राधा परिहार:
अनुभव: स्कूल खत्म होने के बाद जब मेरे साथी अपने आगे की पढ़ाई और सपनों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रहे थे, वहीं मैंने एक साल का ब्रेक लिया, सिर्फ ये सोचने के लिए कि मुझे अपने ही शहर में रहना है या अपने शहर से दूर, जहाँ अपना कोई नहीं हैं। यह निर्णय लेना मेरे लिए इसलिए मुश्किल था, क्योंकि मैं बहुत इंट्रोवर्ट थी और ऐसी जगह नहीं जाना चाहती थी जहाँ सब मेरे लिए अनजान हो। एक साल घर में मम्मी-पापा के साथ बहस और काफी सोच-विचार करने के बाद मैंने निर्णय लिया कि मुझे अपने ही शहर में रहना हैं।
ड्रॉप ईयर के बाद मैंने अपने ही शहर के कॉलेज में एडमिशन लिया और मेरा लक्ष्य सिर्फ़ डिग्री लेना था और जैसे-तैसे कॉलेज के तीन साल काटने थे। अपने लक्ष्य के मुताबिक मैंने अपने शुरुवात के एक से डेढ़ साल यूँ ही बिता दिए, न किसी से बोलना न कोई दोस्त बनाना, न ही क्लॉस में अपना किसी प्रकार का योगदान देना। इन डेढ़ साल में कभी मैंने क्लास ली, कभी नहीं।
परंतु कॉलेज में इतना समय बिताने के बाद मुझे ऐसे शिक्षक का मार्गदर्शन मिला, जिन्होंने मेरी क्षमता को पहचाना, मेरे कार्य की सराहना की और कक्षा में कई सारे विद्यार्थीयों के बीच मेरी प्रशंसा की, जिस कारण मेरे अंदर सिखने की इच्छा और अच्छा परफॉर्मेंस देने की दिलचस्पी जगा दी। उनकी सराहना से मुझे महसूस हुआ कि मेरे अंदर पोटेंशियल हैं जो कि मेरे डर के कारण मुझमें छिपा हुआ था। फिर धीरे-धीरे मैंने क्लास में रेस्पॉन्स करना शुरू किया।
इस दौरान फिर कुछ ऐसे लोगों से मिली, जिनके साथ मुझे कंफर्टेबल लगता था और उनसे मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। जहाँ कॉलेज के शुरुवाती दिनों में कभी-कभी मुझे अपने निर्णय पर पछतावा होता था, वहीं आज मुझे अच्छा और सही निर्णय लेना महसूस होता है, क्योंकि जो लड़की कभी अनजान लोगों से घबराती थी, वह एक सपोर्टिव टीचर और अच्छे दोस्तों के साथ की वजह से वह थोड़ा-थोड़ा खुलने लगी। और वक्त इतनी तेज़ी से बीत रहा है कि पता ही नहीं चला की कब मैंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर ली और पोस्टग्रेजुएशन में एडमिशन ले लिया।
इस दौरान मुझे अपने टीचर्स और दोस्तों से बहुत कुछ सीखने को मिला। जिस कॉलेज में मैंने सिर्फ़ डिग्री के लिए एडमिशन लिया था, वहीं से अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन के कारण अपने सपनों व लक्ष्य को हासिल करने का कार्य कर रही हूँ।
अपने इस कॉलेज के सफर में मुझे यह बात समझ आई कि हर विद्यार्थी के जीवन में एक ऐसा अध्यापक होना बहुत ज़रूरी है, जो हमें हमारी क्षमताओं से अवगत कराए। हमारी शिक्षा व्यवस्था को ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है, जो पढ़ाई को बोझ न बनने दे, बल्कि हम छात्रों की सीखने के प्रति रुचि जगा दें। शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं है, शिक्षा का मतलब है सही मार्गदर्शन जो एक छात्र को नई चीज़ें सीखने और अपने सपनों को पूरा करने का हौसला देता है।

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