प्रेरणा:
खेमराज जी को हमारे बीच से गए 5 साल बीत चुके हैं, उनकी 5वीं पुण्यतिथि के मौके पर पर उनकी कुछ यादें साझा कर रही हूँ। खेमराज जी वह इंसान थे जो मिट्टी में से हीरे को तराश कर उसकी कीमत बताते थे, उन्होंने ऐसे ही कई लोगों की ज़िंदगी बनाई और उनको आगे बढ़ाया। मैं खेमराज जी से पहली बार 18 दिसंबर 2003 को अपनी माँ के साथ मिली थी। मैंने उनके बारे में पहले से सुन रखा था कि उनको लोग बहुत मानते हैं, पूछते हैं और वह जाट हैं। जब वह पहली बार मुझे मिले तो बहुत खुश हुए और वह सबको यह कहते कि यह मेरी बेटी है, और मुझे भी बहुत अच्छा लगता था क्योंकि मैंने बचपन से कभी पापा का प्यार नहीं पाया था। जब वो मुझे कहते कि यह मेरी बेटी है तो मुझे बहुत अच्छा लगता था।
जब मैं बासा से मिली थी तब मेरी शादी हो चुकी थी और मेरा भी बाल विवाह हुआ था, जिससे मेरी शादी हुई थी वह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था। मैं भी समाज के रीति रिवाज में दबी हुई थी, शायद मेरे पापा नहीं थे इसलिए उस वक्त हिम्मत से बोलना नहीं जानती थी। बासा मुझे मीटिंग में साथ ले जाते थे, जब वो कहते कि अपना परिचय दो तो मैं दे नहीं पाती थी और पूरा समय कमरे में चुपचाप बैठी रहती थी, फिर वह बहुत गुस्सा होते और कहते, “यह कुछ नहीं कर पाएगी।” फिर उन्होंने सबसे पहले तिलोनिया रात्रि शाला विद्यालय में ट्रेनिंग लेने के लिए भेजा और वहाँ पर वह रोज़ फोन करके मेरी गतिविधियाँ पूछते थे और कहते थे कि अगर मुझे कोई शिकायत मिली तो देखना।
मेरी ससुराल की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, फिर मैंने पढ़ाई और काम करना शुरू कर दिया था। मुझे पहली बार तिलोनिया से फैलोशिप मिलना शुरू हुआ। मैंने ईट भट्ठे पर कार्यरत मज़दूरों के साथ काम करना शुरू किया, तब मुझे पता नहीं था कि यह धरने रैली इतना खतरनाक होते हैं। बासा मुझसे यह कहते थे कि इन लोगों के लिए काम करना है और इनका जो काम नहीं हुआ वह करवाना है, तो मैं मीटिंग करती और बासा बताते थे कि कैसे काम करना है क्या करना है। हम रात को जाकर भट्ठे पर मीटिंग करते थे उनके साथ खाना खाते थे और वही रहते थे। एक बार हमारी जान पर बन आई, भट्ठों के मालिक हमें मारने के लिए आ गए। फिर जो मेरे साथ काम करते थे उन्होंने कहा कि चलो यहाँ से तुम्हें मरना है क्या, पर मुझे यह चीज समझ में नहीं आई, क्योंकि बासा डरते नहीं थे, वह आराम से रहते थे। मुझे यह लगता था कुछ नहीं हुआ है।
इसके बाद मैं सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी, तब बासा ने कहा कि तू जहाँ जा रही है वहाँ तेरी ट्रेनिंग लेने वाले सब ज्ञानी लोग होंगे। सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े अमित भाई, देवेंद्र भाई, जयश्री ताई, श्वेता जी और सत्यम भाई के बारे में जब बासा ने मुझे बताया तो मैं पहली दफ़े तो डर गयी थी, लेकिन पहले शिविर से वापस आने के बाद मैं कई सवालों पर बासा से चर्चा और बहस करती थी फिर बासा कहते कि यह तो मेरे से भी ऊपर चली गई। बासा के कई कहानियाँ और कई किस्से मैं सुनती थी, ऐसा ही एक किस्सा मेरे सामने का ही है। हमारे यहाँ पास के अमरपुरा गाँव में कैलाश माली नाम का एक व्यक्ति रहता है जो हर साल रामदेवरा पैदल जाने वाले व्यक्तियों के लिए रसोड़ा लगाता है। उसमें खाना-पीना सब फ्री है, एक बार शाम को बासा वहाँ चले गए उससे पूछा कि यह तुम क्यों लगाते हो। उसने कहा मुझे