राजू व रिया :
हाल ही में उत्तराखंड राज्य की विधानसभा ने शादी, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन रिलेशनशिप एवं इनसे जुड़े कानूनों का विनियमन एवं शासित करने से सम्बंधित सभी कानूनों को राज्य में सभी नागरिकों के लिए समान बनाने के उद्देश्य से उत्तराखंड समान नागरिक संहिता विधेयक 2024 पारित किया।
भारतीय संविधान के निति निर्देशक तत्वों वाले भाग में अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता का जिक्र किया गया है। इस अनुच्छेद के अनुसार ‘राज्य नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता लागू कराने का प्रयास करेगा’। इसी अनुच्छेद को मद्देनजर रखते हुए उत्तराखंड राज्य ने यह कानून लाने का कदम उठाया।
इस लेख में हम इस विधेयक के एक विशेष भाग, जो लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में उल्लेख करता है उस पर चर्चा करेंगे।
आज के युवा शादी-विवाह को अपने जीवन का एक बड़ा निर्णय मानते हैं और उनका मानना होता है कि शादी जैसे बंधन में बंधने से पहले अपने होने वाले जीवन साथी को अच्छे से जान-पहचान लेना बहुत आवश्यक है। इसी सोच के साथ युवाओं में लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा प्रचलन में है।
लिव–इन रिलेशनशिप क्या है?
समान नागरिक संहिता की धारा 3(4) के अंतर्गत ऐसा कोई रिश्ता जिसमे महिला व पुरुष एक ही घर में शादी किये बिना एक साथ रहते हैं, तो वह लिव-इन रिलेशनशिप कहलाता है। अगर आसान भाषा में, यह शादी नहीं है लेकिन शादी जैसा रिश्ता है।
उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता में लिव–इन रिलेशनशिप से सम्बंधित मुख्य प्रावधान:
इस संहिता में लिव-इन रिलेशनशिप के मुख्य प्रावधान कुछ इस प्रकार हैं –
- यदि कोई भी प्रेमी जोड़ा जो लिव-इन रिलेशनशिप में है और उत्तराखंड में निवास कर रहा है, चाहे वह स्थायी निवासी किसी अन्य राज्य का हो, तो उस जोड़े को इस रिश्ते की जानकारी एक माह के भीतर संबंधित रजिस्ट्रार को लिखित में देनी होगी।
- पंजीयन कब नहीं करना है: 1. जब पार्टनर प्रतिषिद्ध या प्रतिबंधित नातेदारी में हो। 2. जब एक पार्टनर या तो पहले से शादीशुदा हो या पहले से ही एक और लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हो। 3. जब कोई भी एक पार्टनर नाबालिग हो । 4. जब किसी एक पार्टनर की सहमति बलपूर्वक, धोखे से, बहला-फुसलाकर, अनुचित प्रभाव या जबरदस्ती ली गयी हो इस सभी परिस्थितिओं में रजिस्ट्रार लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीयन नहीं करेगा।
- अगर रजिस्ट्रार को लगता है कि प्रावधानों के अनुसार रिश्ते को पंजीकरण करना आवश्यक नहीं है तो वह एक समरी जांच करेगा जाच के बाद रजिस्ट्रार या तो पंजीकरण कर देगा या फिर इनकार कर देगा।
- यदि कोई भी जोड़ा जो ऐसी रिलेशनशिप में है और रिश्ते को ख़त्म करना चाहते है तो भी इसकी सूचना उस क्षेत्र के रजिस्ट्रार को लिखित में देनी होगी।
- रजिस्ट्रार के कर्तव्य: प्राप्त प्रत्येक जानकारी को पुलिस को देना, अगर जोड़े में कोई भी पार्टनर 21 वर्ष से कम उम्र का है तो ऐसी जानकारी उस पार्टनर के माता पिता या उसके अभिभावक को देना, अगर पंजीयन की आवश्यकता नहीं, तो जानकारी पुलिस को देना आदि।
- यदि कोई प्रेमी जोड़ा रजिस्ट्रार को बिना जानकारी दिए चुपके से ऐसे रिश्ते में रहता है तो कोई तीसरा व्यक्ति इसकी शिकायत सम्बंधित रजिस्ट्रार को कर सकता है।
- पंजीयन नहीं कराने पर रजिस्ट्रार किसी भी पार्टनर को नोटिस दे सकता है।
- यदि कोई भी प्रेमी जोड़ा अपने लिव इन रिलेशनशिप की एक महीने की अवधि में ऐसे रिश्ते की सूचना संबंधित रजिस्ट्रार को नहीं देता है, गलत जानकारी देता है, या रजिस्ट्रार द्वारा नोटिस के जवाब में भी ऐसे रिश्ते की जानकारी रजिस्ट्रार को नहीं दी जाती है तो उस जोड़े को 6 माह तक की सजा या 25,000 रूपये तक का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है।
- इस संहिता में यह प्रावधान है कि ऐसे रिश्ते के दौरान जन्मे बच्चे जायज़ माने जायेंगे।
- यदि लिव इन रिलेशनशिप में पुरुष महिला साथी का परित्याग करता है या छोड़ देता तो महिला साथी पुरुष साथी से भरण पोषण एवं रख रखाव की मांग कर सकती है।
