इरशाद अहमद:
असंगठित कामगारों की स्थिति आज कैसी है, उनके घर परिवार में कैसे उनका जीवन गुजर- बसर हो रहा है।
असंगठित क्षेत्र में लगभग 80 प्रतिशत लोग आते हैं। जो हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। जिनके श्रम से आबाद हैं यह सारा जहाँ, उनके लिए हमारे पास क्या बेहतर जीवन देने की सोच हैं? यह सभी को सोचना हैं।
आज मैं घरेलू कामगार महिलाएं के संबंध में, जो मैंने अपने आस-पास देखा है, उसके बारे में लिख रहा हूँ। हमारे यहाँ घरेलू कामगार महिलाएं काफी संख्या में हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि जब वह काम करने जाएगी तभी इनको मजदूरी मिलेगी वरना उनकी दिहाड़ी काट दी जाती है। घरेलूू कामगार की महिलाओं की यह स्थिति है कि अगर वह किसी दिन बीमारी या कोई कारण की वजह से काम पर नहीं जा रही हैं, तो वह अपने घर के किसी एक व्यक्ति को भेजने के लिए विवश होती है। वह अपनी बेटी को या अपने बेटे को या घर के और किसी अन्य सदस्य को काम पर भेजती है। अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो अगले दिन दूसरों को काम पर रख लेते हैं और उन्होंने जो पीछे काम किया हैं, वह भी पैसा मारा जा सकता हैं, या समय पर मिलना संभव नहीं होता।
ऐसी स्थिति में घरेलू कामगार महिलाओं के बच्चों की पढ़ाई और उनका बचपन खोता हैं। अपनी माँ के साथ या उनको कोई समस्या होने पर उनका काम पर जाना उनके लिए ऐसा अवसर बनाता है कि यही काम उनको करना हैं। इस तरह से बच्चों का दिमाग पढ़ाई या अपना भविष्य बनाने की तरफ नहीं जाता दिखाई देता है।
कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है पर पीढ़ियों से सेवा और चाकरी करने का काम कुछ खास लोगों को करने की दिशा में परिस्थितियों को बनाते हुए सहज तरह से भेजा जा रहा है। घरेलू कामकाज महिलाओं को अक्सर गलत व्यवहार का भी शिकार होना पड़ता है । घर से बाहर या जिस घर में काम करने जाती है वहां भी उनको अपनी सुरक्षा स्वयं करनी पड़ती है। अगर वह घर पर अपनी दिक्कतें परेशानियां बताती हैं तो उनके घर के सदस्य उन्हीं को गलत ठहराकर, बातों को अनसुना कर देते हैं ।
ऐसे में घरेलू कामगार महिलाओं के लिए इस श्रम विभाग में रजिस्ट्रेशन करने का और उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार को नियम बनाने चाहिए । घरेलू कामगार महिलाओं के लिए कुछ ऐसा कानून बनने चाहिए जिससे उनको ज्यादा से ज्यादा योजनाओं का लाभ मिले व उनके साथ कोई भी दिक्कत या परेशानी ना हो। उनकी बीमारी पर उनके बच्चे घर पर ही रहे, उनको काम पर ना जाना पड़े ऐसा आदेश भी कानून में होने चाहिए। घर की महिलाएं अपने घर की बेटियों को इसलिए भेज देती हैं ताकि उनका पैसा ना काटे अगर यह सब पैसे में कटौती न हो तो कोई भी मां अपनी बेटी को यह कम करने नहीं देगी ।
घरेलू कामगार महिलाओं को सभी काम करने के एक महीने के Rs. 3,000 से Rs. 4,000 ही मिलते है, बल्कि उनको पैसे काम के हिसाब से मिलना चाहिए, जैसे पांच आदमी के अगर कपडे धोने है तो उसके अलग पैसे, खाना बनाने, बर्तन धोने के अलग पैसे और घर की साफ सफाई गार्डन की साफ सफाई के अलग पैसे । काम के हिसाब से पैसे की बात होनी चाहिए लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं होता है ।
समय का भी कोई एक फिक्स नहीं है। कभी-कभी तो घर की महिलाएं रात के 10:30 बजे तक आती है। अगर नियुक्ति के घर पर कोई गेस्ट आ गए हो या उनके घर पर कोई प्रोग्राम है तो उनका भी समय वह एक्स्ट्रा लगाती हैं पर उसका कोई एक्स्ट्रा पैसा नहीं मिलता है। ऐसे में कामगारों की स्थिति इस कदर खराब हो गई है कि घरेलू कामगार महिलाएं सोचती है कि घर बैठे जॉब मिल रहा है चलो वही करते हैं ।
अगर पैसे की बात करें तो उनके घर के पुरुष लोग उनके पैसे के हकदार बन जाते हैं। महिलाओं के हाथ से उनके घर के पुरुष पैसे छीन लेते हैं और उस पैसे का नशा करने के अलावा और कुछ उपयोग में नहीं लाते हैं । अगर पैसा उनके बैंक अकाउंट में जाएगा तो शायद उनका पैसा सेफ रहेगा। कई सारी महिलाओं से हम लोगों ने इस बारे में बात किया तो इस पर महिलाएं काफी खुश हुई और बताया है कि अगर ऐसा हो जाए भैया तो हम लोगों का बहुत पैसा बचेगा । हमारा पैसा हाथ में रहता है तो हम लोग खुद ही नाजायज के साथ बहुत खर्च कर देते हैं । अगर पैसा डायरेक्ट बैंक में जाए तो शायद हम लोग इतना खर्च न करें, ना ही हमारे घर के पुरुष हमारे पैसे छीन सकेगे ।
महिलाओं के काम को लेकर अगर हम लोग बातचीत किए हैं तो बातचीत में या निकल कर आया है कि आजकल इतना लोग काम करने वाले हो गए हैं कि हम अगर कहीं Rs. 2000 बताते हैं तो दूसरे लोग जाकर Rs. 1500 में करने को तैयार है । उसमें उनकी कोई गलती नहीं है, उनके घर की स्थिति इतनी खराब होती है कि वह सोचती हैं घर बैठने से अच्छा चलो कुछ भी मिले काम तो करें ताकि हमारे घर के बच्चे को दो वक्त का खाना मिल सके । कभी-कभी हम लोगों को बहुत गुस्सा आता है लेकिन क्या करें, जब उनके बारे में पता चलता है कि उनके घर के हस्बैंड कुछ काम नहीं करते हैं बल्कि इन्हीं के भरोसे बैठे रहते हैं और इसी से ही पैसा छीनकर दारु-शराब पीते हैं तो हमारा गुस्सा शांत हो जाता है ।
महिलाओं के इतना संघर्ष करने के बावजूद भी उनको अपने ही समाज में और अपने ही घर में कोई भी इज्जत नहीं दी जाती है चाहे वह कमाए या ना कमाए । ज्यादातर घरेलू कामगार महिलाएं पीड़ित होती हैं और केवल अपने घर में वही एक कमाने वाली होती है। समाज में चाहे पुरुष कमाता हो या न कमाता हो, उसको फिर भी समाज में महिला से कई ज़्यादा इज्जत और सम्मान दिया जाता है।

Leave a Reply