राजेश उपाध्याय:
एक मई को अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाया जाता है, इसे मई दिवस के नाम से भी जानते हैं। इस दिन दुनिया भर के मज़दूर अपने-अपने देशों में, शहरों में, गाँवों में, और कारखानों में मई दिवस को मज़दूरों के त्यौहार के रूप में मनाते हैं। श्रम के सम्मान के लिए और अपना जीवन बेहतर बनाने के लिए अपने सामूहिक प्रयासों के लिए यह दिन एकता और संघर्ष का संदेश देता है।
मई दिवस की शुरुआत कैसे हुई? किस घटना ने दुनिया भर के मज़दूरों को एक सूत्र में बांध दिया?
बात सन 1886 की है। शिकागो उस समय जुझारू वामपन्थी मज़दूर आन्दोलन का केन्द्र था। पहली मई आन्दोलन की मुख्य रणभूमि शिकागो था। यह आंदोलन काम के घंटे आठ तक सीमित करने की मांग से जुड़ा था। एक ‘आठ-घण्टा एसोसिएशन’ काफ़ी पहले ही एक मई की हड़ताल की तैयारी के लिए बन गया था।
पहली मई, शनिवार, 1886, को शिकागो में मज़दूरों का एक विशाल सैलाब उमड़ा और संगठित मज़दूर आन्दोलन के आह्वान पर शहर के सारे औज़ार चलने बन्द हो गये और मशीनें रुक गयीं। मज़दूर आन्दोलन को कभी भी वर्ग-एकता के इतने शानदार और प्रभावी प्रदर्शन का एहसास नहीं हुआ था। उस समय आठ घण्टे कार्य-दिवस के महत्त्व, और हड़ताल के चरित्र और विस्तार ने पूरे आन्दोलन को एक विशेष राजनीतिक अर्थ दे दिया। ‘काम के घण्टे आठ करो’ आन्दोलन पहली मई, 1886 की हड़ताल में अपनी पराकाष्ठा पर था। पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फ़ैक्ट्रियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये।
शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकाला। अल्बर्ट पार्ससंस और अगस्त स्पाइस जैसे मज़दूर नेताओं के जोशीले भाषण के बाद शान्तिपूर्ण सभा समाप्त हुई। पूँजीपतियों ने इसे “आपात स्थिति” घोषित कर दिया था। शहर के तमाम धन्नासेठों और व्यापारियों की बैठकें लगातार चल रही थी जिसमें इस “ख़तरनाक स्थिति” से निपटने पर विचार किया जा रहा था।
दूसरी मई, रविवार अवकाश का दिन छोटी-छोटी बैठकों में गुजरा।
तीन मई, हड़ताल और व्यापक हो गयी। उधर शहर के हालात बहुत तनावपूर्ण हो गये जब मैकार्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कम्पनी के मज़दूरों ने दो महीने से चल रहे लॉक आउट के विरोध में और आठ घण्टे काम के दिन के समर्थन में कार्रवाई शुरू कर दी। जब हड़ताली मज़दूरों ने पुलिस पहरे में हड़ताल तोड़ने के लिए लाये गये तीन सौ ग़द्दार मज़दूरों के खि़लाफ़ मीटिंग शुरू की तो निहत्थे मज़दूरों पर गोलियाँ चलायी गयीं। 6 मज़दूर मारे गये और बहुत से घायल हुए। अगले दिन भी मज़दूर ग्रुपों पर हमले जारी रहे। इस बर्बर पुलिस दमन के खि़लाफ़ चार मई की शाम को शहर के मुख्य बाज़ार ‘हे मार्केट स्क्वायर’ में एक जनसभा रखी गयी। इसके लिए शहर के मेयर से इजाज़त भी ले ली गयी थी।
चार मई को एक ऐसा समा बंधा मानो शहर की तमाम सड़कें ‘हे मार्केट स्क्वायर’ की ओर जा रही हों। मीटिंग रात आठ बजे शुरू हुई। क़रीब तीन हज़ार लोगों के बीच पार्सन्स और स्पाइस ने मज़दूरों का आह्वान किया कि वे एकजुट और संगठित रहकर पुलिस दमन का मुक़ाबला करें। सैमुअल फ़ील्डेन पुलिसवालों को यह बताने की कोशिश ही कर रहे थे कि यह शान्तिपूर्ण सभा है, कि इसी बीच किसी ने मानो इशारा पाकर एक बम फेंक दिया। आज तक बम फेंकने वाले का पता नहीं चल पाया है। यह माना जाता है कि बम फेंकने वाला पुलिस का भाड़े का टट्टू था। स्पष्ट था कि बम का निशाना मज़दूर थे। लेकिन शिकार पुलिस भी बनी। कई मज़दूर और पुलिसवाले मारे गये, कई लोग घायल हुए। पुलिसवालों ने चौक को चारों ओर से घेरकर भीड़ पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। जिसने भी भागने की कोशिश की उस पर गोलियाँ और लाठियाँ बरसायी गयीं। ‘हे स्क्वायर’ खून से लथ-पथ हो गया। छः मज़दूर मारे गये और 200 से ज्यादा जख्मी हुए।
और पैदा हुआ मज़दूरों का लाल झण्डा
इलाका चौतरफा मज़दूरों के खून से लथपथ था। लेकिन मज़दूरों में जोश क़ायम था। एक घायल मज़दूर ने अपने ख़ून से रंगे कपड़े को लहरा दिया, जो मज़दूरों का लाल झण्डा बन गया।
