रबाब अर्जुमन :
हमारे साथ जो भी लड़कियां जुड़ी हैं, उनमें से ज्यादातर सब जो प्राइवेट काम करने वाले, ठेला चालक, राजमिस्त्री, किसान, ड्राइवर, ई-रिक्शा चालक, आदि काम करते हैं, उन परिवारों से हैं। यह अधिकांश लोग कहीं ना कहीं मज़दूरी करने का काम करते हैं। यह लोग शारीरिक और मानसिक श्रम करके अपने परिवार की जीविका अर्जित करते हैं। अपने श्रम से वह अपने परिवार का भरण-पोषण ठीक से करने का प्रयास करते हैं। लड़कियों के हिसाब से उनके अभिभावक चाहे जितनी भी मेहनत क्यों ना कर लें, पर ठीक से वह घर की और अपनी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाते हैं। कई लड़कियां घरेलू कामगार परिवार से हैं। घरेलू कामगार औरतें जो घरों में काम करके मज़दूरी करती हैं। इन मज़दूरों का जीवन संघर्ष और कठिनाइयों से भरा होता है। उन्हें समय-समय पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। मज़दूरों के जीवन में संघर्ष, मेहनत और उम्मीद होती है। आने वाला कल शायद अच्छे दिन ले कर आए पर ऐसा होता नहीं है। यह कहानी उन लोगों की है, जो अपने श्रम से दुनिया को आकार देते हैं, फिर भी अक्सर सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हैं।
एक मज़दूर की जिंदगी सुबह से शुरू होती है—हाथों में औज़ार, माथे पर पसीना और दिल में सपने। चाहे वो निर्माण स्थलों पर ईंट-पत्थर उठाने वाले हों, खेतों में काम करने वाले किसान हों, या किसी फैक्ट्री में मशीनों के बीच अपने श्रम से उत्पादन बढ़ाने वाले हों—हर मज़दूर की कहानी अपनी ही अलग अहमियत रखती है।
मज़दूरों के जीवन में संघर्ष है—कम मज़दूरी, असुरक्षित काम करने की परिस्थितियाँ, सामाजिक असमानता। फिर भी इसमें जिजीविषा है, क्योंकि हर मज़दूर अपने परिवार को बेहतर जीवन देने का सपना देखता है। उनकी मेहनत शहरों की ऊंची इमारतों, खेतों की हरी फसल, और कारखानों के उत्पादन में झलकती है।
अगर ठेला लगाने वाले मज़दूर की बात की जाए तो यह शहर और गाँव दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे आम जनता को रोजमर्रा की ज़रूरत की चीज़ें सस्ते दाम पर उपलब्ध कराते हैं। चाहे वह सब्ज़ी, फल, कपड़े या चाय-नाश्ते का समान हो। लेकिन उनका जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ होता है। ठेला लगाने वाले की कोई निश्चित आय नहीं होती। मौसम के प्रभाव से उनके काम और आमदनी दोनों पर असर पड़ता है। कई बार नगर निगम या पुलिस द्वारा भी उनकी रोज़ी-रोटी को प्रभावित करते हैं। शहरों में सड़कों पर ठेला लगाने में स्थान की समस्या होती है। जब ठेला लगाने वाले के पास काम नहीं होता तो उनके परिवार और बच्चों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके बच्चों की शिक्षा पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
इस तरह राजमिस्त्री को भी अपनी अनेक कठिनाइयों और चुनौतियों में अपने परिवार की जीविका को चलना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के कारण आज के समय में मौसम में बदलाव उनके काम को प्रभावित कर रहा है। जब उन्हें काम नहीं मिलेगा तो उन्हें घर चलाने में कठिनाई होगी जैसे घर का राशन, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, और स्वास्थ्य संबंधी खर्च आदि करने में परेशानी आती है।
ई-रिक्शा चालकों को भी कईं तरह की घटनाओं का सामना करना पड़ता है। ई-रिक्शा चालक आमतौर पर दैनिक कमाई करने वाले लोग होते हैं। उन्हें रोज ई-रिक्शा की बैटरी चार्ज करनी पड़ती है। जिससे उनके घर के बिजली का बिल तो बढ़ता ही है साथ ही उनकी आमदनी पर भी प्रभाव पड़ता है। लाइसेंस, परमिट और नियमों का पालन करना उनके लिए जटिल होता जा रहा है। बे तरतीब वाहनों के खड़ा होने, पार्किंग ना होने और बड़े वाहनों का शहर में प्रवेश होने से ट्रैफिक जाम होने लगता हैं। लेकिन माहौल ऐसा बनाया जाता हैं कि ई-रिक्शा चालकों के कारण ही जाम होते हैं, इनके ऊपर इलज़ाम लगाया जाता हैं।
सहादत अली खां केंद्र से जुड़ी लड़कियां यह मानती हैं की कामगार के तौर पर जो सम्मान अभिभावकों को मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता है। पूरी मेहनत करने पर सम्मान जीवन नहीं चल पाता है। कामगार लोगों के पास अपने लिए आराम और सोचने-समझने के लिए समय ना के बराबर है। मेहनत-मज़दूरी करने वाले मज़दूरों के पास हमारे (बच्चों के) लिए भी बहुत कम समय होता है। इसलिए हम (बच्चे) यह चाहते हैं की मेहनत-मज़दूरी करने वाले लोगों को सहसम्मान जीवन के साथ 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे अपने लिए सोचने-समझने और जीने के लिए बनाए नियम मज़दूरों के जीवन में आ पाएं। इसके लिए हम अपने घरों में अपने माता-पिता और बड़ों के साथ बातचीत करेंगे और उनको कामगारों का जीवन कैसे बेहतर हो, इस पर सभी मिलकर सोचेंगे। साथ ही जो लोग कामगारों के श्रम से अपना जीवन संचालित करते हैं, उनको भी इन कामगारों को सम्मान और काम के समय को ध्यान में रखते हुए काम कराने की ज़रूरत है।

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