सुखलाल तरोले:

भारत के 77% किसान सीमांत किसान है (ऐसे किसान जिनके पास 2.5 एकड से कम ज़मीन है)। केवल खेती से उनका जीवन यापन चल नहीं सकता है और मज़दूरी करने के लिए संपन्न औद्योगिक क्षेत्रों और बड़े किसानों के खेतों में काम करने के लिए पलायन करना ही उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। मध्यप्रदेश के बड़वानी ज़िले के ऐसे ही एक प्रवासी मज़दूर रामेश्वर और रेवंती की यह सत्यकथा है।

रामू और रेवन्ती मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव मड़दई में रहते थे, उनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के कारण वह गुजरात के एक गांव वारसड़ा, तहसील जेतपूर, ज़िला राजकोट में भाग (बटाई की) खेती करने गये थे। उनकी 3 बेटियाँ भी साथ में थी। जहां वह भाग खेती करते थे, वहीं रामू अपनी पत्नी रेवन्ती और बच्चों के साथ एक छोटी सी झोपड़ी में रह रहा था। भाग खेती में कुछ खास मुनाफ़ा नहीं हो रहा था, खेती का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही रामू और रेवन्ती को मिलता था, जबकि सेठ फसल के दो हिस्से रख लेता था। इसमें खाद और दवाई का खर्च सेठ को उठाना होता था, जबकि मेहनत-मज़दूरी रामू और रेवन्ती को करनी होती थी। रामू और रेवन्ती दोनो बहुत भोले-भाले थे, हमेशा सेठ की हाँ में हाँ मिलाते थे और खेती का हिसाब भी नहीं रख पाते थे। सप्ताह में हाट-बाज़ार के लिए सेठ, रामू को कुछ पैसे दे देता था। रामू हाट-बाज़ार करने के बाद और दिन भर के काम से थक कर शाम को दारू पी लेता था। हाट-बाज़ार सहित यह सब पैसा सेठ, रामू के खेती के हिस्से में से काट लेता था। सेठ, रामू की इस हरकत या कमज़ोरी को देखकर उसका फायदा उठाने लगा। सेठ रामू की पत्नी को भी गलत नज़र से देखता था। 

रामू के हिस्से की फसल बेचने भी सेठ ही जाता था। उसके हिस्से की फसल कितनी थी और किस भाव में बिकी, इसका पता ना तो रामू को था ना रेवन्ती को। रामू और रेवन्ती सेठ पर बहुत विश्वास करते थे, वो मानते थे कि सेठ उनके साथ कोई धोखा नहीं करेगा। खेती के सीजन के अंत में जब हिसाब हुआ तो रामू और रेवन्ती के हाथ कुछ नहीं आया, बल्कि सेठ ने उन पर कुछ कर्ज़ ही निकाल लिया, ताकि उन्हें अगले साल भी उसी के पास खेती करने आना पड़े। सेठ का कहना था कि तुम्हारे हर सप्ताह के हाट-बाज़ार के खर्च का जो पैसा लगता है, उसी में तीसरा हिस्सा हो गया, और अब रामू और रेवन्ती को ही वापस उसे पैसे देने हैं। 

दोनों युगल मज़दूर सेठ की बात मान गए और सोचा कि अब कम पैसा खर्च करेंगे और अधिक मेहनत करेंगे। धीरे-धीरे रामू को शराब पीने की आदत हो गई। सेठ भी रेवन्ती को कुछ बताए बिना ही रामू को शराब पीने के पैसे दे देता था और अपनी डायरी में लिख लेता था। जब खेती करते-करते करीब दो साल बीत गये और कुछ भी मुनाफा नहीं हुआ तो रामू ने सोचा कि भाग खेती छोड़कर गाँव वापस चला जाए या और कोई दूसरी मज़दूरी की जाए। सेठ हर साल हम पर बकाया निकाल देता है। 

