अखिलेश:

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से लगभग 15-20 किलोमीटर दूर, गनियारी नाम का एक छोटा सा गाँव है। यहाँ एक जन स्वास्थ्य सहयोग अस्पताल है। इस अस्पताल में पहुंचे तो, यहाँ के डॉक्टरों से इसके इतिहास के बारे में पूछा। बातचीत से पता चला कि दिल्ली के मेघावी नाम के एक डॉक्टर घूमते-घूमते यहाँ आये थे, उन्होंने ही इसकी शुरुआत की। वे यहाँ उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं के हालात से काफी चिंतित थी। इससे पहले से ही वह लोग काफी क्षेत्रों का दौरा कर चुके थे और एक ऐसी जगह खोज रहे थे जहाँ पर कम कीमत पर, ग्रामीणों का अच्छा  इलाज कर सके। इनमें से कुछ डॉक्टर ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स), नई दिल्ली से निकले थे। इन सभी ने तय किया कि वे सामुदायिक और ग्रामीण स्तर पर एक स्वास्थ्य केंद्र विकसित करेंगे। इस टीम ने गनियारी में इसलिए जन स्वास्थ्य सहयोग अस्पताल खोलना पसंद किया क्योंकि यहाँ पर एक तो आदिवासियों की संख्या ज़्यादा थी और यहाँ काफ़ी गरीब वंचित लोग रहते थे।

इस गाँव में ज़्यादातर सड़कें अच्छी नहीं थी। तो कुछ डॉक्टरों ने सोचा कि जो भी दूर-दराज़ के गाँव है, और आने-जाने की सड़क नहीं है, ऐसे में गाँव के लोगों को ही ट्रेन किया जाये कि कैसे छोटी-छोटी बीमारियों का इलाज तुरंत कर सके। इस टीम को गाँव में ज़्यादातर अशिक्षित लोग मिले, उन्हीं में सो कुछ को चयनित कर उनको प्रशिक्षण दिया कि अगर कोई बीमार पड़े तो, गाँव में आसानी से क्या-क्या इलाज कर सकते हैं, ताकि अस्पताल लाने तक में कुछ प्राथमिक उपचार किया जा सके। इसमें ज़्यादातर महिलाओं को बताया गया कि थर्मामीटर से बुखार कैसे जांचा जाता है, खांसी-सर्दी जैसी बीमारियों को तुरंत कैसे हटाया जा सकता है, गाँव में गर्भवती महिलाओं की आसानी से कैसे जांच कर सकते हैं। 

जिन महिलाओं को प्रसव (बच्चा होते समय) के लिए बुलाया जाता था, उनको बच्चे और माँ की देखभाल के बारे में भी बताया जाता है। नवजात बच्चे का वजन नापना भी इन महिलाओं को  सिखाया गया है। यहाँ हर तरह की बीमारी का इलाज बहुत सस्ते में किया जाता है। बीमारी की जांच और ऑपरेशन आदि के लिए कोई चार्ज नहीं लगता, सिर्फ दवाइयों के पैसे लगते हैं, इसलिए यहाँ पर काफी दूर-दूर से लोग आने लगे हैं। इतना ही नहीं गाँव में फुलवारी खोली गई, जहाँ 6 माह से 3 साल तक के बच्चों को देखभाल और उनके उचित पोषण की व्यवस्था की गई है। खेतों में काम करने वाले माता-पिता के लिए इससे काफी सुविधा हुई है और वह अपने बच्चों को स्कूल भी भेज पाते हैं। जन स्वास्थ्य सहयोग अस्पताल में अभी काफी सुविधाएं हो गई हैं, इस तरह के अस्पतालों से सरकार को भी सीख लेनी चाहिए।

जन स्वास्थ्य सहयोग अस्पताल का दौरा करने के बाद फिर हम रायपुर चले गए, रायपुर से लगभग 4 घंटे की दूरी तय करके महासमुंद ज़िले के पिथौरा ब्लॉक पहुँचे जहाँ पर दलित आदिवासी मंच नाम के संगठन के ऑफिस में रुके। फ्रेश होकर संगठन की राजिम दीदी के साथ 10 से 15 किलोमीटर दूर एक संगठन कार्यकर्ता मंजू के गाँव पिलवा पाली पहुंचे। वहाँ देखा कि मंजू अपने गाँव के कुछ लोगों के साथ बैठकर मीटिंग कर रही थी। मीटिंग खत्म हुई तो फिर गाँव में नाश्ता किया और उसके बाद खेत घूमने चले गए। यहाँ के दलितों और आदिवासियों की ज़मीन पर जिंदल कंपनी वालों ने कब्ज़ा कर लिया है और उसे चारों तरफ कंटीले तार से घेर दिया है। लेकिन यहाँ के जो मज़दूर पहले से खेती कर रहे थे, उन्होंने इस तार को काट कर फिर से खेती करने लगे हैं। वन विभाग द्वारा भी यहाँ के लोगों को काफ़ी सताया जा रहा है, लेकिन इनका संघर्ष रुका नहीं है, अभी भी उनकी लड़ाई जारी है। 

जिंदल कंपनी के लोग इस ज़मीन पर फलदार पेड़ नहीं बल्कि बिना फल वाले और झाड़ी वाले पौधे लगा रहे हैं। उसको उखाड़कर भी यहाँ के लोग अपनी खेती कर रहे हैं और घर बना रहे हैं। वन विभाग के द्वारा इन लोगों  को धमकाया भी जाता है लेकिन गाँव वाले खेतों में जाकर जोर-शोर से नारा लगाते हैं- ‘जो खेत में नागड़ चलेतो, वही खेत का मालिक होतो’, ‘हम सब एक हैं’, ‘जिंदल कंपनी मुर्दाबाद’। 

इन सभी जगहों से घूमते-घूमते हम छत्तीसगढ़ के शहीदी स्कूल पहुंचे, इस स्कूल में गाँव की महिलाएं ही बच्चों को पढ़ाती हैं। इन महिलाओं के बारे में जो वहाँ के बजरंग दल के लोग बोलते थे कि यह महिला हो कर पढ़ाने जाती है! इस तरह के अलग-अलग ताने इन महिलाओं को दिए जाते थे लेकिन इसके बाद भी उन्होने अपना काम जारी रखा। हम इस स्कूल के बच्चों से भी मिले, बच्चों ने काफी अच्छे से सवाल किए और जबाब भी दिए। 

फीचर्ड फोटो आभार: https://anandpanchbhai.com/blogs/jana-swasthya-sahyog/

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  • अखिलेश, बिहार के अररिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। गाने लिखना, गाना और सबको खेल खिलाने में माहिर। जन जागरण शक्ति संगठन के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

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