ବାଲକ୍ରିଷ୍ଣ ଷାଣ୍ଡ/ बालकृष्ण साण्ड:

ଦେଶରେ କ୍ରୁଷି ଓ କ୍ରୁଷକର ସଂକଟ ଦେଖାଦେଇଛି। ବିଶେଷ ଅବିକଶିତ ରାଜ୍ଯ ରେ ସ୍ଥିତି ଭୟଙ୍କର। ଦରଦାମ ବ୍ରୁଦ୍ଧି ସମସ୍ୟା କୁ ଆହୁରି ଜଟିଳ କରୁଛି। କ୍ରୁଷି କାମ ଛାଡିବାକୁ ଚାଷୀ ମନ ବଲାଇଲାଣି। କିନ୍ତୁ କେତେକ ଲୋକ ପରମ୍ପରା ବାଧ୍ଯ ବାଧକତା କୁ ନେଇ ଚାଷ କରୁଛନ୍ତି। ସରକାର ଫସଲ ନଷ୍ଟର କ୍ଷତି କୁ ପୁରଣ କରିବା ପାଇଁ ଦେଶରେ କ୍ରୁଷିବିମା ଯୋଜନା ଲାଗୁ କଲେ। କେତେକାଂଶରେ ଚାଷୀ ଉପକ୍ରୁତ ହେଲେ। କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ୨୦୧୬ ମସିହାରେ ରାଷ୍ଟ୍ରିୟ ଫସଲବୀମା ଯୋଜନା ବଦଲ ରେ ଏକ ନୁତନ ଫସଲବୀମା ଯୋଜନା ତିଆରି କଲେ। ତାହା ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଫସଲବୀମା ଯୋଜନା ନାମରେ ପରିଚିତ। ଯେଉଁଥିରେ ଘରୋଇ କ୍ରୁଷିବିମା କମ୍ପାନୀମାନେ ଭାଗନେଇ ପାରିବେ। ଓଡ଼ିଶାରେ ୧୧ ଟି ଘରୋଇ ସରକାର କମ୍ପାନୀ ଚୁକ୍ତି କରଛନ୍ତି। ୧୧ ଟି କ୍ଲାଇମେଟିକ ଜୋନକୁ ୬ ଟି ସେକ୍ଟରରେ ଭାଗ କରାଯାଇଛି ଏବଂ କମ୍ପାନୀ ମାନକୁଂ ଭାଗ କରି ଦିଆଯାଇଛି। ହେଲେ ଏହି ପାଂଚ ବର୍ଷ ମଧ୍ଯରେ କମ୍ପାନୀ ଗୁଡିକ ହଜାରେ କୋଟି ଟଙ୍କା ଲାଭ ପାଇଲେଣି। ଚାଷୀମାନେ ବିଶେଷକରି ଅଣ ଜଲସେଚିତ ଅଂଚଳର ଯେଉଁମାନେ ମରୁଡିର ବାରମ୍ବାର ଶିକାର ହେଉଛନ୍ତି ହେଲେ କମ୍ପାନୀ ଗୁଡିକର ଶୋଷଣ ଓ ଠକେଇ ର ଷଡଯନ୍ତ୍ର ଯୋଗୁଁ ଏହି ଯୋଜନା ର ଲାଭ ଉଠେଇ ପାରୁ ନାହାଁନ୍ତି। ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଫସଲବୀମା ଯୋଜନା ରେ ଅନେକ ତ୍ରୁଟି ପରିଲକ୍ଷିତ ହୁଏ। ପ୍ରଥମତଃ ଜିଲ୍ଲା କିମ୍ବା ବ୍ଲକ ସ୍ତରରେ ଅଭିେଯାଗ ଶୁଣିବା ପାଇଁ ବ୍ଯବସ୍ଥା ନାହିଁ। ଜିଲ୍ଲାପାଳ କିମ୍ବା ଜିଲ୍ଲା କ୍ରୁଷି ଅଧିକାରୀ ଫସଲବୀମା ଯୋଜନା ବିଷୟ ରେ କୌଣସି ପ୍ରକର ତଥ୍ଯ ନେବାରେ ଅସମର୍ଥ ପ୍ରକାଶ କରନ୍ତି। ଯାହା କ୍ଷତିପୂରଣ ଦେବାର ନିଷ୍ପତ୍ତି ରାଜ୍ଯ ସ୍ତରରେ ହୋଇଥାଏ। ଯାହା ଜଣେ ଗରିବ ଚାଷୀ ଅଭିେଯାଗ କରିବାରୁ ବଂଚିତ ହୋଇଥାଏ। ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷରେ ଚାଷୀ ର ଆୟ କମିବାରେ ଲାଗିଛି। ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ଯ ତୁଲନା ରେ ଆମ ରାଜ୍ଯ ପ୍ରତେକ ଚାଷୀ ର ଆୟ କମ। ଶତକଡା ୮୦ ଭାଗରୁ ଊର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ସୀମାନ୍ତ ଓ ଛୋଟ ଚାଷୀ। ଚାଷ କାମର ଖର୍ଚ୍ଚ ବର୍ଷ କୁ ବର୍ଷ ବଢୁଥିବାରୁ ପରିବାର ଅର୍ଥନିତି ବିଗୁଡୁଛି। ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଫସଲ ବିମା ଯୋଜନା ଚାଷୀ କୁ ରକ୍ଷା କରିବା ପରିବର୍ତ୍ତେ କ୍ରୁଷି ବିମା କମ୍ପାନି ମାନକଂ ଚରାଭୁଇଁ ସାଜିଛି। ଚାଷୀ ଆନ୍ଦୋଳନ, ଧର୍ମଘଟ କଲେ ମଧ୍ଯ କିଏ ଶୁଣେ ନାହିଁ। ଏହା ଅସମାଧିତ ଭାବେ ବଢୁଛି। ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଫସଲ ବିମା ଯୋଜନାରେ ଚାଷୀମାନେ ଲାଭବାନ ହେଉନଥିବାରୁ ଓଡ଼ିଶା ରାଜ୍ଯ ସରକାର ଏହାକୁ ପ୍ରତ୍ୟାହାର କରି ନିଜସ୍ବ ସରକାରୀ କ୍ରୁଷି ବିମା ଯୋଜନା ଲାଗୁ କଲେ ଚାଷୀମାନେ ଉପକ୍ରୁତ ହୋଇ ପାରନ୍ତେ ଯାହା ଓଡ଼ିଶା ସରକାର ବିଚାର କରିବାର ଅଛି।

