दलित आदिवासी मंच: लोगों का संगठन, लोगों के लिए

तेजस्विता:

(04 नवंबर 2020)

दोपहर बाद श्रुति टीम (तेजस्विता, एमलॉन और सिद्धार्थ), राजिम दीदी, देवेन्द्र भाई और ट्रेनर कुमुद दीदी, दलदली गाँव में महिला ट्रेनिंग मीटिंग के लिए निकल पड़े थे। ट्रेनिंग के लिए ले जाई जा रही सामग्री को देखकर मेरे अंदर भी ऐसी ट्रेनिंग में भाग लेने और सीखने की एक उत्सुकता थी।

गाँव पहुँचने पर मालूम चला कि पिछली रात हाथियों का झुंड गांव के पास से निकला था। इस गाँव में भी हाथी के कहर और उससे परेशान लोगों की बातों से पता चला कि पिछली रात काफी लोगों की धान की फसल को नुकसान पहुंचा है। इस कारण गाँव के अधिकांश लोग खेतों में धान की कटाई में जुटे हुए थे।

इस दौरान हमें गाँव में शुरू किए गए सूचना केंद्र को देखने का भी मौका मिला। दलित आदिवासी मंच ने अलग-अलग गाँव में ऐसे केंद्र खोले हैं, जहाँ बच्चे अक्षर ज्ञान की पढ़ाई के साथ-साथ गाँव के इतिहास, जंगल और वनोपज से रिश्ते, पारंपरिक त्यौहार, व्यवहारिक संवेदनशीलता, महिला-पुरुष के काम और उनमें एक दूसरे की मदद, तम्बाकू, दारु, गुटका सेवन के स्वास्थ्य पर असर, संविधान और हमारे मूल अधिकार, जंगल की सैर, चित्रकारी, इत्यादि जैसे विषयों/गतिविधियों में भी हिस्सा लेते हैं। राजिम दीदी ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से माहराजी और दलदली गाँव के सूचना केंद्र सुचारू रूप से चल रहे हैं।

संगठन से जुड़ी दलदली गाँव की ही युवा साथी पिंकी, इस केंद्र को चलाती हैं। खुद 10वीं पास और इसी साल 12वीं की परीक्षा देने वाली पिंकी, हर रोज़ लगभग 60-70 बच्चों को सूचना केंद्र में पढ़ाती हैं। मार्च 2020 में कोविड-19 के चलते लगे लॉकडाउन के बाद से, सब बच्चों का स्कूल और पढ़ाई से रिश्ता ही छूट गया। ऐसे में पिंकी ने न केवल कोविड-19 के बारे में गाँव के लोगों को सचेत किया, बल्कि संगठन के साथ मिलकर राहत सामग्री भी बांटी। पिंकी ने घरों की दीवारों पर कोविड-19 के बारे में जानकारी बढ़ाने वाले संदेश लिखे, पलायन कर लौटे मज़दूरों का सर्वे किया और गाँव के बच्चों के लिए सूचना केंद्र में स्कूल चलाने जैसी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली।

गाँव की गलियों में चलते हुए पिंकी बताती हैं कि सूचना केंद्र अभी व्यवस्थित नहीं है, क्यूंकि इसमें पुताई का काम चल रहा है और सारा सामान फिलहाल दूसरे साथियों के घरों पर रखा गया है। बातचीत के बीच वह एक घर पर हमे बड़ा सा सन्दूक दिखाती हैं, जिसमें सारी किताबें, बोर्ड गेम्स और पोस्टर्स रखे गए हैं। गाँव के लोगों ने भी सूचना केंद्र के प्रयास को गंभीरता से लिया है और अपनी सहूलियत के हिसाब से केंद्र के लिए टेबल, कुर्सी, पोस्टर, चार्ट पेपर, ट्रंक, बर्तन जैसे सामान खरीदकर अपना योगदान दिया है।

