पल्लवी श्रीवास्तव:

भारत को सदियों से कृषि प्रधान देश कहा जाता है। आज भी देश की बड़ी आबादी का जीवन खेती और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। खेती केवल भोजन उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि भारतीय  अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन की पहचान भी है। फिर भी बदलते समय के साथ युवाओं की सोच और प्राथमिकताओं में बड़ा परिवर्तन आया है। शिक्षा का विस्तार, तकनीक का विकास, शहरों में रोजगार के अवसर और बेहतर जीवनशैली की चाह ने बड़ी संख्या में युवाओं को गाँवों से शहरों की ओर आकर्षित किया है। ऐसे में फिर उसका सपना खेती से दूर किसी दूसरे क्षेत्र में करियर बनाना है

इस समय में ज़्तयादातर युवाओं की पहली पसंद खेती नहीं केवल सरकारी नौकरी प्राइवेट नौकरी, अपना व्यवसाय, बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, सेना या विदेश जा कर वहा काम करना हो गया है। उनका मानना है कि खेती में मेहनत बहुत ज़्यादा है, लेकिन आमदनी कम है। मौसम की खराबी बढ़ती लागत, महगे बीज और खाद, सिंचाई की समस्या के साथ साथ प्राकृतिक आपदाएँ  फसल का अच्छा दाम न मिलना खेती को जोखिम भरा बनाते हैं। यही कारण है कि बहुत युवा खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

इसका यह मतलब नहीं है कि युवाओं ने खेती से पूरी तरह दूरी बना ली है। पिछले कुछ वर्षों में एक नई सोच भी विकसित हुई है। कई पढ़े-लिखे युवा खेती को अपना बोझ नहीं  व्यवसाय के रूप में देखने लगे हैं। वे जैविक खेती, प्राकृतिक खेती, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, डेयरी, बकरी पालन,फल और सब्जियों की खेती, फूलों की खेती नए अवसर तलाश रहे हैं। कुछ युवा सोशल मीडिया के माध्यम से अपने उत्पाद सीधे ग्राहकों तक बेचकर बेहतर लाभ भी कमा रहे हैं। इससे खेती में काफि फायदा हुआ है

अगर अभी की बात करें, तो भारत में आज भी बड़ी संख्या में लोग कृषि पर निर्भर हैं। सरकारी सर्वे के अनुसार लगभग 45–46 प्रतिशत लोग आज भी कृषि और उससे जुड़े कार्यों से अपनी आजीविका कमाती है। वहीं देश के लगभग 16–18 प्रतिशत लोग घरेलू उत्पादन कर के अपना गुजारा करते है

दूसरी तरफ ग्रामीण युवाओं का एक बड़ा वर्ग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जा रहा है। बहुत से सर्वे के अनुसार लगभग 30–40 प्रतिशत गाँव के युवा खेती के बजाय सरकारी या प्राइवेट नौकरी को ज़्यादा महत्त्व देते है और बहुत से युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं कई युवा निजी कंपनियों, उद्योगों, निर्माण कार्य, सेवा क्षेत्र और छोटे व्यवसायों में रोज़गार की तलाश कर रहे हैं। कुछ युवा विदेश जाकर भी बेहतर अच्छा पैसा कमा रहे है यह बदलाव केवल आर्थिक कारणों से नहीं, सामाज मे फैली गलत धारणनाओ के कारण भी लोग सोच समझ नही पाते है और बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और आधुनिक जीवनशैली की चाह से भी जुड़ा हुआ है।

इसके बावजूद कृषि क्षेत्र में संभावनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। आज खेती केवल गेहूँ और धान उगाने तक सीमित नहीं है। कृषि में तकनीक, वैज्ञानिक तरीके और मूल्य के माध्यम से अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है। यदि किसानों को उचित बाजार, प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर मिले, तो खेती एक लाभदायक और सम्मान जनक व्यवसाय बन सकती है।

सरकार भी युवाओं को खेती की ओर आकर्षित करने के लिए कई योजनाएँ चला रही है। कृषि प्रशिक्षण, किसान  प्राकृतिक खेती और कृषि यंत्रीकरण जैसी पहलें युवाओं को नए अवसर प्रदान कर रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य खेती को आधुनिक, लाभकारी और रोजगार बनाना है।

यह कहा जा सकता है कि आज सभी युवा खेत को अपने भविष्य के रूप में नहीं देख रहे हैं, लेकिन पूरी तरह खेती से दूर भी नहीं हुए हैं। अभी भी कुछ युवाओं की खेती में रुचि कम हुई है, जबकि आधुनिक और व्यावसायिक खेती के प्रति रुचि बढ़ रही है। खेती को लाभकारी बनाने के लिए  किसानों को उचित मूल्य मिले, आधुनिक तकनीक उपलब्ध हो और युवाओं को प्रशिक्षण व आर्थिक सहयोग मिले, तो आने वाले वर्षों में अधिक से अधिक युवा  खेती को अपना करियर चुन सकते हैं।

भारत का भविष्य केवल शहरों में नहीं है, गाँवों और खेतों में भी बसता है। यदि युवा अपनी शिक्षा, तकनीक और उद्यमिता को खेती से जोड़ें, तो कृषि न केवल उनकी आय बढ़ा सकती है, देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। खेती को मजबूरी नहीं, बल्कि सम्मान और उद्यमिता से जुड़ा व्यवसाय बनाने की जरूरत है। तभी युवा खेत को अपने उज्ज्वल भविष्य के रूप में देखने के लिए तैयार होंगे।

Author

  • पल्लवी श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के रिसिया ब्लॉक के रायपुर गाँव की रहने वाली हैं। वे बी.एससी. (बायोलॉजी) की छात्रा हैं। सरजू फाउंडेशन के साथ जुड़कर वे युवाओं और बच्चों के बीच लाइब्रेरी, कोचिंग सेंटर, नेचर वॉक आदि के माध्यम से विज्ञान, संविधान, समानता और व्यक्तिगत विकास जैसे विषयों पर काम करती हैं। वर्तमान में वे राज्य-स्तरीय सामाजिक परिवर्तन कार्यशाला से भी जुड़ी हैं।

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