हीरालाल लववंशी:
भीलों का इतिहास बहुत पुराना रहा है। समय-समय पर इन्होंने अनेक राजाओं को विजय करवाने में एक सैनिक के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कहा जाता है कि अशोक को भी भील सेना की वजह से ही युद्ध में विजय प्राप्त हुई थी।
मुलतः यह लोग जंगलों में रहते थे। जंगल से प्राप्त फल, फूल, कन्द-मूल से ही अपना जीवन यापन करते थे। जंगलों से निकल कर इन्होंने कई नगरों को बसाने का भी काम किया। अपनी शक्ति एवं शौर्य बल से इन्होंने सेना का संगठन करके अपने शासन को आगे बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। हमारे देश में अनेक भील राजा हुए। राजस्थान में लम्बे समय तक भील राजाओं का ही राज रहा। उनमें से मुख्यत राजा हैं:
- राजा पूंजा
- राजा बांसिया
- राजा डूंगरिया भील
- राजा कोटिया भील
- राजा जैतसी परमार भील
इस प्रकार से हमारे देश के ज्यादातर हिस्सों में भीलों का प्रभुत्व स्थापित था। इन्हीं में से एक मनोहर भील थे। इन्होंने भी 500 साल पहले मनोहर थाना नगर बसाया। इनके बाद 1675 में चक्रसेन भील हुए। यह यहाँ के प्रमुख शासक थे। इनकी सेना में 500 भील घुड़सवार एवं 800 धर्नुधर थे। इन्होंने कालीखाड़ एवं परवन नदी से घिरे जलदुर्ग का निर्माण करवाया। दुर्ग के एक ओर गहरी खाई थी जिसमें सुरक्षा के हिसाब से हमेशा पानी भरा रहता था।
एक किवदन्ती यह भी बताई जाती हैं कि राजा मनोहर भील के पास ‘पारस’ पत्थर था। यदि इस पत्थर को लौहे से रगड़ देते थे तो वह सोने का बन जाता था। आस-पास के लोग इन्हें प्रजा हितैषी मानते थे। यह बात कोटा के राजा कोटिया भील को पता चली तो बल के साथ उन्होंने राजा मनोहर भील पर आक्रमण कर दिया। राजा गुप्त दरवाज़े से निकल कर खाताखेड़ा के किले की ओर जाने लगा। जैसे तैसे करके राजा मनोहर भील अपनी जान बचाकर मध्य प्रदेश की ओर रवाना हो गया। इन सब में दुर्भाग्य से पारस पत्थर परवन नदी में गिर गया था। कोटिया भील ने नदी में पारस पत्थर को बहुत ढुंढवाया लेकिन वे उसे खोज नहीं पाया। इसके बाद काफी सालों तक मनोहर थाना नगर में कोटिया भील राजा का ही शासन रहा।
ऐसा कहा जाता हैं कि राजा मनोहर भील के वंशज आज भी मध्यप्रदेश के ओंकारनाथ में रहते है। वहाँ पर वे प्रत्येक साल नगर में बने ‘रानी सति’ के मन्दिर में भाद्रपद कृष्णपक्ष की चर्तुदशी तिथि को पूजा करने आते हैं। उस समय दो दिन का मेला लगता है।
फीचर्ड फोटो आभार : abpnews

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