नौशेरवां आदिल:

वैसे तो यह कहानी अररिया ज़िले (बिहार) के एक छोटे से गाँव में रहने वाले एक पिता की कहानी है, पर भारत के विभिन्न गाँव, समाजों और धार्मिक समुदायों में ऐसी कहानियाँ दिखना आम है। एक माता-पिता हैं, जिनके 2 बेटी और 2 बेटे हैं। 6 सदस्यों वाला यह एकल परिवार, ट्रेक्टर चलाकर गुज़र-बसर करता है, खेती की 1 बीघा ज़मीन है। परिवार का लालन-पोषण करते हुए उन्होंने घर बनाने के लिए 3 कट्ठा (6 डिस्मिल) ज़मीन भी खरीदी और अपने बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा भी दे रहे हैं। जब बड़ी बेटी की शादी की बात आई, तो वह लड़का खोजने लगे, लंबी मशक्कत के बाद लड़का मिला और शादी की बात चली। दोनों तरफ से लड़का-लड़की दिखाई की रस्म पूरी हुई और परिवार वालों को रिश्ता पसंद आ गया। फिर बारी आई लेन-देन यानि दहेज के बारे में बातचीत करने की तो तय हुआ कि 2 लाख रुपया और फर्नीचर का सामान बेटी को दिया जाएगा। शादी की तारीख तय हुई, लड़का दूल्हा बनके बारात के साथ आया और सारी रस्म-रिवाज के साथ लड़की को दुल्हन बनाके अपने घर ले गया।

शादी के इंतज़ाम, दहेज, कपड़ा, भोज, बारातियों, और रिश्तेदारों के स्वागत में होने वाले सारे खर्च के चलते उन्हें घर बनाने के लिए रखी ज़मीन को बेचना पड़ा। शादी से पहले बेटी को, जितना हो सका उतना पढ़ाया-लिखाया लेकिन उसका शायद कुछ महत्व नहीं है। अपनी स्वेच्छा से नहीं बल्कि, बेटी की शादी नहीं हो पाने के डर से और समाज के तानों से बचने के लिए उन्होंने शादी के खर्च की व्यवस्था के लिए ज़मीन बेचना ही ठीक समझा। 

इनकी मुश्किलों को देखते हुए, मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि दहेज, दारू, डीजे, बारात, ये किसी धर्म और किसी किताब में नहीं लिखे-बताये गए हैं। इसलिए सभी ऐसी परंपराओं को छोड़ें और आगे के लिए प्रण लें कि इस तरह की बेबुनियाद चीज़ें ना लेंगे और ना लेने देंगे। आगे से किसी भी परिवार के लिए शादी को आसान करेंगे। दहेज़ व इन सब कुप्रथाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे। 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ को मानने वाले, विशेष रूप से ध्यान दें कि दहेज प्रथा से संबंधित कानून को सख्ती से लागू किया जाये और अपने समाज के अंदर सब उसे अमल में लाने के प्रयास करें। बाल विवाह को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएँ।

कुछ बातें धर्म के अनुसार – 

इस्लाम के अनुसार बेटी रहमत हैं। पर जब अपने बेटे की शादी किसी के घर की रहमत से कराने जाते हैं तो फिर दहेज के शक्ल में रुपया, गाड़ी, समान की क्यूँ मांग करते हैं? क्या बेटी तब तक ही रहमत है जब तक वो अपने माता-पिता के घर में हैं? बहु बनाकर ससुराल ले आने के बाद, क्या आपका धार्मिक बातों पर विश्वास नहीं रह जाता? या फिर बेटी के रहमत होने की बात असत्य है?

सनातन धर्म के अनुसार भी तो बेटी घर की लक्ष्मी है। पर उसी लक्ष्मी से अपने बेटे की शादी करने जाते हैं तो धन-लक्ष्मी की मांग क्यूँ करते हैं? क्या वह घर की लक्ष्मी काफ़ी नहीं आपके लिए? या आपको भरोसा नहीं है अपने धर्म में कही बातों पर? इसलिए मेरा कहना है, “लगी है आग तो उसे बुझाने के लिए पानी चाहिए।” 

अगर तुम्हे वंश चलाने के लिए बेटा चाहिए, उसको पूरा करने के लिए बहु भी तो चाहिए। उसके लिए तुम्हे मानवतावादी बनना पड़ेगा, सबको बराबर समझना पड़ेगा। बहु और बेटी को एक समान समझना पड़ेगा, एक जैसा सम्मान देना पड़ेगा। जब कोई बेटी पालेगा तभी तुम्हारे पास बहु आ पाएगी, कोई बेटी तब पालेगा जब उन्हें उसके लालन-पोषण, पढ़ाई, और शादी में आसानी हो। तब जाके किसी को माँ, बहू, ननद, भोजाई, साली, नानी, दादी आदि मिल पायेगी। यही गुजारिश है आप सबसे कि आप लोग सरकार से निशुल्क शिक्षा, स्वास्थ की मांग करें और एक दहेज मुक्त समाज बनाएं। बेटीयों के बाप और बेटी की ज़िंदगी आसान करें, तभी किसी को बहु, किसी को दादी, और किसी को नानी, आदि मिल सकेगी और दुनिया का यह वंश चक्र चलता रहेगा। बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ और बेटियों का सम्मान दो, जैसी बातें केवल दिखावे के लिए ना कहें बल्कि उन्हें पूरे मन के साथ समाज में समता और समानता का दर्जा दें।

Author

  • नौशेरवा आदिल अररिया बिहार से हैं और जन जागरण शक्ति मंच संगठन के साथ युवाओं के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। आदिल सामाजिक परिवर्तन शाला से भी जुड़े हैं।

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