मेहेक पंच द्वारा लिखित राजू द्वारा एडिट:
वर्ष 1997 में विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के मामले में दिए गए दिशा निर्देशों के अनुपालन में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2013 लाया गया था। दरअसल इस मामले में भंवरी देवी नामक एक समाज सेविका राज्य सरकार के साथ बाल विवाह रोकने का काम करती थी। भंवरी देवी ने वर्ष 1992 में एक गुर्जर परिवार में हो रहे बाल विवाह को रोकने का प्रयास किया था। इसके बदले में गुर्जर परिवार वालों ने भंवरी देवी के साथ सामूहिक बलात्कार और क्रूरतापूर्वक व्यवहार किया। निचली अदालत ने दोषियों को छोड़ दिया था। उसके बाद विशाखा नाम के एक गैर-सरकारी संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की और न्यायालय ने इस मामले में दिशा-निर्देश दिए।
इस मामले में निर्णय से पहले कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के संबंध में भारत में कोई कानून नहीं था। पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 एवं अंतर्राष्ट्रीय नीति का हवाला देते हुए वर्ष 1997 में इस सन्दर्भ में दिशा-निर्देश जारी किये थे। इसके 15 साल बाद कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं के संरक्षण के लिए वर्ष 2013 में यह कानून लाया गया था।
इस अधिनियम को लाने का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस अधिनियम को लाने के मुख्य उद्देश्य:
- महिलाओं के साथ कार्य स्थल पर हो रहे उत्पीड़न को रोकना,
- कार्य स्थल पर हो रहे यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना,
- यौन उत्पीड़न की शिकायतों के निवारण तंत्र की स्थापना कर उनका निवारण करना, आदि।
यौन उत्पीड़न क्या है?
इस अधिनियम के तहत यौन उत्पीड़न एक ऐसा अवांछनीय या अनचाहा यौन व्यवहार या यौन प्रकृति वाले मौखिक या शारीरिक आचरण को कहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप कार्यस्थल पर महिला के काम-काज में अनुचित बाधा उत्पन्न होती है। इस प्रकार के आचरण से कार्यस्थल पर महिला के लिए काम करने का माहौल भयपूर्ण, शत्रुतापूर्ण या अपमानजनक बन जाता है।
इसके तहत निम्नलिखित व्यवहार आते है –
● अनचाहा शारीरिक संपर्क या उसकी कोशिश करना
● यौन संबंध की माँग या प्रस्ताव करना
● यौन लाभ के बदले में अन्य लाभ प्रदान करने का प्रस्ताव
● यौन संबंधी टिप्पणियाँ करना
● अश्लील चित्र या विडियो दिखाना आदि।
यौन आचरण या व्यवहार से जुड़ी यदि निम्नलिखित में से कोई परिस्थिति उत्पन्न होती है तो यह कृत्य भी यौन उत्पीड़न माना जा सकता है-
- यौनिक संबंध के बदले कर्मचारी को नौकरी में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से फायदा पहुँचाने के वादा करना,
- नौकरी में नुकसान पहुँचाने की धमकी देना,
- रोज़गार की वर्तमान या भावी स्थिति को लेकर धमकी देना,
- काम में दखलअंदाजी करना एवं अपमानजनक या आपतिजनक माहौल बनाना,
- ऐसा व्यवहार जिससे कर्मचारी के स्वास्थ्य या सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने की सम्भावना हो इत्यादि।
यह अधिनियम सरकारी एवं निजी दोनों प्रकार के कार्यस्थल जिसमें न्यूनतम 10 लोग काम करते है वहाँ पर लागू होता है।
कार्यस्थल क्या है?
कार्यस्थल में वो सभी जगह शामिल है जहाँ कोई भी कर्मचारी नौकरी के सिलसिलें में कुछ काम के लिए जाता है। जैसे कि ग्राहक का कार्यस्थल, अन्य संगठनों का परिसर, ईमारत की लिफ्ट, कार्यालय का शौचालय, कैंटीन आदि।
यह कानून किस पर लागु होता है?
