मुकेश डुडवे:

पश्चिम मध्य प्रदेश के बारेला आदिवासियों के गांव का मुख्य देव, बाबदेव होता है। बारिश के मौसम की शुरुआत में जब सभी प्रकार के बीज उग कर धरती पर हरियाली फैलाने लगते हैं, तब हमारे पूरे गांव के लोग बाबदेव के स्थान पर ज्वार व उड़द के दाने व दूध लेकर देवस्थान पर एकत्र होते हैं। फिर वहां पूजा कर के बाबदेव से वचन लिया जाता है कि बारिश अच्छी होनी चाहिए, फसल भी अच्छी होनी चाहिए, मानव जीवन को भी नुकसान, बीमारी नहीं होनी चाहिए। हमारे पालतू जानवरों को जंगली जानवर ना खाएं इसलिए भी इस समय मन्नत मांगी जाती है। उड़द व ज्वार के दाने मिलाकर हर घर में दिए जाते हैं, जो कपड़े की छोटी थैली बनाकर गले में या कमर में बांध लेते हैं। ये दाना दरवाजे के पास रखते हैं और ऊपर से खैर के पेड़ की लकड़ी की खूंटी वहां ठोक देते हैं। इस पूजा विधि से हम साल भर के लिए मानव जीवन की रक्षा करने की आशा रखते हैं।

कभी किसी रात बारिश नहीं आती देखकर गांव के मुखिया लोग – पटेल, पुजारा, गांव डाहला, वारती एवं कोतवाल को हाथ बांध कर बाबदेव के पास बैठा दिया जाता है। उन्हें खाने के लिए दूध के अलावा कुछ नहीं दिया जाता है। इस तरह लोग सोचते हैं कि कभी-कभी देव से भी धमकी देकर काम करवाना पड़ेगा।

हमारे सभी अन्य देवों की तरह बाबदेव का कोई मंदिर नहीं होता। हमारा देव हमारे जैसे ही धूप, बारिश, ठंड सहन करता है। देव का स्थान होता है, जहां कुछ पेड़ या झाड़ियां होती हैं। पुराने लोग बताते हैं कि पहले बाबदेव के आस-पास से लोग पेड़ नहीं काटते थे तो देव की पहाड़ी हरदम हरी-भरी रहती थी। इसी हरियाली में देव का वास था। हमारे देव भी हमारे जैसे ही सहनशील और कड़क हैं।

हमारे ऊपर कभी विपत्ति आने पर हमारे घर में जो भी चीज उपलब्ध हो, हम उसे देते हैं। लोग कभी आते-जाते तंबाकू, बीड़ी, चावल, चवले के दाने जो भी मन में आता है देव पर चढ़ा देते हैं। कभी गाड़ी भर के खेत से फसल लायेगा तब भी कुछ दाने चढ़ा देगा या कभी अंधेरे में अकेले जाने में, डर लगे तब भी कुछ ना कुछ चढ़ा देगा। कभी हाट से आते समय जलेबी भी रख देगा। इस प्रकार हम पीढ़ियों से करते आए हैं। हमारे देव को रोज-रोज पूजा करने की ज़रूरत नहीं है। 

हमारे देव से हमारा व्यवहार, डर का नहीं बल्कि मित्रता का है। हम अपने देवता को दूसरों से अच्छा बताने के लिए दूसरी धार्मिक परंपराओं को गालियां नहीं देते। हम लोग बीमार पड़ते हैं तो पीर पर भी जाते हैं, गुरु से धागा भी बंधवा लेते हैं। कभी ये नहीं सोचते कि ये देव हमारे नहीं हैं। हमारे देवता हमारे जैसे ही हैं। जो हम खाते हैं, वही वे भी खाते हैं। मास भी खाते हैं, शराब भी पीते हैं।

धर्म के नाम पर किसी से छेड़ छाड़ नहीं करनी चाहिए।

फोटो आभार: तेजस्विता

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  • मुकेश, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं। वे आदिवासी मुक्ति संगठन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। मुकेश आदिवासी समाज को जागरूक करने में निरंतर लगे हुए हैं।

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