धर्मेन्द्र यादव:

कचरा शब्द जैसे ही हमारे ज़ेहन में आता है, हमारे दिमाग में एक तस्वीर बनती हैं गंदगी, मैला, जो सिर्फ घर के बाहर रखने के लायक हैं। समाज में यह धारणा आम है कि कचरा मतलब गंदगी, इस गंदगी के साथ एक मुद्दा और जुड़ा हुआ है कि असंगठित क्षेत्र के कचरा बीनने वाले मज़दूर जो कचरा निपटान के काम में लगे हुए हैं, वह ‘गंदे’ लोग हैं। समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस कूड़ा निपटान के काम में लगा हुआ है, यह मज़दूर दलित और अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। कूड़ा निपटान के काम में न सिर्फ पुरुष और महिलाएँ बल्कि मजबूरी वश बुज़ुर्ग और बच्चे भी लगे हुए हैं। कचरा निपटान के काम में लगे मज़दूर अधिकतर सड़कों, सार्वजनिक स्थानों और गलियों में फेरी लगाकर कूड़ा उठाने का काम करते हैं। यह मज़दूर हर साल मुनसिपालिटी का लाखों रुपये बचाते हैं, क्योंकि अगर यह मज़दूर कचरा बीनने का काम नहीं करेंगे तो मुनसिपालिटी को ठेके पर मज़दूर रखने पड़ेंगे और अगर मुनसिपालिटी ऐसा नहीं करती है तो सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर कूड़े के ढेर लग जाएँगे। इसके बावजूद कचरा बीनने वाले असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के काम को पहचान नहीं मिल पा रही है। हालांकि भारत सरकार द्वारा जारी रूल 2016 में कचरा बीनने वाले मजदूरों को कचरा प्रबंधन प्रणाली में शामिल करना है, परन्तु अभी भी यह पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहा है।

आँकड़ों के अनुसार भारत में करीब 97 प्रतिशत मज़दूर असंगठित क्षेत्र के तहत काम करते हैं। यह असंगठित क्षेत्र के मज़दूर विभिन्न उद्योग धंधों के तहत काम करते हैं। कूड़ा निपटान की पूरी प्रक्रिया में एक बड़ी संख्या में असंगठित क्षेत्र के मज़दूर विभिन्न स्तरों पर लगे हुए हैं। रिसाइक्लिंग इंडस्ट्री आज के युग में अपना अलग महत्व रखती है, इस क्षेत्र में लाखों की तादाद में मज़दूर लगे हैं एवं अपना जीवन यापन कर रहे हैं और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी भूमिका निभा रहे हैं। आज के इस आधुनिकता युग में कचरा बेतहाशा उत्पन्न हो रहा है। चर्चित दार्शनिक बाउमन का यह तर्क वर्तमान स्थिति में बेहद तर्कसंगत है कि आज जब ज़्यादातर लोगों द्वारा समय के अभाव के चलते और बदलती जीवन शैली के चलते ऑनलाइन मार्केट की मांग बढ़ गई है। ऑनलाइन खरीदारी करने पर जो सामान आता है वह दो-तीन स्तरों में सील बद्ध होता है जो कि प्रति व्यक्ति कूड़े की मात्रा को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कारण है। बाउमन का मानना है कि कूड़ा तो उत्पन्न हो रहा है, ऐसे में हमें इसके निपटान में लगे लोगों में महत्व को समझना चाहिए और राज्यों की सड़कों पर साफ-सफाई करने वाले मज़दूरों के योगदान को स्वीकार करते हुए इनके रोज़गार को सुनिश्चित करना सरकारों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।

कूड़ा निपटान की पूरी प्रक्रिया का यदि अध्ययन करें तो हम देखते हैं कि बुनियादी स्तर पर कूड़ा बीनने वाले और कूड़े की छंटाई करने वाले मज़दूर ही पूरी रिसाइक्लिंग चेन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है और यही मज़दूर हाशिये पर हैं। अगर इस प्रक्रिया को हम सैद्धांतिक रूप से देखें तो हम कह सकते हैं कि असंगठित क्षेत्र के यह मज़दूर बुनियादी रूप से कबाड़ को रीसाइकल करके पुनः इस्तेमाल में लाने लायक बनाते हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है और लोगों को रोज़गार मिलता है। गिडवानी का मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था में अहम रोल निभाने के बावजूद भी इन मज़दूरों को दोयम दर्जे में रखा गया है या यह कहना गलत नहीं होगा कि इन मज़दूरों द्वारा उत्पन्न अर्थव्यवस्था को मान्यता देने से इनकार कर दिया गया है।

तार्किक रूप से समझने का प्रयास करें तो हम पाते हैं कि समाज द्वारा इन मज़दूरों को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है, समाज में यह व्यापक सोच है कि हमें यह लोग सिर्फ साफ-सफाई के मकसद हेतु चाहिए। तथाकथित सभ्य समाज इन मज़दूरों के अस्तित्व को मानने के लिए तैयार ही नहीं है। सामाजिक सिद्वांतकार जेम्स ओ कॉनर के अनुसार मार्क्स ने उत्पादन के तीन मुख्य बिन्दु बताए हैं, पहला मज़दूर और उसका श्रम जिसे मार्क्स ने उत्पादन की व्यक्तिगत स्थिति बताया है। दूसरा उत्पादन की सामप्रदायिक सामान्य स्थितियाँ जिसमें संचार के साधन शामिल हैं और परिवहन और सामाजिक बुनियादी ढांचा जिसमें स्वास्थ्य एवं शिक्षा शामिल है। ओ कॉनर का अनुमान है कि शहरों में जहाँ मानव निर्मित जगहों से पूंजी उत्पादन हो सकता है, उसके लिए स्थितियां प्राकृतिक और शारीरिक रूप से अनुकूल होनी चाहिए।

सेंट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की हालिया रिर्पोट के अनुसार भारत में 21 मिलियन टन प्लास्टिक प्रतिवर्ष कंज़्यूम किया जाता है, जिसमें प्लास्टिक बैग, शापिंग बैंग, निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक, खिलौने, पैकेजिंग फिल्म, रैपिंग मटिरियल आदि आते हैं। इस रिर्पोट के अनुसार जितना प्लास्टिक वेस्ट पैदा होता है उसमें से करीब 40 प्रतिशत रिसाइकिल नहीं हो पाता है। एक निजी रिपोर्ट के अनुसार इस्तेमाल होने बाद करीब 60 से 80% प्लास्टिक का पुर्नचक्रण असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों द्वारा किया जाता है। देश के चार बड़े महानगरों में प्लास्टिक वेस्ट सबसे ज़्यादा उत्पन्न होता है, इन शहरों में दिल्ली सभी को लीड करता है उसके बाद मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता आता है।

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