मानसी यादव:

मैं मानसी हूँ। अयोध्या के एक छोटे से ग्राम पंचायत से निकलकर डॉ. राम मनोहर लोहिया यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री में मास्टर्स करने तक का सफ़र तय किया है। आगे भी पढ़ने की ख़्वाहिश ज़िंदा है, लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ और अपने आसपास के माहौल को समझती हूँ, तो मन में अजीब सी कसक उठती है।

गाँव के स्कूल में जब आठवीं तक पढ़ा करती थी, तब पढ़ाई का असली मतलब क्या था? कुछ भी नहीं। बस इतना ही समझ आता था कि सुबह उठकर स्कूल जाना है, किसी तरह घंटी बजने का इंतज़ार करना है और घर लौट आना है। पढ़ाई एक बोझ से ज़्यादा कुछ नहीं लगती थी।

ज़िंदगी में थोड़ा बदलाव तब आया जब गाँव से बाहर निकलकर अयोध्या के ‘गुरु नानक एकेडमी’ में आगे की पढ़ाई शुरू की। पर सच कहूँ तो वहाँ भी ज़हन में सिर्फ़ एक ही धुन सवार थी, कक्षा में नंबर अच्छे लाने हैं, टेस्ट पास करना है और जैसे-जैसे करके परसेंटेज बढ़ाना है।

कभी किसी टीचर ने, ना ही घर के किसी बड़े ने बैठकर यह समझाया कि किताबों में जो हम पढ़ रहे हैं, चाहे वो साइंस हो, मैथ्स हो या कोई भी विषय, उसका हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से क्या लेना-देना है। किसी ने यह नहीं बताया कि ये किताबें दरअसल उन लोगों का अनुभव हैं जिन्होंने कभी प्रकृति को, इस दुनिया को बहुत बारीकी से देखा और समझा था। पढ़ाई का मकसद हमारे दिमाग को एक ‘लेंस’ देना था, जिससे हम दुनिया को समझ सकें। लेकिन हमें क्या मिला? एक अंतहीन रेस। 10वीं और 12वीं के बोर्ड्स का खौफ, फिर नीट, यूपीएससी या सरकारी नौकरी पाने का दबाव।

इसी माइंडसेट के साथ स्कूल बीता, इसी सोच के साथ कॉलेज और मास्टर्स भी ख़त्म हो गए। और आज? आज मैं भी खुद को उसी भीड़ का हिस्सा पाती हूँ जहाँ देश का हर दूसरा युवा खड़ा है।

आज आलम यह है कि गाँव हो या शहर, हर गली-मोहल्ले में दो-चार ‘लाइब्रेरी’ खुल गई हैं। ये लाइब्रेरी ज्ञान अर्जित करने की जगह कम, और एक मजबूरी का अड्डा ज़्यादा बन चुकी हैं। जहाँ युवा सुबह से शाम तक खुद को बंद करके सरकारी नौकरी की तैयारी में घिस रहे हैं। जिस उम्र में नए आइडियाज़ पर काम होना चाहिए था, AI और नई तकनीकों की स्किल्स सीखनी चाहिए थीं, कुछ अपना बिजनेस या नया सीखने का ज़ोखिम उठाना चाहिए था, वो सारा कीमती समय, वो सारी ऊर्जा सिर्फ़ एक ‘सुरक्षित सरकारी नौकरी’ की आस में होम हो रही है।

सोचने वाली बात यह है कि अगर 20 लाख बच्चे किसी एग्ज़ाम में बैठ रहे हैं, तो सीटें तो कुछ हज़ार ही हैं! ज़ाहिर है कि सबको नौकरी नहीं मिलेगी। लेकिन हमारा समाज? समाज और परिवार किसी इंसान की काबिलियत उसके ज्ञान से नहीं, उसकी ‘पोस्ट’ और उसके ‘सेलेक्शन’ से नापते हैं।

चार-पाँच साल लगातार तैयारी करने के बाद जब किसी का सेलेक्शन नहीं होता, तो उसके अंदर एक गिल्ट भर दिया जाता है। वो खुद को नाकारा समझने लगता है। धीरे-धीरे डिप्रेशन हावी होता है और कई बार तो मासूम बच्चे इतने भयानक कदम उठा लेते हैं कि सुनकर रूह काँप जाती है। फिर भी, इस मानसिक दबाव पर न परिवार खुलकर बात करता है, न समाज।

पढ़ाई जो कभी इंसान को आज़ाद बनाने, सोचने-समझने की क्षमता देने का ज़रिया हुआ करती थी, आज सिर्फ़ एक ‘सुरक्षा कवच’ या ‘नौकरी पाने का साधन’ बनकर रह गई है। अगर आपके पास सरकारी नौकरी का ठप्पा नहीं है, तो आपके ज्ञान का, आपकी डिग्रियों का इस समाज की नज़र में कोई मोल नहीं है।

हम युवाओं को इस खोखली मानसिकता से बाहर निकलने की सख्त ज़रूरत है, और उससे भी ज़्यादा ज़रूरत इस बात पर खुलकर बात करने की है।

Author

  • मानसी मठिया मेहदौना बारुन बाजार की रहने वाली हैं। उन्होंने मास्टर केमिस्ट्री में किया है। पिछले 3 सालों से अवध पीपल्स फोरम के साथ जुड़ कर लड़कियों-महिलाओं के साथ उनके शिक्षा, स्वास्थय और सामाजिक मुद्दों पर काम करके उनकी समस्याओं को समझने और सुलझाने का काम कर रही हैं। मानसी ने सामाजिक परिवर्तनशाला में भी भाग लिया है। इस तरह से वैज्ञानिक चेतना को जानते समझते वो समुदाय के साथ भी काम करते हुए इससे बढ़ावा दे रही हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading