अभिषेक:

मुझे अपने शादीशुदा दोस्तों के घर जाना,
अच्छा नहीं लगता।
इसलिए नहीं कि वो अब मेरे अच्छे दोस्त नहीं रहे,
इसलिए भी नहीं कि शादी होते ही
इंसान बदल जाता है – जोरू का गुलाम हो जाता है।

पर इसलिए कि वहाँ होंगी भाभी,
और मेरे चाय बिस्कुट नाश्ते की ज़िम्मेदारी
हक़ समझ कर उनके हिस्से में डाल दी जाएगी।
या जहाँ पैसा होगा, दोस्त थोड़ा अमीर होगा,
वहाँ फिर होगी कोई दीदी,
जो पहले पानी लाएंगी और फिर लाएंगी कॉफ़ी।

ऐसा नहीं था कि शादी से पहले,
मैं दोस्त के घर जाता नहीं था।
और जाता तो कुछ खाता नहीं था।
आंटी के हाथो की हलवा पूरी मैंने छकी हैं,
मेरे लिए दोस्त के घर में पचासो चीज़ें पकी हैं।

लेकिन तब मैं देख नहीं पाता था,
कौन पकाता था, कौन लेकर आता था?
आँखों पर ये पट्टी बाँधी किसने थी?
घर, परिवार, समाज, स्कूल – हिस्सेदारी किसकी थी?
ता ज़िन्दगी मेरी माँ चाय बनाती रही,
बिस्कुट को कतारों में करीने से सजाती रही,
कभी पानी के गिलास ले दौड़ी मेहमानखाने,
कभी अपना हिस्सा छोड़, मिठाई खिलाती रही…

और मैंने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया,
आँखों पर मेरे पट्टी थी, पर क्यों माँ को भी ज़ुबान नहीं दिया?
बड़े मेहमान पधारे जब छोटे से कूचे में
माँ के बदले हाव भाव, आवाज़ की थकान,
और बोझिल मन का क्यों कोई मुझे निशान नहीं दिया?

इसलिए मुझे मेहमान बनने में,
इसलिए मुझे अपने शादी शुदा दोस्तों के घर जाने में अच्छा नहीं लगता।
क्यूंकि शादी के बाद मेरा दोस्त बदला “नहीं” है,
उसकी कहानी के किरदार बदल गए हैं बस।

मैं इसलिए भी नहीं जाता,
क्यूंकि मुझे मेरे दोस्त की आवाज़ में
मेरे आने की सच्ची ख़ुशी सुनाई देती हैं।
और जब वो ख़ुशी में चिल्लाता हैं, “अरे चाय बना लाओ।”
दोस्त आया हैं, कुछ खिलाओ पिलाओ।
तो मैं सुन पाता हूँ
पीढ़ियो से चूल्हे पर चढ़ी, उस चाय की आवाज़ को
जो ना जाने कितनी सदियों से धीमे-धीमे उबल रही हैं।

जब-जब चाय उबलने को होती है,
केतली का दायरा छोटा पड़ने को होता है,
सैलाब आने को होता है,
जिसमे ये दुनिया शायद डूब भी सकती है।
मेरा चौकन्ना दोस्त ज़ोर से चिल्लाता है,
भाभी को चाय की याद दोबारा दिलाता है।
चाय चूल्हे से उतार ली जाती है,
बदलाव की धारा सिसकियाँ लगाती है।

ये चाय इतनी कड़वी क्यूँ है?
ये सोचते हुए मैं अपने दोस्त की तरफ देख रहा हूँ।
वो दोस्त जो अदरक वाली चाय की
तारीफों के पुल बाँध रहा है।
एक ही चाय है – तीन लोग हैं
एक को सामान्य लग रही है।
एक को बहुत अच्छी लग रही है।
एक को बहुत कड़वी लग रही है।

एक ही समाज है –
एक को सब सामान्य लग रहा है।
एक को बहुतअच्छा लग रहा है।
एक को बहुत कड़वा लग रहा है।

कहते हैं प्रेम इंसान को बदल देता है।
अपने दोस्त के रिश्ते में इस बदलाव के निशान ढूंढ रहा हूँ।
या तो इनके रिश्ते में बदलाव बहुत धीमा है,
या फिर प्रेम मर चुका है।

धीमा बदलाव कड़वा नहीं लगता है,
मगर मर चुके प्रेम का स्वाद कड़वा ज़रूर होता है।

फीचर्ड फोटो आभार: द हिन्दू

Author

  • मेरा नाम अभिषेक दास हैं। मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ। अनंत प्रश्नो और जिज्ञासाओं की खोज में भटकने के साथ साथ मुझे नयी चीज़ें सीखना, पढ़ना, लोगो को सुनना, लिखना और विज़ुअल आर्ट करना पसंद हैं। मैं एक गलतियों की गठरी हूँ, सुधार की लगातार कोशिश हूँ, सीखने समझने का प्रयत्न हूँ। मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की हैं और लखनऊ-सीतापुर के आस-पास के इलाको में ग्रामीण बच्चो को पढ़ाता हूँ। संवैधानिक मूल्यों को भी अलग-अलग माध्यमों से जानने, मानने और जीने की भी कोशिश कर रहा हूँ।

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