रामू जब यह बात पत्नी रेवन्ती को अपनी झोपड़ी में बता रहा था तो इन दोनों की सारी बातें सेठ ने सुन ली। रामू का प्लान था, खेती छोड़कर गाँव भागना। सेठ ने उसके तुरंत बाद रामू की पत्नी रेवन्ती को जाकर कहा कि तुम तब तक कहीं नहीं जा सकते जब तक तुम्हारा बकाया पूरा नहीं हो जाता। अगर भागने की कोशिश की तो मैं तुम्हारे पैर पकड़कर बीच में से फाड़ दूंगा। यह सुन कर रेवन्ती काफ़ी डर गई और उसने रामू को भी यह बात नहीं बताई और अपने बच्चों के साथ मिलकर भाग खेती पूरी करने का निर्णय लिया। रामू के काफ़ी मनाने के बाद भी वह गाँव वापस जाने के लिए तैयार नहीं हुई, वह मन ही मन बहुत डरी हुई थी। रामू ने फिर रेवन्ती से कहा कि तुम्हें चलना है तो चलो, वरना मैं एक बच्ची को लेकर गाँव जा रहा हूँ। रामू को लगा कि उसे वहाँ ना पाकर सेठ, रेवन्ती और बच्चों को भी वापस भेज देगा, यह सोचकर रामू वापस अपने गाँव चला गया। 

काफ़ी महीने बीत जाने के बाद भी जब रामू की पत्नी और बच्चे वापस नहीं लौटे तो वह उन्हें लेने मध्य प्रदेश के अपने गाँव से वापस गुजरात गया। जब वह अपनी झोपड़ी में पहुंचा तो रेवन्ती अपने पति को देखकर बहुत खुश हुई, और अपनी आपबीती सुनाने लगी। रेवन्ती ने बताया कि रामू के चले जाने के बाद, यहाँ गाँव के लोग उसके बारे में गलत-गलत बातें करते हैं। कभी-कभी तो कुछ स्थानीय दबंग उसका रास्ता रोक लेते हैं और कहते हैं कि मुझसे शादी कर ले, तेरा पति तो तुझे छोड़कर भाग गया। एक-दूसरे की परेशानियाँ सुनते-सुनते रात हो गयी, तभी सेठ रात के 12 बजे झोपड़ी का दरवाज़ा तोड़कर अंदर घुस आया और रामू और रेवन्ती के साथ मार-पीट करने लगा, जिससे रेवन्ती का हाथ भी टूट गया। जैसे-तैसे रामू खुद को बचाकर वहाँ से निकाला और किसी अन्य पहचान के व्यक्ति की झोपड़ी में छुप गया। अगले दिन रामू ने सोचा कि मैं अपना देश छोड़कर यहाँ गुजरात आया हूँ, ना यहाँ की पुलिस मेरी सुनेगी और ना प्रशासन, यह सोचकर रामू अपने गाँव वापस लौट आया। 

वापस आकार उसने अपने गाँव के मुखिया को सारी बात सुनाई और अपनी पत्नी और बच्चों को वापस लाने की इच्छा जताई। वह अपने ससुराल वालों के पास भी गया, लेकिन गाँव और ससुराल वाले लोगों ने उसे यह कहकर मना कर दिया कि इतनी दूर कौन जाएगा? वहाँ कौन अपनी सुनेगा, वहाँ की तो भाषा भी अलग है, कायदे-कानून भी अलग हैं, वहाँ हमारी नहीं चल पाएगी। यह सुनकर रामू बहुत उदास हो गया और उसने भी मान लिया कि वह अपने पत्नी और बच्चों को कभी वापस नहीं ला पाएगा। 

निराश रामू, अब दिन-रात दारू के नशे में धुत रहता। गाँव के लोग भी उस पर ताने कसते कि तेरी पत्नी तो किसी और पुरुष के साथ रह रही है। यह सब सुनकर रामू और अधिक दारू पीने लगा। निराश रामू ने एक बार फिर से गुजरात जाकर अपने पत्नी और बच्चों को वापस लाने की ठानी, लेकिन कोई बात नहीं बनी। पत्नी और बच्चों से दूर हुए रामू को इसी तरह तीन साल बीत गए। 

