विनीता कुमारी:
इसका नाम काठगोदाम क्यों पड़ा होगा ?
5 सितम्बर को हमारी टीम उत्तराखंड पहुँची। काठगोदाम रेलवे स्टेशन के बारे में मैंने बहुत सुना था। पहाडों के बीच एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन है, जहाँ से कोई ट्रेन आगे नहीं जाती है। मेरे मन में जिज्ञासा हो रही थी कि इसका नाम काठगोदाम क्यों पड़ा होगा, तब ही मैंने अपने गाड़ी के चालक और नेचर एडुकेशन रिसर्च सेंटर के जगदीश बिष्ट जी ने बताया की यह स्टेशन अंग्रेज़ों के द्वारा बनाया गया। उनको यहाँ से अपनी रेल की पटरियों को बिछाने के लिए लकड़ियों की ज़रूरत थी। इसलिए इस जगह को लकड़ियों के गोदाम के तौर पर बनाया गया। यहाँ के जंगलों से लकड़ियाँ काटकर बाहर भेजी जाती थी। मेरे लिए यह सब सुनना एक रोमांच भरी बात है, जिसको मैं खुली आँखों से देख रही थी।
चाय के बागान
काठगोदाम से लगभग एक घंटा हमारी गाड़ी चली होगी कि हम एक चाय के बागान में पहुँच गए। चाय की हरी पत्तियों से नज़र हटाने का मन नहीं कर रहा था। पत्तियों को कई बार छू-छू कर देखा। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं चाय के बागान के बीच खड़ी हूँ। चाय के खेतों को मैंने इससे पहले फोटो और टीवी में ही देखा था। यह मेरे लिए बहुत ही सुखद अनुभव था। यहाँ से हमारी टीम भवाली की तरफ निकली, जहाँ हमको वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के साथी तरुण दा मिले। उन्होंने हमको उत्तराखंड के संबंध में जानकारी दिया – यहाँ युवाओं के लिए क्या अवसर हैं, गाँव में लड़कियों की पढ़ाई के लिए किस तरह के स्कूल हैं, वन पंचायत के साथ किस तरह से गाँव में काम करते हैं यह सब जानकारी उन्होंने हमें दी। साथ ही यह भी बताया की कल हमारे टीम के साथ, पास के एक गाँव भालूगाढ़ में बैठक का आयोजन किया जाएगा। जहाँ हम लोग सीधे तौर पर देखेंगे की वन पंचायत संगह्र्ष मोर्चा संगठन के साथ किस तरह से काम करते हैं। शाम होते-होते हम लोग मुक्तेश्वर के लोधगल्ला गाँव पहुँचे जोकि गोपाल भाई का गाँव है।
उत्तराखंड के लोगों का जीवन
शाम में हमारे इस शैक्षणिक भ्रमण का संयोजन कर रहे साथी गोपाल भाई के साथ एक मीटिंग का आयोजन हुआ। जहाँ उनके साथ परिचय के साथ बातचीत शुरू हुई। गोपाल भाई की बेटी पावनी से भी हमारा परिचय हुआ। उसने लोधगल्ला गाँव के बारे में बताया। साथ ही हमे लड़कियों की पढ़ाई के लिए लंबी दूरी पैदल तय करना, पानी के लिए नीचे उतरना और ऊपर पानी लेकर जाना। यहाँ सभी काफी मेहनत से अपना जीवन चला रहे हैं। कोई भी काम आसानी से नहीं होता है, सब काम के लिए मेहनत करना होता है। यहाँ हर तरफ घूमने की जगह अच्छी है। यहाँ नदी है, झील है, जंगल हैं। जो हमको बहुत खुशी देते हैं। उसने एक कविता भी हम सभी को पढ़कर सुनाई। पावनी ने ये कविता खुद से लिखी थी, यह मेरे लिए बड़ी बात थी।
