जिनित सामाद :

आओ बताऊं साथी कि मैं आज-कल क्या देख रहा हूँ
शायद आप भी वही देख रहे हो, जो मैं देख रहा हूँ।

अमन चैन के अपने देश को मैं जलता देख रहा हूँ
लोकतंत्र में देश चलाने वालों की मैं बर्बरता देख रहा हूँ।

बहुत दुःख की बात है कि प्रकृति को लुटता देख रहा हूँ
यहां अमीरों को और भी अमीर और गरीबों को मरता देख रहा हूँ।

यहाँ जात धर्म के नाम पर लोगों को बंटते देख रहा हूँ
अपने सामने इन्सानों को इन्सानों से ही कटते देख रहा हूँ।

यहाँ मजदूर, किसान, छात्र, बेटे-बेटियों को तड़प कर मरता देख रहा हूँ
पर नेता कहते अच्छे दिन आएंगे इसलिए अच्छे दिन का रास्ता देख रहा हूँ।

ज़ुल्म के खिलाफ लड़ाई करने वालों की लड़ाई देख रहा हूँ
एकता की बात करते पर उनमें भी विचारों की लड़ाई देख रहा हूँ।

हर वो ज़िन्दा इन्सान अन्याय के खिलाफ लड़ेगा और मैं उनको लड़ते देख रहा हूँ
आज तादाद भले ही कम है इनकी, पर धीरे धीरे इनकी तादाद बढ़ते देख रहा हूँ ।

मेरी लड़ाई तो एक शोषण विहीन समाज बनाने की है जिसका मैं ख़्वाब देख रहा हूँ
और ऐसी लड़ाई की सवालों पर मानवीय मूल्यों वाले संगठनों में अपना जवाब देख रहा हूँ।

मैं जानता हूँ कि यह नामुमकिन नहीं, बस मुश्किलों से भरा लक्ष्य है जिसका मैं ख़्वाब देख रहा हूँ
अब अंजाम जो भी हो मेरी संघर्ष का पर उम्मीद जग गई है जब हर एक साथियों में इंकलाब देख रहा हूँ।

बस यही सब आपको बताना चाहता था साथी कि मैं आजकल क्या देख रहा हूँ
और मुझे लगता है कि शायद आप भी वही देख रहे हो जो मैं देख रहा हूँ।

Author

  • जिनित / Jinit

    जिनित, ओडिशा के झारसुगड़ा ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह लोकमुक्ति संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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One response to “मैं देख रहा हूँ – एक कविता”

  1. Rabindra Kumar Nayak Avatar
    Rabindra Kumar Nayak

    में बस आपको ही देख रहा हुँ,
    दिल मैं बैठा आपके लगन को देख रहा हुँ l
    यूँ तो धुप मैं बादल का इंतजार है,
    पर धुप पर उगते हुए पेड़ के पत्ते को देख रहा हुँ l

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