राज कुमार सिन्हा:

यह जानने के लिए अब किसी गहन-गंभीर शोध की जरूरत नहीं बची है कि आजकल विकास के नाम पर किया जाता धतकरम, असल में भीषण त्रासदियों को जन्म देता है। इन दिनों देश की राजधानी दिल्ली जिस तरह से बाढ़़ की चपेट में है, उससे विकास की यही विडंबना खुलकर उजागर हो रही है। प्रस्तुत है, इसी विषय पर प्रकाश डालता राज कुमार सिन्हा का यह विशेष लेख। – संपादक

शहर के बुनियादी ढांचे की विकास परियोजनाओं ने स्थानीय जल निकास यानि सीवेज को बाधित कर दिया है। खराब तरीके से डिजाइन किए गए शहरी विस्तार में सीवेज भारी बारिश के कारण आए पानी के तेज प्रवाह को संभाल नहीं पाता। जल निकासी की खराब व्यवस्था और निचले इलाकों, जैसे- नदी या झील के किनारे अतिक्रमण बाढ़ की समस्या का प्रमुख कारण है। दिल्ली में यमुना नदी के किनारे की 960 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण कर लगभग 20 लाख लोग रहते हैं, जो दिल्ली की 10 फीसदी आबादी है। यमुना नदी की ‘खादर’  यानि डूबक्षेत्र की ज़मीन पर बसाहट ही नहीं अक्षरधाम मंदिर, कामनवेल्थ गेम्स गाँव, बस डिपो, मेट्रो यार्ड और सड़क हेतु लगभग 20 पुलों का निर्माण किया गया है। दूसरे, यमुना में भारी मात्रा में सिल्ट (गाद) जमा होने से नदी की गहराई घट गई है।

इन सभी तथ्यों के कारण यमुना की प्राकृतिक जल बहाव क्षमता कम हो गई है। उस पर हरियाणा के हथनीकुंड और ओखला बैराज से छोड़े गए पानी ने दिल्ली को डुबो दिया है। हिमालय से दिल्ली तक के- हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश राज्यों की नदियों के किनारे 13,900 हेक्टेयर ज़मीन पर कब्ज़ा कर दो करो़ड़ लोग निवास कर रहे हैं। भू-माफिया और बिल्डर्स द्वारा अतिक्रमण की इस ज़मीन पर लगभग 12 लाख करो़ड़ का व्यवसाय किया जा रहा है, जबकि इन सभी नदियों से रेत खनन का कारोबार 2 लाख करोड़ के आस-पास है। अवैध रेत खनन, नदी के किनारों को बर्बाद कर रहा है और नदी के प्रवाह को प्रभावित कर रहा है।

हिमालय में बढ़ते पर्यटन के कारण होटल, मकान, सड़क, राजमार्ग आदि के निर्माण का भारी दुष्प्रभाव देखा जा रहा है। जून 2022 में ‘गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान’ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालय क्षेत्र में बढ़ते पर्यटन के चलते हिल स्टेशनों पर दबाव बढ़ रहा है। जिस तरह से इस क्षेत्र में भूमि उपयोग में बदलाव आ रहा है, वह एक बड़ी समस्या है। जंगलों का विनाश भी क्षेत्रीय इको-सिस्टम पर व्यापक असर डाल रहा है। ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के आदेश पर ‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ द्वारा किये गए एक अध्ययन से पता चला है कि हिमाचल प्रदेश के मनाली में 1989 में 4.7 फीसदी क्षेत्र में भवन, होटल, सड़क, दुकान आदि का निर्माण हुआ था जो 2012 में 15.7 फीसदी हो गया और आज यह आंकड़ा 25 फीसदी से ज़्यादा हो गया है।

वर्ष 1980 से 2023 के बीच पर्यटकों की संख्या में 5600 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक इस साल शिमला में आने वाले वाहनों की संख्या 25 प्रतिशत बढ़ गई है। शहर में सिर्फ 6000 वाहनों के लिए पार्किंग की व्यवस्था है, लेकिन सीजन टाइम में प्रतिदिन 20,000 वाहन आते हैं। यह आंकड़ा शिमला में रजिस्टर्ड वाहनों के अतिरिक्त है। जल विद्युत परियोजनाओं के टनल निर्माण के कारण भू-गर्भीय हलचल भी लगातार बढ़ रही है। हिमाचल प्रदेश में इस वर्ष भूस्खलन और बादल फटने से आई बाढ़ के कारण 24 जून से 13 जुलाई के बीच 91 लोगों की जानें गई हैं। यह साफ हो गया है कि बाढ़ की तीव्रता को प्रभावित करने में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की बड़ी भूमिका है।

ये दोनों मानव-जनित चुनौतियां हैं। इनके चलते भूस्खलन, अचानक बाढ़ और बादल फटने जैसी घटनाएँ विनाशकारी बनती जा रही हैं। ‘एशियाई विकास बैंक’ के अनुसार भारत में बाढ़ से पिछले 65 वर्षों में 1 लाख 9 हज़ार 4 सौ 14 लोगों की मौतें हुई हैं और 25.8 करोड़ हेक्टेयर फसल का नुकसान हुआ है, जिससे लगभग 4.69  लाख करोड़ रुपए के आर्थिक नुकसान का अनुमान है। बांधों और तटबंधों को अक्सर बेहतर बाढ़़ प्रबंधन के लिए हस्तक्षेप के रूप में प्रचारित किया जाता है, जबकि यह अधिक गंभीर बाढ़ आपदाओं की जड़ होता है। इन त्रासदियों से बचने का एकमात्र उपाय है, नदियों को अविरल बहने दें और उनके प्राकृतिक मार्ग पर कोई निर्माण न करें। (सप्रेस)

यह लेख पहले समता मार्ग पर प्रकाशित हुआ है। लिंक: https://samtamarg.in/2023/07/24/flood-caused-by-development/   

फीचर्ड फोटो आभार: इंडिया टुडे

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