इस विधेयक में लिव–इन रिलेशनशिप से संबंधित प्रावधानों की अच्छी बातें:
1. विधेयक में लिव इन रिलेशनशिप के दौरान पैदा हुए बच्चे जायज़ होंगे। इससे बच्चे पर नाजायज होने का कलंक नहीं लगेगा।
2. यह कानून महिलाओं को यह अधिकार देता है कि वह रिश्ते की समाप्ति के बाद अपने पुरुष साथी से स्वयं के भरण पोषण एवं रख रखाव की मांग कर सकती है।
इस विधेयक में लिव–इन रिलेशनशिप से संबंधित प्रावधानों की कुछ कमियां और सवाल:
- यह विधेयक समलैंगिक रिश्तों को क़ानूनी पहचान नहीं देता है और इस विधेयक में समलैंगिक जोड़ों का कोई जिक्र नहीं है, इसलिए यह विधेयक समलैंगिक जोड़ों पर लागू नहीं होता है।
- इस कानून में लिव इन रिलेशनशिप के दौरान जन्मे बच्चों को जायज़ तो समझा है लेकिन इन जायज़ बच्चो के उनके माता पिता की संपत्ति के अधिकार के बारे में इस कानून में कोई ज़िक्र नहीं किया गया।
- यह विधेयक व्यक्ति के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है क्योंकि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े की जानकारी पुलिस को दी जाती है, उनके माता पिता को दी जाती है। इसके साथ ही रजिस्ट्रार जानकारी मिलने पर या स्वयं के विवेक के आधार पर इसमें जांच कर सकता है, उनके निजी क्षेत्र में घुसकर पूछताछ कर सकता है, जोड़े के कथन ले सकता है। यह मनमानी है। इस प्रकार से अंतरजातीय जोड़ों या अंतरधार्मिक जोड़ों का उत्पीड़न किया जा सकता है।
- पंजीयन नहीं कराने पर जोड़े को अपराधी माना जायेगा और उनपर मुक़दमा चलाया जायेगा जबकि इंद्रा शर्मा बनाम वी. के. शर्मा के मामले में, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “लिव–इन रिलेशनशिप न तो पाप है और न ही अपराध है।” इसके साथ ही पायल शर्मा बनाम अधीक्षक, नारी निकेतन, आगरा, के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “लिव–इन रिलेशनशिप न तो पाप है और न ही अपराध, और एक आदमी को कानून एवं नैतिकता के अंतर को याद रखना होगा। यह केवल अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात है।”
- हमारे समाज में लोग शादियों का भी पंजीकरण नहीं कराते हैं लेकिन उसके लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है लेकिन लिव इन रिलेशनशिप का पंजीयन नहीं करना आपराध माना गया है। पंजीयन नहीं कराने या गलत जानकारी देने, या नोटिस के बाद लिव इन रिलेशनशिप के बारे में कथन नहीं देने पर बहुत ज्यादा जुर्माना लगाया गया है।
- हमारे देश में कोई भी व्यक्ति 18 वर्ष की आयु में सहमति देने योग्य हो जाता है । महिला 18 वर्ष व पुरुष 21 वर्ष की उम्र में शादी कर सकते हैं लेकिन लिव इन रिलेशनशिप में रहते हैं तो पुलिस एवं उनके माँ बाप या अभिभावक को जानकारी दे दी जाएगी ऐसा क्यों? क्या वो यह चयन नहीं कर सकते कि वो किसके साथ रहना पसंद करेंगे ओर किसके साथ नही? यह उनकी स्वतंत्रता और निजता का मामला है।
- अगर एक पुरुष और एक महिला दो मित्र हैं और जो रिलेशनशिप में नहीं है, लेकिन बड़े शहरो में रहने का किराया ज्यादा होने की वजह से एक ही फ्लैट में निवास करते हैं तो अगर कोई तीसरा व्यक्ति इसकी शिकायत या रजिस्ट्रार स्वयं जांच करने लग जायेगा तो वो मित्र कैसे साबित करेंगे कि वो दोनों लिव इन रिलेशनशिप में नहीं है। उनके बयान लिए जायेंगे। यह एक प्रकार से उत्पीड़न साबित हो सकता है।
- इस विधेयक में पुरुष साथी, महिला साथी को त्यागता है तो पुरुष साथी को महिला को देने का प्रावधान है लेकिन पुरुष साथी अपने महिला साथी से भरण पोषण की मांग कर सकता है या नहीं, इसके बारे में कोई प्रावधान नहीं है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय एवं राज्यों के उच्च न्यायालयों ने समय समय पर निर्णय पारित किये है जिसमें कहा गया है कि अगर महिला कमाती है और पति कमाने में असमर्थ है तो पति अपने पति से गुजरा भत्ता और भरण पोषण की मांग कर सकता है।
- लिव इन रिलेशनशिप का पंजीयन महिला साथी को कैसे सुरक्षा देगा इस विधेयक में इस बारे में कोई प्रावधान नही है। जबकि पहले से ही महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करता है। अगर सुरक्षा के प्रावधान पहले से ही हमारे कानून में है तो विधेयक में इस तरह के प्रावधानों की जरुरत क्यों पड़ी?
सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में क्या कहा?
ऐसे तो सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप के बारे अनेकों मामलों में निर्णय दिए है लेकिन इनमे से कुछ महत्वपूर्ण का जिक्र हम यहाँ कर रहे है-
इंद्रा शर्मा बनाम वी. के. शर्मा के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “लिव–इन रिलेशनशिप न तो पाप है और न ही अपराध है।”
पायल शर्मा बनाम अधीक्षक, नारी निकेतन, आगरा, के मामले में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “लिव–इन रिलेशनशिप न तो पाप है और न ही अपराध, और एक आदमी को कानून एवं नैतिकता के अंतर को याद रखना होगा। यह केवल अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात है।”
न्यायालय ने एस. खुशबू बनाम कन्नीम्मल, (2010) के मामले में कहा कि “लिव–इन रिलेशनशिप स्वीकार्य हैं और अगर दो बालिग़ व्यक्ति एक साथ रहते है तो इसे अवैध या गैरकानूनी नहीं माना जा सकता है।”
एस.पी.एस. बालासुब्रमण्यम बनाम सुरत्तयन, के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान पैदा हुए बच्चे को भी जायज घोषित किया और कहा कि “अगर एक पुरुष और एक महिला एक ही छत के नीचे रहते हैं और कई वर्षों तक सहवास(cohabit) करते हैं, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत एक उपधारणा (presumption) होगी, कि वे पति और पत्नी के रूप में रहते हैं और ऐसी रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे जायज़ होंगे“”।
यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने पुरुष साथी की सम्पत्ति में महिला साथी को उत्तराधिकार का अधिकार भी दिया। विद्याधरी बनाम सुखराना बाई मामले में सर्वोच्च न्यायालय कहा कि “जो लोग लंबे समय तक लिव–इन रिलेशनशिप में रहे हैं उन्हें उत्तराधिकार (inheritance) में संपत्ति प्राप्त हो सकती है।” इस मामले में अदालत ने एक लिव-इन पार्ट्नर (मृतक की महिला साथी) के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (inheritance certificate) दिया।
समान नागरिक संहिता प्रावधानों को पढ़कर यह समझ नहीं आ रहा है कि इसमें लिव इन रिलेशनशिप के प्रावधानों को क्यों लाया गया है? इसके पीछे की मंशा क्या है? क्या यह नैतिकता निर्धारित करने के लिए लाया गया है? या फिर यह नैतिक पुलिस का काम करता हैं? यह विधेयक लिव इन में रहने वाली महिलाओं को कैसे सुरक्षा प्रदान करेगा? क्या यह विधेयक समान नागरिक संहिता की आड़ में यह निर्धारित करने की कोशिश करता है कि हम किससे प्यार करें या किससे नहीं ? या फिर अंतरजातीय या अंतरधार्मिक जोड़ो पर निगाह रखने के लिए लाया गया है? समलैंगिक जोड़े, जो लिव-इन रिलेशनशिप में रहते है. उनको इस विधेयक के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है? ऐसे कुछ सवाल है जो हमारे मन में आते है।
इस विधेयक में लिव इन रिलेशनशिप से संबंधित प्रावधान हमारे जीवन जीने के अधिकार पर सवाल खड़ा करता है कि क्या हम अपनी इच्छा से किसी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकते है। यह हमारी निजता के अधिकार का उल्लंघन है। अतः हमें इस विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधानों पर पुन: विचार विमर्श करना चाहिए।

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