राजिम दीदी के साथ आगे बढ़ते हुए हम फिर संजू दीदी के घर गए। संजु दीदी की उम्र ज़्यादा नहीं है, वो खुद महिला समूह से जुड़ी हुई हैं और उन्होने समूह के ज़रिए किचन गार्डनिंग शुरू की है। अपनी बाड़ी में समूह से मिले हल्दी बीज के खिले पौधों से वो एक हल्दी का फूल तोड़कर मुझे देती हैं, और उसके फायदे गिनाते हुए स्वास्थ्य के लिए अच्छे, देसी नुस्खे बताती हैं। पूरी बातचीत के दौरान वह बड़े गर्व से हमें अपनी बाड़ी दिखाई।

लॉकडाउन के चलते बलौदा बाज़ार और महासमुंद ज़िले में भी प्रवासी मज़दूर लौटकर गाँव आए हैं। रोज़गार के अवसरों के अभाव के चलते संगठन ने तय किया कि गाँव-गाँव में महिला समूह बनाया जाएं। यह समूह महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम करने की पहल से शुरू किया गया है, ताकि न केवल पलायन रोका जा सके बल्कि ऐसे उपाय निकाले जाएँ जिनसे महिलाएं, समूह के रूप से अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा सकें।

संगठन ने माहराजी, खोसड़ा और अर्जुनी पंचायतों के 10 गाँवों में यह महिला समूह गठित किए हैं। अभी तक हर गाँव में 3-4 महिला समूह गठित हुए हैं और हर महीने प्रति महिला 50 रूपए समूह के खाते में जमा किए जा रहे हैं। बहुत से समूहों ने अपने नाम – जागृति महिला समूह, सशक्त महिला समूह, उन्नति महिला समूह, उजाला महिला समूह, आदि रखे हैं। संगठन ने पहली बार की ट्रेनिंग के लिए समूह को आर्थिक सहायता दी थी। समूह के माध्यम से फलदार वृक्ष व अलग-अलग तरह की सब्ज़ी /जड़ी बूटी और मडिया के बीज बांटे गए। बीती ट्रेनिंग में बीज निरीक्षण, बीज का चयन और अलग-अलग प्रकार की जैविक खाद बनाना सिखाया गया था।

दलदली गाँव में महिला ट्रेनिंग

इसी समूह की पहल के कारण दलदली गाँव में ट्रेनिंग आयोजित की गयी थी। इसमें साबुन, फिनायल  बनाना और दो प्रकार के मशरूम की खेती करने की ट्रेनिंग दी गई। गाँव की 40 से ज्यादा महिलाएं इस ट्रेनिंग में शामिल हुई। ट्रेनिंग की शुरुआत में गाँव की स्थिति, वन अधिकार कानून और व्यक्तिगत-सामुदायिक पट्टों की स्थिति समझने के उद्देश्य से सब महिलाओं के साथ बातचीत हुई। साल 2014 से दलित आदिवासी मंच से जुड़े इस गाँव में 72 परिवारों में से 65 परिवारों को वनअधिकार के व्यक्तिगत पट्टे मिल चुके हैं। महिलाएं बताती हैं कि पट्टा मिलने से पहले सभी बेगारी करते थे। उनको किसी भी प्रकार की कृषि से जुड़ी सहायता मिलने में कठिनाई होती थी। पर पट्टा मिलने के बाद से उन्हें सभी तरह की सुविधाएं और सहायता मिल रही हैं।

ट्रेनिंग की रिसोर्स पर्सन कुमुद दीदी ने साबुन बनाने की प्रक्रिया से शुरुआत की। सबसे पहले इसके लिए ज़रूरी कच्ची सामग्री की जानकारी दी गई और उन्हें गर्मकर पिघलाने की प्रक्रिया को वहीं पर करके समझाया गया। इसके बाद उसमें खुशबू और रंग के लिए कब और क्या सामग्री डालनी है यह बताया गया। मिक्सचर को सांचे में डालना, और सांचे से साबुन निकालकर उसकी पैकिंग करना सिखाया गया। सबसे आखिरी चरण में साबुन का कितना दाम रखना है, इस पर चर्चा करते हुए साबुन बनाने की विधि विस्तार से सिखाई गई। कुछ इसी तरह  फिनायल बनाना भी सिखाया गया।

