बीजू टोप्पो:

विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर प्रस्तुत हैं अलग-अलग आदिवासी समुदायों की विशेष कलाएँ और इन पारंपरिक कलाओं को आज भी अपनी रचनाओं के ज़रिये जीवित रखते कलाकार। इस बदलते दौर में जब ये कलाएं और इनका ज्ञान विलुप्त होता जा रहा है, तो यह ज़रूरी हो जा रहा है कि इन कौशलों को जीवित रखने वालों का दस्तावेजिकरण होता रहे। इसी को ध्यान में रखते हुये सलग्न है कुड़ुख, वारली और गोंडी चित्रकारी के बारे में जानकारी इन्हीं रचनाकारों की ज़ुबानी –

सुमती भगत: कुड़ुख चित्रकार – मिलिए सुमति भगत से। सुमति, छत्तीसगढ़ के जशपुर ज़िले की रहने वाली हैं। वे कुड़ुख (उरांव) पेंटिंग व चित्रकारी करती हैं।

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राजेश चैतिया: वर्ली चित्रकार – राजेश चैतिया एक वर्ली चित्रकार (पेंटर) हैं। अपनी कला को कागज़ पर उतारते हुए रामगढ़ के पास पतरातू डैम के किनारे काम करते हुए राजेश के बारे में और जानिये इस विडियो के माध्यम से।

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नरेश श्याम: गोंडी चित्रकार – फेमस चित्रकार (पेंटर) जनगढ़ सिंह श्याम के परिवार से ही नरेश श्याम जी हैं। नरेश गोंड समुदाय से जुड़ी गोंडी चित्रकारी करते हैं। आप नरेश व उनकी कला के बारे में इस विडियो के माध्यम से और जान सकते हैं।

Author

  • बिजू टोप्पो, झारखंड के रांची ज़िले के एक मानवशास्त्रीय और आदिवासी डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं, जो कुड़ुख समुदाय से हैं। वे फिल्मों और डाक्यूमेंट्री के माध्यम से आदिवासी समुदायों के मुद्दों और पारंपरिक इतिहास का दस्तावेज़ी करते हैं। बीजू उन पहले आदिवासी फिल्म निर्माताओं में से एक हैं जिन्होंने ‘मुख्यधारा’ मीडिया द्वारा अपने समुदाय के गलत चित्रण का मुकाबला करने के लिए कैमरे का प्रभावी ढंग से उपयोग किया है। वह रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में वीडियो प्रोडक्शन पढ़ाते हैं। उनके काम को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली है और वे राष्ट्रीय पुरस्कार के विजेता हैं।

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