हिन्दी अनुवाद:

देश में कृषि और किसान दोनों संकट में हैं, अविकसित या पिछड़े राज्यों में यह स्थिति ज़्यादा गम्भीर है। बीज, खाद, और ईंधन के दाम लगातार बढ़ने के कारण खेती की लागत भी बढ़ती जा रही है जिससे यह समस्या और बढ़ती जा रही है। इसके चलते अब किसान खेती छोड़ने के लिए मन बना रहे हैं, लेकिन कुछ किसान खेती की पुरानी परंपरा के चलते आज भी खेती कर रहे हैं। कुछ सालों पहले सरकार, खेती में हुए नुकसान की भरपाई के लिए कृषि बीमा योजना लाई थी और कुछ किसानों को इससे फायदा भी हुआ।

केंद्र सरकार साल 2016 में राष्ट्रीय फसल बीमा योजना के बदले में एक नई फसल बीमा योजना लेकर आई जिसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के नाम से जाना गया। इसमें प्राइवेट कंपनियाँ भी भाग ले सकती थी। ओडिशा में इसके लिए 11 प्राइवेट कपंनियों को चुना गया। पिछले पाँच सालों में इन कंपनियों ने तो खूब मुनाफा कमाया लेकिन किसान को इससे कुछ खास फायदा नहीं हुआ। विशेष रूप से असिंचित खेती वाले किसानों को सूखे की सबसे ज़्यादा मार झेलनी पड़ती है, बीमा कम्पानियों की चालाकी और धोखेबाज़ी के कारण यह किसान इस योजना का लाभ नहीं उठा पाते।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बहत सारी गलतियाँ हैं, एक तो यह कि जिले या ब्लॉक में आपकी शिकायत सुनने की व्यवस्था नहीं है। डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर या जिला कृषि विभाग के आधिकारी, फसल बीमा योजना के दस्तावेज़ लेने से इन्कार कर देते हैं। मुआवजा देने के सभी निर्णय राज्य के स्तर पर लिए जाते हैं, इस कारण गरीब किसान की कोई सुनवाई नहीं है। किसान की आय लगातार कम होती जा रही है, आज ज़्यादातर  किसान सीमांत और छोटे किसान हैं। खेती के काम का खर्च बढ़ते जाने के कारण कृषि पर निर्भर परिवारों की आर्थिक स्थिती बिगड़ती जा रही है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, किसान को आर्थिक सुरक्षा देने के बदले बीमा कंपनियों की लूट का साधन बन के रह गयी हैं, किसान के आंदोलन करने पर भी कोई नहीं सुनता। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसान को कोई लाभ नहीँ मिल रहा है, इसलिए ओडिशा सरकार को इसकी जगह पर एक राज्य स्तरीय फसल बीमा योजना लानी चाहिए। आज की परिस्थितियों में ओडिशा के किसान की तरक्की ओडिशा सरकार पर ही निर्भर है।

फीचर्ड फोटो आभार: weather.com

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