अगले दिन हम लोग वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के साथियों के साथ एक बैठक में शामिल हुए। जहाँ मुझे समझ आया की दो अलग-अलग ग्राम पंचायत के लोगों के बिच में उनके गाँव में आने वाले पानी को लेकर आपस में कुछ तनाव हो गया था। इस तनाव को कम करने या खत्म करने के लिए संगठन के साथियों की बैठक का आयोजन किया जा रहा था। हमारे साथ साथियों ने बातचीत किया और अपने गाँव की पंचायत कैसे काम करती है, यह जानकारी दिया। हमें भालूगाढ़ वाटरफॉल के बारे में भी पता चला और ये जानकारी भी मिली कि जो पैसा इसके पर्यटन से आता है, उस पैसे को युवाओं के काम, गाँव की साफ-सफाई, स्कूल और अन्य कल्याणकारी कामों में लगाते हैं। भालूगाढ़ पंचायत समिति लंबे समय से काम कर रही है, जिससे सैकड़ों युवाओं को काम मिला है। यहाँ से हम लोग भालूगाढ़ घूमने के लिए गए। वहाँ मैंने देखा की बहुत साफ-सफाई थी। नीचे वाटर फाल में जाने के लिए लंबा रास्ता था, सभी चीज़ें तरतीब से रखी हुई थी। कोई गंदगी किसी तरफ नहीं थी। वॉटरफॉल पहुँचने के बाद हमें बहुत ही मजा आया। सब ने बहुत ज्यादा मनोरंजन किया। फिर हमारी एक मीटिंग तरुन दा के साथ भालूगाढ़ वन पंचायत समिति के दफ्तर में, वन पंचायत समिति के सदस्यों के साथ हुई। मीटिंग से मुझे समझ आया कि वहाँ रहने वालों के लिए बहुत सी चुनौतियाँ हैं। पढ़ने के लिए पास में कोई स्कूल नहीं है, ईलाज के लिए पास में हॉस्पिटल नहीं। लोग यहाँ खुश हैं, चुस्त दुरुस्त भी हैं।

रामनगर में महिलाओं के साथ में चर्चा
विजिट में हम रामनगर पहुँचे, संगठन की साथी हेमा जोशी जी से मिलने। वहाँ उनके साथ जुड़ी महिलाओं के साथ हमारी मीटिंग हुई। सभी ने एक दूसरे का परिचय किया और अपने कामों के बारे में बताया। हेमा जी की टीम में शामिल महिलाएं बांस से हैंडक्राफ्ट बनाने का काम करती हैं। बांस की लकड़ियों से पेन पॉट, छोटी झबिया, डलिया, आदि भी बनाया जाता है। यह सब देखने के बाद वहीं की लड़कियाँ कहाँ पढ़ाई करती हैं, क्या-क्या सीखती हैं, उनके पास अपने लिए सीखने-समझने का क्या अवसर है, इस विषय पर चर्चा-बातचीत हुई। संगठन में शामिल लड़कियाँ अधिकांश पढ़ाई तो कर रही हैं, पर किशोरियों के लिए बहुत स्पेस समुदाय में नहीं है। उनको एक खास तरह का जीवन ही जीना होता है। महिला सुरक्षा को लेकर भी चर्चा में बात आई थी। महिलाओं को लेकर समुदाय में काफी चिंता है। जो सामाजिक-राजनीतिक माहौल है, उसने लोगों को महिलाओं के विषय में काफी सोचने की दिशा में लगाया है।
यहाँ से हम लोग नैनीताल घूमने गए। जोकि तल्लीताल और मालीताल को दोनों तरफ से देखा। अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई माल रोड पर भी घूमे। सभी के साथ घूमने में बहुत मज़ा आ रहा था। मौसम भी बहुत सुहाना था। जोकि हमारे इस भ्रमण को खुशगवार बना रहा था। हमको यहाँ की छोटी-छोटी दुकाने, उसमें भी तरह-तरह की मोमबत्तियों की दुकानों ने काफी प्रभावित किया। इस जगह पर काफी सैलानी घूमने के लिए आते हैं। यह जगह पर्यटन की नज़र से बहुत सुंदर हैं। मुझे आगे अवसर मिलेगा तो मैं अपने परिवार के साथ ज़रूर जाऊँगी।

उत्तराखंड के लोगों से बातचीत
अपने शैक्षणिक भ्रमण के आखिरी दिन हम लोगों को एक टास्क मिला था। हम सबको यहाँ के रहने वाले कुछ परिवारों से बातचीत करनी थी। उनका व्यवहार कैसा है, कैसे काम करते हैं, किस तरीके से रहते हैं? यह सब कुछ जानना था। वहाँ पर हमें कुछ मज़दूर महिलाएं मिली। वह लेबर का काम कर रही थी। उनसे हम लोग ने बातचीत किया। उनसे बात करके यह समझ में आया की इतना मेहनत वाला काम यह सारे लोग कर रहे हैं। लेकिन उनके चेहरे पर वही हंसी, खुशी थी। हम लोगों को ज़रा-सा काम दे दिया जाता है तो हम लोगों का मुँह बन जाता है कि धूप में नहीं जाएंगे, पर उनको देखकर ही अच्छा लग रहा था कि यह इतना मेहनत कर रही है, ऊपर-नीचे आना-जाना, इतनी चढ़ाई थी, मगर चेहरे पर एक बल नहीं। हम लोग इतना डर रहे थे कि एक बार जाते हैं तो दूसरी बार हम लोगों की हिम्मत नहीं होती थी। पर वह लोग दिन भर में 10 चक्कर लगा करके ऊपर-नीचे करती हैं।