अगले चरण में दो प्रकार की मशरूम की खेती करने पर प्रशिक्षण हुआ। इसमे बताया गया कि पुआल को एक रात पहले धो कर, उसका पानी अगले दिन अच्छे से निकालना है, फिर प्लास्टिक की पन्नी में पुआल बिछाकर मशरूम के बीज डालने है और अच्छे से उन्हें प्लास्टिक में दबाना है, ताकि बीच में हवा ना रह जाए। 20-22 दिन बाद आए बदलाव देखने के लिए, ट्रेनिंग में रोपे गए मशरूम फूटने के लिए गाँव के एक घर में रख दिया गया।

मशरूम खेती की ट्रेनिंग

इस ट्रेनिंग के ज़रिए हम संगठन के कार्यकर्ताओं कौशल्या और पुनीराम से भी मिले। दोनों ही साथियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में पलायन कर आए मज़दूर साथियों का सर्वे भी किया है। पूरी मीटिंग के दौरान कौशल्या दीदी का प्रबंधन कौशल भी दिख रहा था। कौशल्या दीदी ने महिलाओं के साथ चर्चा में एक अच्छी मध्यस्थता करते हुए अपनी भूमिका निभाई। ट्रेनिंग के दौरान पुनीराम और कौशल्या बहुत ध्यान से सब सीख रहे थे, ताकि आने वाले समय में वह स्वयं इस तरह की ट्रेनिंग गाँव-गाँव जाकर समूहों को दे सकें।

राजिम दीदी की अच्छे नेटवर्किंग के कारण दिल्ली की एक संस्था ने किशोरियों में वितरण करने के लिए सेनेटरी पैड भी भेजे थे। मीटिंग के अंत में, 30 से ज्यादा किशोरियों को एक पैकेट सेनेटरी पैड और एक साबुन दिया गया। पर संगठन ने सिर्फ सामग्री वितरण तक अपने आप को सीमित न रख, 5 गाँव की किशोरियों की मीटिंग भी बुलाई थी। इस मीटिंग में 80 से भी ज़्यादा किशोरियां शामिल हुई।

किशोरियों में सेनेटरी पैड और साबुन वितरण

इस मुहिम के फलस्वरूप क्षेत्र में किशोरियों का एक समूह भी बन पाया है। 22-23 नवम्बर को किशोरियों की दो-दिवसीय मीटिंग रखी गई है जिसमे जेंडर, जेंडर समानता और महिला स्वास्थ्य पर चर्चा होगी। इसे एक सामूहिक पहल बनाने के लिए सब खर्च और व्यवस्था की ज़िम्मेदारी भी आपस में बांटी गई है। माहराजी गाँव के महिला समूह को खाने-पीने की व्यवस्था सौंपी गई है। यह दो-दिवसीय मीटिंग, नाच-गाना, फिल्म स्क्रीनिंग, चर्चा और लुप्त होते पुराने खेलों को खेलने से भरी होगी।

राजिम दीदी, कौशल्या, दीदी, पिंकी और कुमुद दीदी चारों ही महिलाओं ने क्षेत्र में एक बहुत ही सजक और सक्रिय भूमिका निभाई है। सभी अपने-अपने स्तर पर समाज में जाति, लिंग भेदभाव के बारे में आवाज़ उठा रहे हैं और निरंतर उस पर काम कर रहे हैं। राजिम दीदी के अपने जीवन और सांगठनिक कामों के संघर्ष और अनुभव व उनका दृढ़ निश्चय और हर छोटी-बड़ी बात में उनकी उपस्थिति, क्षेत्र के लोगों से बात करने पर दिख जाती है।

Author

  • तेजस्विता, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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