सुमन चौहान:

उसका नाम नारायणी भील है, उम्र करीब 39 साल, पति का नाम है लालू राम। वह जिला चित्तौड़गढ़ के भदेसर तहसील के होड़ा गाँव की निवासी है, नारायणी बाई के दो बेटे और एक बेटी हैं, बेटी की शादी हो चुकी है। उसका एक बेटा नाइंथ क्लास में पढ़ रहा है, वह 15 साल का है। दूसरा 18 साल का लड़का, वह कुछ और नहीं करता, बस खेती-बाड़ी, गाय-बकरी और घर का ही काम करता है। 

खेती, गाय-बकरी के काम के साथ-साथ नारायणी, खुद मज़दूरी भी करती है। एक दिन जब मैंने उसे मकान की दीवार बनाने का काम करते हुए देखा तो मैंने पूछा कि तुम यह कर लेती हो, उसने कहा कि हाँ मैं कर लेती हूँ।  दीवार बनाने के काम से उसको ₹300/- रोज़ की मज़दूरी मिलती है। नारायणी ने फिर बताया कि मेरा घर मैंने पूरा अपने हाथों से ही बनाया है। उनकी खुद की करीब एक बीघा ज़मीन है, लोगों के खेतों में काम करके वह अपना घर गुजारा चलाती है और मज़दूर तो वह बचपन से कर ही रही है। शादी से पहले जब वह अपने भाइयों के साथ करती थी, तो उनके यहाँ भी ऐसे ही काम करती है, अब शादी के बाद ससुराल में आकर भी ऐसे ही मेहनत-मज़दूरी करती है, उनके माँ-बाप भी नहीं है।

उसका पति जो है वह ज़्यादा कुछ काम नहीं करता था, और शराब बहुत ज़्यादा पीता था। वह उसको बहुत मारता भी था। ऐसे ही एक दिन जब उसके पति ने उसे, बहुत ज़ोर से किसी लोहे की चीज़ से मारा तो वह परेशान हो गई। फिर उसने अपने पति को एक नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती करवा दिया, नशा मुक्ति वाले लोगों ने 12 हज़ार रुपये मांगे और कहा कि 3 महीने के बाद वह ठीक हो जाएंगे। नारायणी ने कहा कि ठीक है मैं यह पैसा दे दूँगी बस आप मेरे पति को ठीक कर दीजीए। 

बहुत ही मतवाली और संघर्षशील महिला है नारायणी, वह हमारे ‘खेतिहर खान मजदूर संगठन’ की साथी भी है। पूरे गाँव में दबदबा है उसका, गाँव भर में लोग उसको लोग पूछते हैं। पिछले 7 सालों से वह संगठन के साथ जुड़ी हुई है। महिला मुद्दों पर और गाँव के विकास से जुड़े सभी मुद्दों पर वह काम कर रही है। बीमार महिलाओं को हॉस्पिटल ले जाकर इलाज करवाना हो या फिर महिलाओं को मनरेगा में आवेदन करना हो, वह ऐसे सभी कामों में सक्रिय है। पढ़ी-लिखी ना होने के बाद भी वह एक जागरूक महिला है। गाँव का सरपंच भी उससे सलाह लेता है, गाँव से जुड़े कई कामों में उसको जोड़ते भी है।

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  • सुमन चौहान / Suman Chouhan

    सुमन जी, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वह खेतिहर खान मज़दूर शक्ति संगठन और आधारशिला विद्यालय के साथ जुड़ी हुई हैं और कई सालों से आदिवासी बालिकाओं के शिक्षा और स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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