रामू की ज़िंदगी में फिर से आशा की नई किरण तब जागी जब पश्चिम भारत मज़दूर अधिकार मंच के साथियों के साथ उसकी मुलाक़ात हुई। रामू की पूरी कहानी सुनकर मज़दूर अधिकार मंच के हम सभी साथी, रामू को लेकर गुजरात निकल पड़े। वहाँ पर सौराष्ट्र दलित संगठन के साथ मिलकर रामू की पत्नी को खोजते हुए सबसे पहले हमने गुजरात के राजकोट जाकर पुलिस को सूचना दी और रामू ने अपनी कहानी पुलिस को बताई। फिर पुलिस ने रेवन्ती, उसके तीन बच्चों और सेठ को खोजकर पुलिस स्टेशन में उन्हें हमारे सामने प्रस्तुत किया। लेकिन सेठ को इसकी सूचना पहले ही मिल चुकी थी और उसने रेवन्ती और बच्चों को पहले ही समझा दिया था कि पुलिस के सामने क्या बोलना है। उन्होंने भी पुलिस के सामने वही बोला जो सेठ ने समझाया था। इसके बाद हमारी टीम ने पुलिस से आग्रह किया कि रेवन्ती बाई को उसके पति के साथ वापस भेज दिया जाए और उन दोनों का फैसला उनके गाँव की ग्राम सभा करेगी, क्यूंकि उनका गाँव पाँचवी अनुसूची के क्षेत्र में आता है। 

गुजरात में बंधुआ मज़दूरी में फंसे परिवार को रेस्क्यू करने के बाद

आखिरकार रेवन्ती अपने गांव के साथियों की मदद से वापस अपने गाँव पहुँच पाई। गुजरात में रहते हुए उसे एक बेटी भी हुई, रामू ने भी  रेवन्ती बाई और बेटी को खुशी-खुशी अपना लिया। समाज कुछ भी कहे, लेकिन रामू ने रेवन्ती को अपने दिल में जगह दी। 

फीचर्ड फोटो: बड़वानी ज़िले के मड़दई गाँव में रामू और रेवन्ती का घर

Author

  • सुखलाल, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह वहाँ के स्थानीय मुद्दों और छात्र मुद्दों पर आदिवासी छात्र संगठन के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

    View all posts

One response to “मध्य प्रदेश के आदिवासी युगल रामू और रेवन्ती की कहानी”

  1. Suresh Avatar
    Suresh

    आदिवासी समाज की ज्वलंत समस्या को समाज के सामने रखने के लिए लेखक को धन्यवाद। रेवंतीबाई व उनके परिवार को सही सलामत उनके घर तक पहुँचाने वाली टीम को भी बधाई।
    इस लेख को पढ़ बहुत दुःख हो रहा है कि आज हमारे समाज के कई सारे लोग अपनी मूलभूत चीजों की भी पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं, मजबूरी में वें अन्य प्रदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। जहाँ पर उनके साथ कई प्रकार के शोषण होते हैं। जो कि वाकई में हम सभी के लिए चिंतनीय हैं।
    मैं कुछ सुझाव रखना चाहता हूँ, ताकि कुछ हद तक पलायन को रोका जा सकता है।
    1. ग्राम सभा, ग्राम पंचायत को किसानों के लिए सिंचाई की अधिक से अधिक व्यवस्था करवाई जाएं, ताकि किसान अपने ही कृषि से आमदनी कर अपनी जीविका का निर्वाहन कर सकें।
    2. युवा साथी कृषि के साथ साथ अन्य छोटे मोटे रोजगार पर ध्यान दें ताकि उनके परिवार को अन्य राज्य की ओर भटकना न पड़े।
    3. गाँव के लिए लोग एक दूसरे की मदद करें किसी को बाहर जाना न पड़े।
    4. मनरेगा के तहत गाँव में ही रोजगार उपलब्ध करवाया जाए।

    इस लेख को पढ़कर मेरे मन में कुछ सुझाव आए, यदि इन सुझावों को पढ़कर अमल किया जाए तो शायद कुछ हद तक पलायन को रोका जा सकता है।

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading