विश्व आदिवासी दिवस पर एक सवाल हम आदिवासियों की तरफ से
अरविंद भगत:
आज पूरी दुनिया
मना रही है
आदिवासी दिवस
निकल रहे हैं जुलूस
बज रहे हैं ढोल-मंजीरे
खेले जा रहे हैं
नुक्कड़ नाटक
मन रहा है जश्न
हर चौक चौराहों पर।
हो रही है आज
वर्कशॉप, सेमिनार,
वार्ता, मंत्रणा, बातचीत
दुनिया भर में,
हो रही हैं चर्चाएं
आज हमारे अस्तित्व की
दुनिया को हमारे
ज्ञान, संस्कृति, बलिदान की
दुनिया को बचाने की
हमारे प्रयासों के मान की।
पर सवाल है ढेर सारे
आज हमारे आप सबसे
आज सवाल है उनसे
जिनकी किताबों में
हमारा ज़िक्र तक नहीं
एक सवाल है उनसे भी
जिनके लिए हम सिर्फ
ईंट भट्ठों, महानगरों में
बिकने लायक वस्तु हैं।
एक सवाल उनसे भी
जो सड़कों पर तो
हमारे लिए लड़ने
का ढोंग करते हैं
पर उनके ही घरों
में टूटती हैं
हमारी बेटियों, बहनों की हड्डियाँ
दगता है उनका सारा शरीर
गर्म सलाखों से
और लुटती है
अस्मिता।
आज एक सवाल उन गुरुओं
से भी है जो स्कूल
कॉलेजों, विश्विद्यालों में बात-बात पर
हमें कभी एकलव्य बनाते हैं
एक सवाल उनसे भी
जिनके लिए हम
अनगिनत बार उजड़ने के बाद भी
देश के विकास की बाधक मात्र हैं।
एक सवाल है उस भारत राज्य से भी
जिनकी नज़र में एक
स्कूल जाता नन्हा
हमारा कल का भविष्य
जंगल जाती हमारी बहन
रोज़गार की तलाश में
शहर जाते हम
सब बस नक्सली ही हैं।
एक सवाल दुनिया के है हर
एक उस इंसान से
जो कहते नहीं थकते
हमें मानवता और
पूरी दुनिया के रक्षक
पर जब उजड़ते हैं हम।
दुनिया भर में
तो कलम क्या
आत्मा तक मर जाती है उनकी
जब उनके मन में
एक सवाल तक
नहीं उठता
कि दुनिया भर
में क्यों उजड़े
जा रहे हैं हम
जबकि इस धरती के
पहले संतान हैं हम।

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