खुशी उपाध्याय:
कभी कभार
लगता है,
कितना आसान है-
किसी को
खुश करना!!
फ़िर
मैं सोचती हूँ,
उस पिता के बारे में
जिसने
अपनी बेटी की शादी में
लोगों को
बस दो दिन
खुश करने के लिए
ज़िंदगी भर की मेहनत
दाव पर लगा दी;
फिर कुछेक
दिनों बाद
बेटी
दहेज न देने के कारण
जला दी गई,
वे लोग
जो शादी में
बड़े चाव से
खाना खा रहे हैं
अब शायद
मृत्यु भोज पर ही आएँगे।
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खुशी उपाध्याय बागेश्वर, उत्तराखंड से हैं। वे कक्षा 11वीं की छात्रा हैं और लेखन व कलाकृतियों के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। प्रकृति, जीवन और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषयों में उनकी विशेष रुचि है। वे अपनी रचनाओं में शब्दों और रंगों के माध्यम से अपने आसपास की दुनिया को समझने और उसे अभिव्यक्त करने का प्रयास करती हैं।

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