यह कानून नियोजक, कर्मचारी, घरेलु कामगार और पीड़ित महिला आदि पर लागू होता है।
नियोजक: वो व्यक्ति होता है जो किसी विभाग, संस्था, उद्योग, शाखा अधयक्ष या अधिकारी जो प्रबंधन, देखरेख, नियंत्रण के लिए जिम्मेदार हैं।
कर्मचारी: वो व्यक्ति जो कार्यस्थल पर काम करने के लिए नियुक्त किया गया हो इसमें ठेका मज़दूर, इंटर्न या प्रशिक्षु आदि शामिल हैं।
घरेलु कामगार: किसी भी उम्र की महिला, जो किसी निवास या गृह में काम करती हो और उसने यौन उत्पीड़न का सामना किया है किन्तु वह घर की सदस्य नहीं होनी चाहिए।
पीड़ित महिला: कोई भी महिला जिसने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार होने का दावा किया है वह इस अधिनियम के तहत पीड़ित महिला है।
अगर किसी महिला के साथ यौन उत्पीड़न होता है तो क्या करें?
अगर किसी महिला के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न होता है तो वह महिला सीधे उस निकाय की आंतरिक शिकायत समिति या जहाँ आंतरिक शिकायत समिति का गठन नहीं किया गया है वहाँ पर स्थानीय शिकायत समिति के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करवा सकती है।
आंतरिक शिकायत समिति (आई. सी. सी.) एवं स्थानीय शिकायत समिति (एल.सी.सी.) क्या है?
अगर कार्यस्थल पर कोई ऐसी घटना होती है तो वहाँ पर समाधान की दिशा में शिकायत निवारण की ऐसी व्यवस्था होना ज़रूरी है जो सभी कर्मचारी महिलाओं या पीड़ितों के लिए सुलभ हो। इसके लिए हर वह निकाय जिसमें 10 व्यक्ति से ज़्यादा लोग कार्य करते है उनमें एक आंतरिक शिकायत समिति का गठन करना कानूनन अनिवार्य है।
इस समिति में कम से कम 4 सदस्य होना ज़रूरी है जिसमें से 2 महिला सदस्य होना आवश्यक है। इस समिति की अधयक्ष वरिष्ठ पद पर कार्यरत महिला होगी। सदस्यों को महिला हितों के प्रति प्रतिबद्ध, सामाजिक कार्य करने का अनुभव के साथ साथ क़ानूनी जानकारी भी होनी चाहिए। एक महिला सदस्य किसी तीसरी संस्था या संगठन की होनी चाहिए जिसके पास यौनिक उत्पीड़न के मुद्दों पर विशेषज्ञता हासिल हो।
जहाँ आतंरिक शिकायत समिति का गठन नहीं किया गया है तो वहाँ पर जिला अधिकारी द्वारा स्थानीय शिकायत समिति का गठन करना आवश्यक है। जिसमें कम से कम 5 सदस्य होंगे जिसमें से 3 सदस्य महिलाऐं होंगी। समिति की अधयक्ष महिला होगी। प्रत्येक समिति को एक सालाना रिपोर्ट बनाना ज़रूरी है।
जांच की प्रक्रिया
अगर कोई भी महिला यौन उत्पीड़न से पीड़ित है तो वह आतंरिक शिकायत समिति या स्थानीय शिकायत समिति के समक्ष लिखित में अपनी शिकायत पेश कर सकती है।
घटना के तीन महीने के भीतर शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है, अगर पीड़ित शारीरिक या मानसिक रूप से शिकायत दर्ज करने में असमर्थ है तो उसके परिवार वाले शिकायत कर सकते हैं। अगर किसी कारणवश पीड़ित अपनी शिकायत दर्ज नहीं कर सकी तो समिति उचित कारणों के आधार पर 90 दिन के बाद भी शिकायत का संज्ञान लेकर जांच कर सकती है। पीड़ित अपनी मर्जी से सुलह भी कर सकती है, लेकिन पैसे के आधार पर सुलह नहीं की जा सकती।
| शिकायत दर्ज | घटना के 90 दिन के अंदर |
| सुलह पर अमल (यदि पीड़ित चाहे तो) | 60 दिन के अंदर |
| समिति द्वारा उत्तरदाता को सूचित करना | शिकायत दर्ज होने के 7 दिन के अंदर |
| जाँच की समाप्ति | 90 दिन के अंदर |
| नियोक्ता को जांच का प्रतिवेदन देना | जाँच समाप्ति के 10 दिन के अंदर |
| अपील | प्रतिवेदन देने के 90 दिन के अंदर |
सजा का क्या प्रावधान है?
