लिए बीमा जैसी योजनाओं पर जोर दिया। यह उनके ही प्रयासों का परिणाम था कि भारतीय संविधान में सामाजिक सुरक्षा को नीति निर्देशक सिद्धांतों के रूप में शामिल किया गया।

आज का परिप्रेक्ष्य: अधूरे संघर्ष की तस्वीर

आज जब हम 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं, तब यह जरूरी हो जाता है कि हम मजदूरी, काम के घंटे या न्यूनतम वेतन जैसे मुद्दों के साथ-साथ यह भी देखें कि क्या मजदूरों को सामाजिक सम्मान, प्रतिनिधित्व और बराबरी का हक मिला है?

क्या आज की यूनियनें जातिगत भेदभाव से मुक्त हैं? क्या निर्माण स्थल, खेतों, फैक्ट्रियों और घरेलू काम में लगे दलित और आदिवासी श्रमिकों को वह सुरक्षा, वह आवाज़ मिली है, जिसका सपना बाबासाहेब ने देखा था?

75 वर्षों के बाद भी असंगठित क्षेत्र में क्यों हैं SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक?

आजादी के 75 वर्षों बाद भी भारतीय समाज में दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों के लोग मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र में ही कार्यरत हैं। यह एक चौंकाने वाली स्थिति है, खासकर तब जब हम यह याद करते हैं कि बाबासाहेब आंबेडकर ने सामाजिक और आर्थिक न्याय की नींव रखते हुए इस तरह की भविष्यवाणी की थी कि भारत में एक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बावजूद जातिवाद का शिकार समुदायों को समान अवसर नहीं मिल पाएंगे। उन्होंने हमेशा यह माना कि स्वतंत्रता और समानता केवल कागज पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से सामाजिक संरचनाओं में होनी चाहिए।

अपने लेखन में आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत के मेहनतकश वर्गों की वास्तविक मुक्ति तभी संभव है जब उन्हें न केवल राजनीतिक अधिकार मिलें, बल्कि उन्हें अर्थव्यवस्था में भी समुचित हिस्सेदारी मिले। लेकिन यह तब तक मुमकिन नहीं है जब तक जातिवाद की जड़ें समाज में गहरी बनी रहें। उनके शब्दों में:

“जातिवाद के कारण ही भारतीय श्रमिक वर्ग को मुक्त नहीं किया जा सकता। जब तक श्रमिकों की आर्थिक स्थिति को उनके जातीय पहचान से अलग नहीं किया जाता, तब तक उनका वास्तविक सुधार असंभव है।”

आंबेडकर ने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि जातिवाद के खिलाफ सही तरीके से संघर्ष नहीं किया गया, तो श्रमिक वर्ग को स्वतंत्रता के नाम पर केवल छलावा मिलेगा। यही स्थिति आज देखने को मिल रही है, जहां SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदायों के लोग असंगठित क्षेत्र में काम करने को मजबूर हैं, जबकि उच्च जातियों के लोग संगठित और औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, जहाँ उन्हें बेहतर सुरक्षा, वेतन और सम्मान मिलता है। यह एक गंभीर असमानता है, जिसे बाबासाहेब ने वर्षों पहले भांप लिया था।

आज भी, ये वर्ग असंगठित क्षेत्र में काम करने को मजबूर हैं, चाहे वह निर्माण कार्य, घरेलू श्रम, कृषि, या छोटे उद्योगों में हो। इस असमानता का कारण सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि सामाजिक अवरोध भी है। बाबासाहेब की चेतावनी आज भी प्रासंगिक है, और हम देख सकते हैं कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों में अधिकांश SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं, जो अपनी जातीय पहचान के कारण किसी भी औपचारिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पाते।

यह आज भी दिखता है कि जब तक इन समुदायों को समान अवसर और सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक उनका संघर्ष समाप्त नहीं हो सकता। बाबासाहेब का विचार था कि जातिवाद को खत्म करना केवल सामाजिक बदलाव का हिस्सा नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक आंदोलन का हिस्सा होना चाहिए। आज़ादी के बाद, हमने जिन सुधारों को लागू किया है, उनमें अधिकतर जातिवाद के खिलाफ नीतियों का असर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर न के बराबर पड़ा है। यह असमानता अब भी कायम है, और बाबासाहेब की भविष्यवाणी सही साबित हो रही है।

असंगठित क्षेत्र का वर्तमान परिदृश्य

आज भारत की कुल श्रम शक्ति का लगभग 90 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। इसमें घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक, खेत मजदूर, ईंट भट्टा श्रमिक, कपड़ा इकाइयों और कढ़ाई जैसे पारंपरिक कामों से जुड़े लोग शामिल हैं। इनमें बड़ी संख्या में दलित, आदिवासी, प्रवासी और महिला श्रमिक हैं। अधिकांश मामलों में उन्हें सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, स्वास्थ्य सुविधा या यूनियन का संरक्षण नहीं मिलता।

COVID-19 महामारी के दौरान इन श्रमिकों की बेबसी और असुरक्षा सबके सामने आई, लेकिन इसके बाद भी नीतिगत सुधार धीमे रहे। ठेका प्रथा और लेबर कोड्स के नाम पर अधिकारों को और कमजोर किया गया। बाबासाहेब की चेतावनी फिर से गूंजती है कि अगर श्रम को सामाजिक न्याय नहीं मिला, तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा।

निष्कर्ष: सिर्फ मजदूरी नहीं, पहचान की लड़ाई भी

बाबासाहेब का दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि मजदूर केवल आर्थिक इकाई नहीं है, वह एक सामाजिक प्राणी भी है। जिसकी गरिमा, पहचान और बराबरी सुनिश्चित करना हर न्यायप्रिय समाज का कर्तव्य है। वे मजदूर को सिर्फ उत्पादन का साधन नहीं, परिवर्तन का एजेंट मानते थे।

इस मजदूर दिवस पर, बाबासाहेब को याद करना केवल उनके योगदान को सम्मान देना नहीं है, बल्कि उनके बताए रास्ते पर चलकर श्रम और समाज के बीच की दूरी को खत्म करने की कोशिश करना है। जब तक जाति और श्रम के मुद्दे एक साथ नहीं समझे जाएंगे, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा।

जय भीम | मजदूर एकता जिंदाबाद

फ़ुटनोट्स

[1] B. R. Ambedkar, Annihilation of Caste, 1936, p. 11

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. Ambedkar, B.R. Annihilation of Caste. 1936.
  2. Ambedkar, B.R. Buddha or Karl Marx.
  3. Ambedkar, B.R. Small Holdings in India and Their Remedies, 1918.
  4. Rodrigues, Valerian. The Essential Writings of B. R. Ambedkar. Oxford University Press.
  5. Omvedt, Gail. Ambedkar: Towards an Enlightened India.
  6. Indian Labour Conference Reports (1920s–1950s).
  7. Shah, Ghanshyam. Dalit Identity and Politics.
  8. Ministry of Labour and Employment, Government of India – Reports and Labour Codes Summary (2020–2023).

Author

  • रोहित चौहान / Rohit Chauhan

    रोहित गुजरात के जूनागढ़ ज़िले में रहते हैं और वर्तमान में सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्त्शन (CLRA) संस्था में काम कर रहे हैं। साथ ही में वह सौराष्ट्र दलित संगठन और मज़दूर अधिकार मंच यूनियन से भी जुड़े हुए हैं। फ़िलहाल वह CLRA के साथ मिलकर प्रवासी आदिवासी मज़दूरों के लिए सौराष्ट्र (पश्चिम गुजरात) में काम कर रहे हैं।

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