पुनम कांडेयांग:
तुम उसकी हो हमारी नहीं
ना मैं इसकी हूँ, ना मैं उसकी हूँ।
मैं तो उन सपनों की एक अंश हूँ,
जो मुझमें दिखते थे आपको।
क्यों ? कहती हो तुम उसकी हो।
क्यों ? पुकारती हो पराया मुझे।
क्या मेरी बचपना सबने भुला दिया,
क्यों ? कहती हो तुम उसकी हो
कैसे स्वीकारूँ? मैं उसकी हूँ,
जिसने मेरा बचपना देखा ही नहीं।
प्यास लगी थी पिलाया नहीं,
भूख लगी थी खिलाया नहीं,
कैसे स्वीकारूँ मैं उसकी हूँ?
क्यों कहती हो तुम उसकी हो
माँ ! अभी तो मैं वो दुनिया भी नहीं देखी हूँ।
जो कभी गोदी में दिखाया मुझे।
माँ ! आपके सपना मेरा हो गया है,
मैं वो सपना सकारना चाहती हूँ ।
जो मुझमें झलकती आपको
माँ ! मैं उन सपनों को बुनना चाहती हूँ।
जो बचपन में आपने मुझे दिखाया।
माँ ! अभी तो मैं उन सपनों की,
राहों में कदम रखी हूँ।
अभी ना कहना तुम उसकी हो ,
अभी तो मैं वो दुनिया भी नहीं देखी माँ।
जो मुझमें दिखती थी आपको,
माँ ! ना मैं इसकी हूँ, ना मैं उसकी हूँ।
मैं तो उन सपनों की एक अंश हूँ, जो मुझमें दिखते थे आपको।

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