● जाँच के बाद अगर समिति द्वारा उत्तरदाता दोषी नहीं पाया जाता है तो उसके खिलाफ कोई कारावाई नहीं होगी।
● परंतु जाँच के बाद उत्तरदाता दोषी पाए जाने पर समिति नियोक्ता या जिला अधिकारी को निम्नलिखित सिफारिश की जाएगी:
a. यौन उत्पीड़न को दुराचार बताते हुए उत्तरदाता पर लागू सेवा नियमों के तहत सज़ा दी जाये या अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाये।
b. पीड़ित महिला को हुए मानसिक या शारीरिक नुकसान हेतु उत्तरदाता के वेतन या मजदूरी से राशि काटकर मुआवजे के रूप में भरपाई की जाए।
● अगर शिकायत झूठी और गलत इरादे से की गई है तो ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता पर सेवा नियमों के तहत दण्डित किया जाए।
अन्य प्रावधान:
भारतीय दंड संहिता में यौन उत्पीड़न से सम्बंधित प्रावधान:
धारा 354- अगर कोई पुरुष किसी महिला की लज्जा भंग करने के उद्देश्य से अपमानित करता है तो उसे 5 वर्ष तक की कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
धारा 354क- अगर कोई व्यक्ति यौन उत्पीड़न का दोषी पाया जाता है तो उसे 3 वर्ष तक की कठोर कारावास या जुर्माने का प्रावधान है।
धारा 354ख- अगर कोई व्यक्ति निर्वस्त्र करने के आशय से उस महिला पर हमला या आपराक्षिक बल का प्रयोग करता है तो उसे 3-7 वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
धारा 509 – कोई व्यक्ति किसी महिला की लज्जा का अपमान करने के इरादे से, कोई शब्द बोलता है, कोई आवाज़ या इशारा करता है, या कोई वस्तु प्रदर्शित करता है तो उसे 3 वर्ष तक की सजा व जुर्माने का प्रावधान है।
इस अधिनियम के तहत नियोक्ता की क्या ज़िम्मेदारी है?
नियोक्ता की कुछ ज़िम्मेदारियाँ निम्नलिखित है-
● हर नियोक्ता का कर्त्तव्य है कि वह अपने कर्मचारियों को एक सुरक्षित पर्यावरण प्रदान करे,
● कर्मचारियों को इस कानून के बारे में जानकारी दे,
● कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करें एवं काम करने के लिए एक महफूज़ कार्यस्थल सुनिश्चित करे,
● किसी भी कर्मचारी के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव ना हो ऐसा सुनिश्चित करे,
● नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह अपने हर कार्यालय और प्रशासनिक विभाग में आतंरिक शिकायत समिति का गठन करे ताकि पीड़ित महिलायें अपने मामले रिपोर्ट कर सके,
● सभी कर्मचारीयों को कार्यालय के नीति-नियम के बारे में पता हो कि अगर उनके साथ कोई यौन उत्पीडन का हादसा होता है तो उसे कहाँ और कैसे रिपोर्ट करना है।
कार्यस्थल पर महिला के साथ किसी भी प्रकार का यौन उत्पीड़न महिला के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत दिए गए समानता का मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव पर रोक, अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता और अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकारों का उल्लंघन करता है।
यह अधिनियम कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न शिकायत करने की प्रक्रिया बताता है और इसके तहत शिकायत निवारण के लिए समितियाँ बनायी गयी है, जहाँ पीड़ित अपने साथ हुए शोषण एवं अपराध को बिना किसी झीझ्क के अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है। यह अधिनियम कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ हुए यौन उत्पीड़न की शिकायत करने और उनका उचित निवारण करना सुनिश्चित करता है। इस प्रकार यह अधिनियम उपरोक्त मौलिक अधिकारों को मजबूत करने में मददगार है।

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