पुखराज रावत: 

राजस्थान में लगभग 4 हज़ार से अधिक चिमनी ईंट भट्ठे संचालित हैं जिसमें लाखों की संख्या में प्रवासी मज़दूर काम करते हैं। ईंट भट्ठा उद्योग बहुत एक बड़ा व्यवसाय है जिसमें हर वर्ष करोड़ों ईंटों का उत्पादन होता है, देश-प्रदेश में करोड़ों लोगों के मकान व इमारतें इन्हीं मज़दूरों की बनाई हुई ईंटों से ही बनते हैं। ईंट भट्ठों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश राज्यों से प्रवासी मज़दूर हर साल 9 से 10 माह के लिए काम करने आते हैं। 

इन मज़दूरों को ठेकेदार के मार्फत अगस्त माह में प्रत्येक परिवार को 20 से 30 हज़ार रुपए पेशगी (एडवांस) देकर सितंबर माह में काम के लिए लाया जाता है। इनकी मज़दूरी का हिसाब सीजन समाप्ति के अन्त में यानि अगले बरस जून में होता है, और इस दौरान इनको खाने-पीने के लिए 15 दिनों में कुछ पैसे खर्ची के नाम पर दिए जाते हैं। अक्सर देखा गया है कि बिहार से आए मज़दूरों को खर्ची के लिए कैश पैसे नहीं दिये जाते, उनको सिर्फ पर्ची दी जाती है जिसे वो दुकान पर ले जाते हैं और दुकानदार उनको राशन दे देता है। यह तरीका मज़दूरों को भी सही नहीं लगता, लेकिन मज़दूर भट्ठा मालिक के सामने बोल नहीं पाते हैं। इस संबंध में भट्ठा मालिकों का कहना है कि बिहारी मज़दूरों को कैश पैसे देंगे तो वो उन पैसों की शराब पी जाएँगे, इसलिए उनको पर्ची दी जाती है। इस संबंध में मज़दूरों का कहना है कि सभी मज़दूर एक जैसे नहीं हैं, कुछ-कुछ ही लोग हैं जो ऐसा करते हैं। पर्ची वाली दुकान फिक्स रहती है और फिर उसी से हमें राशन लेना पड़ता है, इस कारण दुकानदार अपनी मर्जी का भाव बताता है और हमें मजबूरन उसी से सामान खरीदना पड़ता है।

अपने काम के बारे में मज़दूर बताते हैं कि उनको प्रतिदिन 15 से 16 घंटे काम करना पड़ता है, जिसमें बच्चे भी हाथ बँटाते हैं, तब जाकर पूरा परिवार प्रतिदिन 500- 600 रुपए कमा पाता है। काम का कोई तय समय नहीं है, जब नींद खुल जाती है तब काम पर लग जाते हैं। कई बार तो रात को ही काम करना पड़ता है, अगर काम नहीं करो तो खर्ची के पैसे कम दिये जाते हैं जिससे परिवार का पालन-पोषण करना बहुत मुश्किल हो जाता है। खाने-पीने व सोने का भी कोई निर्धारित समय नहीं होता है, अक्सर सभी मज़दूर दिन-रात काम पर लगे रहते हैं। 

भट्ठों पर मज़दूरों के रहने की झोपड़ी भी कच्ची होती है, जिसकी ऊंचाई मात्र 6 फिट और चौड़ाई लगभग 8 फिट होती है। यह पूरी तरह बंद होती है और इसमें हवा के लिए ना तो खिड़की होती है और ना ही जाली होती है, इसमें ही पूरे परिवार को रहना पड़ता है। ईंट भट्ठों पर स्नानघर और शौचालय की व्यवस्था भी नहीं होती है, सभी को खुले में नहाना पड़ता है और शौच के लिए तो भट्ठे की सीमा से बाहर दूसरों के खेतों में जाना पड़ता है, जिसके कारण कभी-कबार खेत मालिक की गालियाँ भी सुननी पड़ती हैं। भट्ठा मालिक को अपनी समस्या बताते हैं तो वो सुन कर भी अनसुना कर देते हैं।

मज़दूर आगे बताते हैं कि हम पूरे परिवार सहित पलायन करते हैं जिस कारण बच्चों को भी साथ में लाना पड़ता हैं, इस वजह से बीच में ही उनकी पढ़ाई छूट जाती है। ईंट भट्ठों पर बच्चों की शिक्षा की भी कोई व्यवस्था नही होती, जिसके कारण हमारे बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं। ईंट भट्ठे, गाँव, कस्बे व शहर से दूर होने के कारण स्कूल भी पास में नहीं होते, ऐसे में बच्चे फ्री रहते हैं तो काम में हाथ बंटा लेते हैं। इसी तरह धीरे-धीरे बच्चे काम सीख जाते हैं और फिर वो भी इसी काम को करना शुरू करे देते हैं।

ईंट भट्ठों में 7 प्रकार के अलग-अलग काम होते हैं, जो इस प्रकार हैं –

1)- थपरे ये कच्ची ईंट बनाने का काम करते हैं। 

2)- भराई वाले ये कच्ची ईंटों को भट्ठे में भरने का काम करते हैं।  

3)- बेलदार ये कच्ची ईंटों को भट्ठे में जमाने का काम करते हैं।

4)- रापस ये मिट्टी को कच्ची ईंटों पर डालने और पक्की ईंटो से मिट्ठी को हटाने का काम करते हैं।

5)- खाखला वाला – ये ईंटों को पकाने के लिए खाखला या तुड़ी डालने का काम करते हैं।

6)- जलाई मिस्त्री – ये कच्ची ईंटो को भट्ठों में पकाने का काम करते हैं।

7)- निकासी वाले –  ये भट्ठों से पक्की ईंटों को बाहर निकालने का काम करते हैं।

इन सभी कामों को करने वाले मज़दूर अलग-अलग होते हैं, जिनका जिसमें कौशल होता है वो उसमें काम करते हैं। पूरे सीजन में कोई छुट्टी नहीं मिलती है, हमेशा काम में ही लगे रहना पड़ता है। मज़दूर बताते हैं कि अगर कभी बीच सीजन में घर जाना हो तो मालिक और ठेकेदार आधी रेट से हिसाब करते हैं। पूरे सीजन काम करने पर ही पूरी मज़दूरी का हिसाब होता है। पूरे सीजन भर काम करने के बाद भी ज़्यादा कुछ बचता नहीं है, सिर्फ घर का खर्चा ही चल पाता है। ईंट भट्ठों की परिस्थितियाँ बहुत ही गंभीर हैं, मज़दूरों को बड़ी मुश्किलों के साथ इन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ईंट भट्ठा मज़दूरों को न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है। इन सब समस्याओं के निवारण के लिए राजस्थान प्रदेश ईंट भट्ठा मज़दूर यूनियन 2012 से संघर्ष कर रही है। यूनियन के कार्यों से कुछ जिलों में कुछ समस्याओं का निवारण हुआ है लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।

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  • पुखराज, राजस्थान के अजमेर ज़िले के मसोदा से हैं। वो पिछले 5 सालों से राजस्थान प्रदेश ईंट भट्ठा मज़दूर यूनियन के साथ काम कर रहे हैं।

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