अश्विनी महाराणा:

मेरा शहर (कस्बा) चाईबासा है। इसका अस्तित्व 1837 ईस्वी में आया, इसके पूर्व इसकी जानकारी प्राप्त नहीं हुई। बुजुर्गों के कथाओं में खरकई नदी के पश्चिमी हिस्सा को मुगलबंदी के नाम से जाना जाता है जो बाद में  कोल्हान क्षेत्र के रूप में जाना गया। मुगल शासक अकबर के प्रधान सेनापति राजा मानसिंह और वित्त मंत्री टोडरमल, झारखंड (पूर्व में बंगाल रियासत) के जंगली क्षेत्र में कर वसूलने में असमर्थ रहे, इसलिए उन इलाकों को मुगलबंदी इलाका घोषित किया गया। तब अकबर ने सेनापति मानसिंह को उस इलाके का सूबेदार बनाया। उसने मुगलबंदी वाले भू-भाग को तीन हिस्सों में बांटा और अपने नाम को तीन हिस्सों में बाटकर कर्मश बीरभूम, मानभूम, तथा सिंहभूम का नाम दिया। इन तीन इलाकों में अपनी सैन्य अधिकारियों को कर संग्रह के लिए नियुक्त किया तथा प्रत्येक इलाका से “आठ आना” कर जमा करने को कहा। तीनों इलाकों के प्रहरियों ने अपने-अपने ढंग से कर वसूली के प्रयास किये, परंतु वह सफल नहीं हुए। 

अंग्रेज़ों के आने के बाद इसे बंगाल जिला घोषित किया और अपने नियंत्रण में लाने का प्रयास किया। क्योंकि सिंहभूम के ‘हो’ और ‘मुंडा’ आदिवासी समुदाय किसी भी राजा-महाराजा के नियंत्रण मे नहीं थे, फलस्वरुप अंग्रेज़ी हुकूमत से उनका टकराव स्वाभाविक था। तब सिंहभूम का संचालन वर्तमान झारखंड राज्य के लोहड़दगा जिला से होता रहा। यह क्षेत्र अंग्रेज़ी हुकूमत की अधीनता में 1821 ईस्वी में आ गया तथा इस क्षेत्र में कर वसूली के मुद्दे को लेकर स्थानीय आदिवासियों ने 1830-31 से अपना विरोध करना शुरू कर दिया था। 1831-32 में सिंहराय व विदराय मानकी के नेतृत्व में कोल विद्रोह हुआ। इस विद्रोह को अंग्रेज़ों ने दबा दिया किंतु 1837 में पोटो हो के नेतृत्व में फिर से विद्रोह हुआ जो इतिहास में सेरेंगसिया घाटी की लड़ाई के नाम से जाना जाता है।

तब तक अंग्रेज़ अपना मुख्यालय चाईबासा को बना चुके थे। यहाँ चोया देवगम का घर हुआ करता था जिसके नाम पर अंग्रेज़ों ने इस इलाके का नाम चाईबासा रखा। यह चोया और बासा से मिलकर बना है चोया व्यक्ति का नाम है तथा बासा का अर्थ घर होता है। बासा का अर्थ उस घर से है जिसके आस-पास दूसरा घर/मकान ना हो, उसे बासा घर कहते हैं। चाईबासा के आसपास के बसे अन्य गाँव इस तरह से नहीं बल्कि पेड़-पौधों के नाम या किसी घटना से संबंधित रहे हैं। उदाहरण के लिए डोबरोसाइ, सिकुरसाई, तोलडोय, मृतक्कमधातु, नीमडोस, बडबिल आदि।

1837 में हुए सेरेंगलिया विद्रोह के समय तक जर्मन मिशन के साथ-साथ एस.पी.जी. मिशन, धर्म प्रचार के लिए चाईबासा पहुँच चुके थे। जर्मन मिशनरी शिक्षा के क्षेत्र में काम करना शुरू कर चुके थे। 1875 तक यहाँ नगर पालिका स्थापित हो चुकी थी, अविभाजित सिंहभूम (पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला खरसावां, पश्चिमी सिंहभूम) का जिला मुख्यालय चाईबासा बनाया गया। कोल्हान के लोगों के सेरेंगलिया विद्रोह के बाद कैप्टन थॉमस विल्कसन 1837 में ‘विल्कसन रूल’ लेकर आ गये, जिसे स्थानीय मानकी जमादार बिरुली के द्वारा मानकी मुंडा के समक्ष रखा। उस समय में जमादार बिरूली (असुरा पीड़ मानकी) मानकी मुंडा के सवेसरवा माना जाता था, उस समय की तत्कालीन समय में प्रतिष्ठा थी।

सन 1886 ईस्वी में आदिवासियों के महान नायक बिरसा मुंडा अपनी प्रारंभिक शिक्षा हेतु, जर्मन मिशन स्कूल (जो वर्तमान में भी लूथेरन विद्यालय के नाम से जाना जाता है) गए। वहाँ उन्होंने चार वर्षों तक यानी 1886 से 1890 तक शिक्षा ग्रहण की, यह बात इसकी पुष्टि करता है कि चाईबासा तत्कालीन समय में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा।

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