हफ्सा नाज़:
यह सुकून आसानी से नहीं मिला है I
आज जब अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में खुशियाँ और सुकून महसूस करती हूँ तो अक्सर दिमाग में ख़्याल आता है कि यह सुकून आसानी से नहीं मिला है I समाज में चल रही रीतियों से हटकर कुछ करने में हमेशा मुश्किलों का सामना तो करना पड़ता ही है मगर यह लड़ाई और मुश्किल हो जाती है जब आपको अपने करीबी लोगो के साथ में लड़नी पड़ती है, जिसमे आप जीत भी जाते हैं तो कुछ रिश्ते खो देते हैं और आपको जीत, जीत जैसी नहीं लगती है I
मैं, हफ्सा, सहारनपुर, पश्चिम उत्तरप्रदेश में पली-बढ़ी हूँ और लगभग सात साल पहले बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में मैं दिल्ली आ गयी थी I मेरे शौहर (पति), इमरान का परिवार भी दिल्ली में बसने से पहले बिजनौर, पश्चिम उत्तरप्रदेश में ही रहता था I दिल्ली में पढ़ाई करते हुए उनकी एक बहन से मेरी दोस्ती हुई और फिर उनके परिवार से मिलना हुआ I इमरान के लिए काफी वक़्त से लड़की ढूंढी जा रही थी मगर इमरान को पढ़ी-लिखी, नौकरी करने वाली, व स्वतंत्र ख़्यालात वाली लड़की की तलाश थी I जो जोड़ मिलना खुद में ही काफी मुश्किल था I उनके घरवालों ने मुझ से रिश्ते की बात की और मैंने माना कर दिया I
माहौल में एक बड़ा बदलाव
इमरान के घर गयी थी तो देखा कि उनकी पांचो बहनें काम करती हैं, वेस्टर्न कपड़े भी पहनती हैं और अपने ख़्यालात खुलकर अपने घर वालों के सामने रखती हैं I हर रोज़ शाम में उनके पापा इस्लाम और ज़िन्दगी जीने के सलीको पर बच्चों को समझाते थे जिसमें महिलाओं के हक़ की बातें भी होती थीं I मैंने उत्तर प्रदेश के मुस्लिम परिवारों में ऐसा लिबरल माहौल पहले कभी महसूस नहीं किया था I उनके घर में जेंडर समानता को मैं महसूस कर सकती थी जिसको बनाने में इमरान और उनके पापा का अहम रोल थाI इस माहौल के कारण उन्होंने मेरे दिल में इज़्ज़त कमा ली थी I
इंकार से इक़रार तक
मेरी शादी करने में शुरुआत से ही ख़ास दिलचस्बी नहीं रही थी और अब से 5 साल पहले तक तो मैं अपने करियर की दौड़ में ही बहुत मसरूफ थीI मैंने इमरान के परिवार से शादी करने के प्रपोजल को मना कर दिया फिर सोचा की इमरान से बात करके उनको भी साफ साफ मना करना सही रहेगा I उस दिन उनसे पहली बार मुलाक़ात हुई और आमने सामने बात हुई तो पता चला के उनके परिवार की यह मर्ज़ी थी और उनको तो इस बारे में कुछ भी नहीं पता था I मेरे इंकार को उन्होंने बहुत खूबसूरती से समझा और फिर हमने एक दूसरे के सपने, दिलचस्पियों और ज़िन्दगी की कश्मकश के बारे में बात की I लगभग तीन साल तक इमरान की अपने हमसफ़र को ढूंढ़ने की तलाश जारी रही और मैं तब तक अपने करियर के एक अच्छे मक़ाम पर पहुंच गयी थीI इसी दर्मियान मुझे इमरान में एक अच्छा हमसफ़र नज़र आने लगा था I
“और फिर एक दिन मैंने उनसे शादी के लिए पूछा और उन्होंने हाँ कर दी” I
शादी के लिए संघर्ष
एक लड़की होने के नाते घर पर खुद की शादी के लिए अपने माता-पापा से बात करना एक बहुत ही मुश्किल काम था और उस पर मैं एक अंतर जातीय शादी करने की बात कर रही थी, हालांकि इस्लाम धर्म में जाति जैसा कुछ नहीं है मगर हमारे राज्य में जाति हर धर्म और हर घर में घुसी हुई है I
एक दिन हिम्मत जुटाकर पापा से बात कर ही ली तो हैरतअंगेज पापा रिश्ते के लिए राज़ी हो गए मगर यह फिर भी इतना आसान नहीं था क्योकि परिवार के बहुत से लोग इसके खिलाफ भी थे I इन बातों में समाज का नज़रिया भी सामने निकल कर आया जिसके हिसाब से हमारे बीच में फर्क़ सिर्फ जाति का ही नहीं था, हमारी पढ़ाई, हमारा आर्थिक स्तर और उस पर रंग भेदभाव भी शामिल हो गया थाI हर रोज़ चर्चाएं हुई, बैठक हुई, मगर इमरान ने और मैंने हिम्मत नहीं हारी और अपने फैसले पर जुटे रहे I समाज और परिवार के हर सवाल का जवाब दिया और फिर अंत में हमने सब को राज़ी कर ही लिया और इस तरह से हमारी शादी हो गई I
बदलाव ज़रूरी होता है I
आज हमारी शादी को दो साल से ज़्यादा समय हो गया है और इमरान ने मेरे परिवार में बेटे की जगह बना ली है I हम दोनों को साथ देखकर लोग जब भी “नाइस कपल” कहते हैं तो मुझे हमारे रिश्ते का संघर्ष याद आ जाता है I हम अभी भी अपने परिवार के बहुत से लोगों की सोच को नहीं बदल पाए हैं मगर उम्मीद करते हैं कि हमें साथ में खुश देखकर उनके दिमाग में समाज की कुरीतियों और भेदभाव के खिलाफ कुछ सवाल तो खड़े हो ही जाते होंगे और शायद वह यह समझने की कोशिश करते होंगे कि “बदलाव ज़रूरी होता है” I

Leave a Reply