वहाँ के लोगों का व्यवहार बहुत ही अलग था। बहुत ही अच्छा था। उनसे बात करने में मिठास की झलक मिलती थी। हम अगर अयोध्या की बात करें तो हम लोग जब किसी काम के लिए जाते हैं या फिर सर्वे करने जाते हैं तो सीधे मुँह कोई हमसे बात नहीं करता। लोग दरवाज़े भी नहीं खोलते हैं। वहीं से आवाज दे देंगे की कोई नहीं है, हम नहीं मिलेंगे, पर यहाँ ऐसा नहीं था। यहाँ के लोग घर में बुलाकर, बैठाते थे, पानी देते थे। गोपाल भाई ने हम सबको टास्क दिया था कि हम सब कुछ लोगों से बात करेंगे। उनके घर से खीरा लेकर आएंगे, खीरा लेकर तो नहीं आए पर उन लोगों ने हमको अपने घर में बैठाकर खीरा खिलाया ज़रूर। यह बहुत ही अच्छा लगा कि वहाँ के रहने वाले लोगों के अंदर ऐसा कोई भी भेदभाव नहीं है कि कोई बाहर से आया है तो पता नहीं कौन कैसा है कैसा नहीं। यह उनके मन में बिल्कुल भी नहीं था। सबने अच्छा व्यवहार किया। सबसे ज़्यादा हम सब देख रहे थे कि यहाँ के बच्चे स्कूल कैसे जाते होंगे। एक तो वहाँ का रास्ता बहुत ही खतरनाक था फिर वहाँ पर आसपास कोई ऐसा स्कूल नहीं है। सारे स्कूल दूर-दूर थे। 5-7 किलोमीटर की दूरी पर स्कूल हैं। हम चार से पांच किलोमीटर की दूरी के लिए ही रिक्शा करते हैं, पर वहाँ के छोटे-छोटे बच्चे खुश होकर के पैदल जाते और उनका डेली का यही रूटीन था कि स्कूल जाना है फिर भी वह सब नहीं थकते थे। एक सवाल यह भी निकल कर आया कि यहाँ के बच्चे पढ़ करके क्या करेंगे, क्योंकि वहाँ पर कोई भी काम नहीं दिख रहा था, कुछ भी ऐसा नहीं है। पहाड़ी इलाका है, सिर्फ लोग खेती–किसानी करते हैं। उसके सिवा उनके पास कोई भी व्यवसाय, कोई भी अलग काम नहीं है। फिर भी वहाँ के बच्चे पढ़ रहे हैं। उनके पैरेंट्स उनको पढ़ा रहे हैं कि कुछ करेंगे ही, यहाँ नहीं तो शायद बाहर जाकर करें।
उत्तराखंड में रहने वालों की बात करें तो वहाँ पर आसपास ना ही कोई दुकान है और ना ही कोई हॉस्पिटल। उनके लिए तो शायद नहीं पता कैसा होगा लेकिन हम सबके लिए यह एक बड़ा चैलेंज है। अस्पताल और दुकान होना आसपास में बहुत ज़्यादा ज़रूरी है। कोई बीमार पड़ता है या रात में ही कभी किसी को तकलीफ ज़्यादा होती है तो इसके लिए इन सबकी सुविधा होनी चाहिए। हम अपनी बात करें तो अगर हमें कोई वहाँ रहने को कहेगा तो शायद हम यह एडजस्टमेंट कर ही नहीं पाएंगे। और हाँ, वैसे लोधगल्ला में लोगों को फास्टफूड खाने की आदत नही हैं जिनसे उन्हें बीमारियों का उतना सामना नहीं करना होता। अभी तो बहुत सारे लोग हैं जो वन पंचायत समिति के सदस्य हैं, उत्तराखंड में सुधार लाने के लिए कोशिश में लगे हैं। सबसे अच्छा देखने को ये मिला की उत्तराखंड बहुत ही शान्ति और सुकून वाली जगह है। वहाँ पर्यावरण साफ़ और स्वच्छ था जो कि बहुत ही सुंदर है।

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