दमन और गिरफ्तारियों का दौर
इस घटना के बाद पूरे शिकागो में पुलिस ने मज़दूर बस्तियों, मज़दूर संगठनों के दफ्तरों, छापाख़ानों आदि में ज़बरदस्त छापे डाले। हज़ारों गिरफ्तार किये गये। आठ मज़दूर नेताओं – अल्बर्ट पार्सन्स, आगस्ट स्पाइस, जार्ज एंजेल, एडाल्फ़ फ़िशर, सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल श्वाब, लुइस लिंग्ग और आस्कर नीबे – पर झूठा मुक़दमा चलाकर उन्हें हत्या का मुजरिम क़रार दिया गया। इनमें से सिर्फ़ एक, सैमुअल फ़ील्डेन बम फटने के समय घटनास्थल पर मौजूद थे। पूँजीवादी न्याय के लम्बे नाटक के बाद 20 अगस्त 1887 को शिकागो की अदालत ने अपना फ़ैसला दिया। सात लोगों – अल्बर्ट पार्सन्स, आगस्ट स्पाइस, जार्ज एंजेल, एडाल्फ़ फ़िशर, सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल श्वाब, लुइस लिंग्ग को सज़ा-ए-मौत और ऑस्कर नीबे को पन्द्रह साल क़ैद बामशक्कत की सज़ा दी गयी। लेकिन बाद में इलिनाय प्रान्त के गर्वनर ने फ़ील्डेन और श्वाब की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया। 10 नवम्बर 1887 को सबसे कम उम्र (22 साल) के नेता लुइस लिंग्ग ने कालकोठरी में आत्महत्या कर ली।
11 नवम्बर, 1887 मज़दूर वर्ग के इतिहास में काला शुक्रवार था। पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फ़िशर को शिकागो की कुक काउण्टी जेल में फाँसी दे दी गयी। 13 नवम्बर को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा शिकागो के मज़दूरों की एक विशाल रैली में बदल गयी। पाँच लाख से भी ज्यादा लोग इन नायकों को आखि़री सलाम देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े।
और मई-दिवस बना अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस
14 जुलाई, 1889 को फ्रांसीसी क्रान्ति की सौवीं सालगिरह पर, पेरिस में, कई देशों के संगठित समाजवादी व मज़दूर आन्दोलनों के नेता एकत्र हुए। वे पेरिस में मज़दूरों का एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन फिर से बनाने के लिए जुटे थे। इसी सभा में में यह फैसला हुआ कि मई दिवस को अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के रूप में सारी दुनिया में मनाया जाए। तब से हर साल एक मई को दुनिया भर के मज़दूर इस दिन मज़दूर दिवस मनाते हैं।
भारत में मई दिवस की शुरुआत
भारत में भी 1862 में ही मज़दूरों ने 8 घण्टे काम की माँग को लेकर कामबन्दी की थी। कुछ तथ्यों के आधार पर जहाँ तक ज्ञात है, ’मई दिवस’ भारत में 1923 में पहली बार मनाया गया था। ‘सिंगारवेलु चेट्ट्टियार’ ने मद्रास से इसकी शुरुआत की। सिंगारवेलू ने इस दिन ‘मज़दूर किसान पार्टी’ की स्थापना की घोषणा की तथा उसके घोषणा पत्र पर प्रकाश डाला। कांग्रेस के कई नेताओं ने भी मीटिंगों में भाग लिया। 1925 में लंदन में रह रहे भारतीय नाविकों ने तो 1926 में लाहौर के तांगा मज़दूरों ने मई दिवस की परम्परा को आगे बढ़ाया। 1927 में मज़दूरों के पहले ट्रेडयूनियन महासंघ एटक के आह्वान पर पर कोलकाता , चेन्नई व मुम्बई में तमाम प्रतिबन्धों को झेलकर भी इसे मज़दूर दिवस के रूप में मनाया गया।
तबसे देश में मई दिवस का सिलसिला अनवरत जारी है – कहीं रस्म-अदायगी के रूप में तो कहीं संघर्षों के संकल्प दिवस के रूप में।
मई दिवस की शहादत के आज 138 साल गुज़र गये। इस दौरान अनगिनत संघर्षों में बहा करोड़ों मज़दूरों का ख़ून इतनी आसानी से धरती में जज्ब नहीं होगा।
आज भी मज़दूरों का संघर्ष जारी है। उन्हें विकास के परिणामों और देश की संपदा में न्यायपूर्ण हिस्सा चाहिए, देश की सरकार और प्रबंधन में हिस्सा चाहिए, सम्मान जनक मज़दूरी/ आमदनी चाहिए, सामाजिक सुरक्षा चाहिए, देश में सबके लिए एक ही गुणवत्ता वाली शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए, काम की सुरक्षित दशाएं चाहिए, बुढ़ापे में सम्मान जनक पेंशन चाहिए, पूरे समाज और सरकार का पूरा सहयोग चाहिए।
( मज़दूर सहयोग केंद्र द्वारा प्रकाशित पुस्तिका पर आधारित)

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