फुलेश्वर :
नक्षत्र मालाकार का जन्म 9 अक्टूबर 1905 को बिहार के पूर्णिया जिले के समेली गाँव में हुआ था। एक गरीब माली परिवार में जन्मे नक्षत्र का जीवन अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष का जीवंत उदाहरण है। किशोरावस्था में ही उन्होंने साम्राज्यवाद, सामंतवाद, और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ विद्रोह का रास्ता चुना। उनके बड़े भाई, बौद्ध नारायण, कांग्रेस के नेता थे और मझले भाई वासुदेव मंडल बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री पर नक्षत्र ने सत्ता के आराम और समझौतों को ठुकरा कर क्रांति की राह पकड़ी। गांधी के नमक सत्याग्रह से प्रेरित होकर, उन्हों ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सीधा संघर्ष किया। जब वे 42 साथियों के साथ गिरफ्तार हुए और जेल में अमानवीय व्यवहार सहना पड़ा, तो उन्होंने जेल के भीतर भी भूख हड़ताल कर अपना प्रतिरोध जारी रखा।
कांग्रेस से विद्रोह और समाजवाद की ओर कदम
1936 में नक्षत्र ने गांधीवादी कांग्रेस की सीमाओं को पहचान लिया। उन्होंने महसूस किया कि गांधीवादी आंदोलन में सामंतों और जमींदारों का वर्चस्व था, और यह महिलाओं और वंचितों के लिए सुरक्षित नहीं था। उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल होकर, जयप्रकाशनारायण के नेतृत्व में समाजवादी क्रांति का झंडा उठाया। यही वह समय था जब जयप्रकाश ने उनका नाम “नक्षत्र मालाकार” रखा। कटिहार में उन्होंने मजदूरों और किसानों को संगठित किया। उनका मानना था कि असली आजादी तभी संभव है जब आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को जड़ से मिटा दिया जाए। मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने कई बार जेल यात्रा की।
1942 की क्रांति और भूमिगत आंदोलन
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नक्षत्र मालाकार ने कटिहार और आसपास के इलाकों में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्हों ने रुपौली थाना को विस्फोट से उड़ा दिया, जिससे अंग्रेजी शासन हिल गया। इसके बाद उन्हें और उनके 36 साथियों को मुख्य आरोपी बनाया गया।
आजादी के बाद का संघर्ष: सत्ता के खिलाफ विद्रोह
1947 के बाद जब देश आजाद हुआ, नक्षत्र ने पाया कि सत्ता में वही शोषक वर्ग आ गया था। उनके गांव में जब अकाल पड़ा और व्यापारियों ने अनाज गोदामों में छिपा रखा था, तो उन्होंने जनता के साथ गोदामों को लूटकर अनाज गरीबों में बांट दिया। इस साहसिक कदम ने उन्हें किसानों और मजदूरों का नायक बना दिया। उनके नेतृत्व में भूमि आंदोलन हुआ, जिसमें जमींदारों की धोखाधड़ी से कब्जा हुई जमीन को गरीबों में बांटा गया। उनके संघर्ष ने कटिहार और पूर्णिया के दलितों और भूमिहीन किसानों को एक नई ताकत दी।
क्रांति के बीज और विरासत
नक्षत्र मालाकार ने सिर्फ विद्रोह नहीं किया, उन्होंने बदलाव की नींव भी रखी। उन्होंने 90 एकड़ जमीनदान में लेकर बरारी में भगवती मंदिर कॉलेज की स्थापना की, ताकि वंचित समुदाय शिक्षा पा सके। अंतिम दिनों में भी उन्होंने भुवना झील को किसानों के लिए उपयोगी बनाने का आंदोलन जारी रखा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि आजादी सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं , बल्कि शोषण के हर स्वरूप के खिलाफ बगावत है। नक्षत्र मालाकार हमारे लिए एक संदेश हैं—जब तक अन्याय और असमानता है, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।

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