रामदेव जी ने बेटा दिया है तो पहले बासा ने उसकी फोटो खींची और फिर उसे कहा कि बेटा तो तेरी पत्नी ने दिया है, रामदेव जी ने थोड़ी दिया है। यह सुनते ही उसे आदमी को गुस्सा आया और बासा ने यह पोस्ट फेसबुक पर डाल दी। अगले दिन वह व्यक्ति बासा को पीटने के लिए आ गया फिर भी बासा अपनी बात पर अड़े रहे कि बेटा रामदेव जी ने नहीं उसकी पत्नी ने दिया है। मैंने उनके साथ ज़्यादा समय तब बिताया जब उनको कैंसर हो गया था। जब उनको कैंसर हुआ तो उन्होंने सबसे कहा कि कैंसर के कारण मैं अगर चिड़चिड़ा हो जाऊंगा तो तुम लोग मुझसे नफरत मत करना, तुम्हें मेरी सेवा भी करनी पड़ेगी जो मैं करवाना नहीं चाहता हूँ।
कैंसर की बीमारी का पता चलने के बाद वह बहुत दुखी हो गए थे। उन्होंने मुझे फोन पर जब इसके बारे में बताया तो मैं ससुराल में थी। फिर उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला जिसमें उन्होने अपने साथियों को लिखा कि अलविदा साथियों अब जाने की बारी आ गई है। उनके सभी साथियों ने कहा कि हिम्मत मत हारो, हम सब तुम्हारे साथ हैं, क्योंकि बासा के पास इलाज करवाने के लिए पैसा भी नहीं था। उनके एक दोस्त ने उनका अकाउंट नंबर लेकर फेसबुक पर शेयर किया। लोगों ने उनको बहुत सपोर्ट भी किया पर उस टाइम आधारशिला की स्थिति अच्छी नहीं थी और आधारशिला स्कूल किराए पर चल रहा था। आधे आधारशिला स्कूल पर मकान मालिक, दूसरा मकान बना रहा था तो लड़कियों को पढ़ने और बैठने में बहुत दिक्कत होती थी। बासा ने इलाज के लिए जो पैसे जमा हुए उनसे आधारशिला के लिए ज़मीन खरीदी और उसमें एक टीनशेड वाला हॉल बनवा दिया। सारा पैसा इसी में ही खर्च हो गया, उनका कहना था कि मेरा तो समय आ गया, मुझे अब जाना है लेकिन मैं चाहता हूँ कि ज़रूरतमंद बच्चियाँ पढ़ें और आगे बढ़ें।
बीच में जब उनका कैंसर थोड़ा ठीक हो गया था, तब किसी व्यक्ति ने सर्दी में कंबलें बाँटने को दिये। वह कंबल बाँटने का काम में इतना लग गए कि फिर उनकी तबीयत बिगड़ गई। जब वह कंबल बांटने जाते थे तो पहले महिलाओं से पूछते थे कि तुम्हारी स्थिति क्या है, सब कुछ देखकर फिर कंबल देते थे। जब मैं उनके लिए खाना बनाती, उनको मिलती और उनका काम करती तो मुझे देखकर वो कहते कि तू मेरी बहुत सेवा करती है, अपने दोस्तों को भी यही बोलते थे। उनके दोस्त जब उनके साथ वक़्त बिताते थे तो बासा के साथ गाना गाते थे। डॉक्टर ने भी अंत समय में उनको बहुत डरा दिया था कि तुम्हारा कैंसर फटेगा तो तुम्हारी हालत ज़्यादा खराब हो जाएगी। जून के महीने में जब उनका आखिरी समय आ गया था तो वह यह सोचते रहते थे कि इस बार मैं लड़कियों से नहीं मिल पाऊंगा। बासा कहते कि जब मैं चला जाऊँ तो इस व्यक्ति को फोन कर देना, मेरी दाढ़ी मत कटवाना और वो मुझे कहते थे कि तुम मुझे शमशान ले जाना और पहली अग्नि तू ही मुझे देना। उनकी आखिरी इच्छा अपने बेटे से बात करने की थी। हमने कई बार कोशिश भी की, पर उनके बेटे ने उनसे कभी बात नहीं की। जिस दिन बासा चले गए उस दिन लोगों का यही मैसेज था कि यहाँ का अंबेडकर चला गया, गरीबों का मसीहा चला गया। गाँव के लोग आज भी उनको याद करते हैं और कहते हैं कि बासा ने हमें ठाकुरों के सामने चलना सिखाया, कुर्सी पर बैठना सिखाया और अपने हक-अधिकार के लिए लड़ना सिखाया। इससे ज़्यादा उनके बारे में कुछ और लिख नहीं पा रही हूं, यह सब मेरे लिए बहुत दुखदाई है।

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