जिनित सामाद:
महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 (महात्मा गाँधी नरेगा या मनरेगा) कानून, ग्रामीण श्रमिकों के लिए एक ऐतिहासिक कानून है। यह एक मांग आधारित मज़दूरी रोजगार कार्यक्रम है और केंद्र से राज्यों को संसाधनों का अंतरण प्रत्येक राज्य की रोज़गार की मांग पर आधारित है। मनरेगा नीचे से ऊपर की ओर नियोजन, जन केंद्रित, मांग आधारित कार्यक्रम है, यह मज़दूरी रोज़गार की कानूनी गारंटी, भत्ते तथा मुआवजा दोनों की गारंटी प्रदान करती है। इसमें किए जाने वाले कार्यों की पसन्द और प्रकृति संबंधी निर्णय नियोजन, कार्यों का प्राथमिकता का निर्धारण आदि पल्लीसभा और ग्रामसभा की खुली बैठक में किया जाता है और उनकी अभिपुष्टि ग्राम पंचायत में होती है। इस कानून में सोशल ऑडिट एक नई विशिष्टता है जो क्रियान्वयन के प्रति जवाबदेही की भावना उत्पन्न करती है। इस कानून को और भी पारदर्शी बनाने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र की ओर से बीते कुछ सालों के अंदर कुछ बड़े बदलाव किए गए हैं।
पर इतने सारे बदलाव के बावजूद भी यह कानून केंद्र और राज्य के अवहेलना के कारण आज भी सही तरह से लागू नहीं हो पाया है, जिस वजह से इसके अंतर्गत बहुत ही कम श्रमिक काम करने के लिए आवेदन करते हैं।

अगर हम बीते 2023-24 वित्त वर्ष को देखें तो लइकेरा प्रखंड अंतर्गत कुल जॉब कार्ड 9966 हैं, जिसमें से लगभग 361 जॉब कार्ड परिवार ही 100 दिन के कार्य दिवस को पूरा किए हैं और वहीं दूसरी ओर बामरा प्रखंड अंतर्गत कुल जॉब कार्ड 17429 हैं, जिसमें से लगभग 262 जॉब कार्ड परिवार ही 100 दिन के कार्य दिवस को पूरा किए हैं। यह दोनों ही ज़िला आदिवासी बहुल क्षेत्र है जिसमें से बामरा प्रखंड पांचवी अनुसूचित क्षेत्र और लइकेरा प्रखंड जनजातीय उपयोजना क्षेत्र है। यहाँ पर करीब 90 प्रतिशत लोग कृषि और दिहाड़ी मज़दूरी करके अपने परिवारों के भरण-पोषण करते हैं। इसके बावजूद भी यहाँ मनरेगा पर लोगों की रुचि न होने के कारण को समझने के लिए संगठन के ओर से कई सारी मनरेगा जागरूक सभाओं का आयोजन किया गया और श्रमिकों के समस्याओं को ध्यान में रखते हुए श्रमिकों के आधिकार के लिए आंचलिक स्तर पर कई आंदोलन कर मान्यवर मुख्यमंत्री ओडिशा, जिलापाल सम्बलपुर और जिलापाल झारसुगुड़ा को कई बार मांग पत्र प्रदान किए गए हैं।
लोकमुक्ति संगठन की ओर से मनरेगा अंतर्गत निम्नलिखित श्रमिक समस्याओं और कुछ प्रमुख मांगों को लगातार सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों के ध्यानाकर्षण करते हुए दिया गया है। इसमें:-
- श्रमिकों के नाम पर पंजीकरण में समस्या (जो श्रमिक पहले से अपने पिता के जॉब कार्ड पर काम कर रहा हो तो उसे उसके विवाह पश्चात स्वतंत्र जॉब कार्ड बनाने में परेशानी)
- श्रमिकों को आधार कार्ड बेस्ड पेमेंट सिस्टम से समस्या (कई सारे श्रमिक आधार पर मोबाइल नंबर लिंक, आधार E-KYC, सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली PFMS (Public Financial Management system) की समस्या)
- मज़दूरी भुगतान में विलंब होने पर इस कानून के तहत मस्टर रोल बंद होने के 16वें दिन के बाद से अप्राप्त मज़दूरी के 0.05 प्रतिशत प्रति दिन की दर से मुआवजा व्यवस्था रहने के बाद भी कोई मुआवजा न मिलना अति निराशाजनक है।
- श्रमिकों के उपस्थिति दर्ज करने के लिए NMMS के वक्त नेटवर्क समस्या, GPS लोकेशन की समस्या
- एक जॉब कार्ड में 100 कार्य दिवस होने के बावजूद कभी-कभी किसी श्रमिकों के द्वारा कुछ दिनों के अनुपस्थिति पर जब दुबारा से काम की मांग की जाती है, तो उनके जॉब कार्ड पर excess demand या अत्यधिक काम की मांग दिखाने की समस्या जिससे एक श्रमिक 100 दिन का भी काम पूरा प्राप्त न कर पाना जैसी समस्या।
- श्रमिकों को कम से कम प्रति वित्तीय वर्ष में 200 दिन का काम प्रदान करने को सुनिश्चित करने की मांग।
- इस कानून अन्तर्गत यह स्पष्ट किया गया है कि इस काम पर दैनिक मज़दूरी कभी भी राज्य सरकार के द्वारा अकुशल श्रमिकों के निमित्त निर्धारित कि गई न्यूनतम मज़दूरी से कम नहीं होगी पर यह अभी तक लागू नहीं हुई (जैसे मनरेगा मजदूरी 1 अप्रेल से रुपया 254/- है पर राज्य सरकार के अकुशल श्रमिकों की मज़दूरी रुपया 450/- है)।
- मनरेगा में सामूहिक परियोजनाओं के साथ ही व्यक्तिगत परियोजनाओं पर भी ज्यादा गुरुत्व देने की आवश्यकता है।
- मनरेगा को कृषि कार्य के साथ जोड़ा जाए जिससे ग्रामीण जीवन में कृषि और आर्थिक स्तर में उन्नति आ सके।
- मनरेगा मेट को कुशल श्रमिक की मज़दूरी मिलने में अवहेलनाओं के कारण श्रमिक और मेट के विभिन्न कार्यों में सही कार्यान्वयन नहीं होना
- मनरेगा में श्रम और सामग्री के लिए 60:40 का अनुपात ग्राम पंचायत स्तर पर बनाए रखा जाता है जिसमें श्रम का मूल्य तो प्राप्त हो जाता है, पर सामग्री का मूल्य प्राप्त करने में कई-कई महीने बीत जाने पर भी नहीं मिल पाटा है। इसमें सुधार की आवश्यकता है।

वास्तव में आज के दौर में उपरोक्त समस्याएं और मांगे न केवल ओडिशा के इन दो ज़िलों के इन दो प्रखंडों के ही संदर्भ में वाजिब हैं, बल्कि हम अगर सही तरह से देखें तो ऐसी परिस्थितियां समूचे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल जाएंगी। आज के दौर में अकुशल और कुशल श्रमिकों को काम के लिए कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि हमारे पास एक मनरेगा जैसा रोज़गार गारंटी का कानून उपलब्ध है। अगर ऐसी परिस्थिति में सरकार की ओर से मनरेगा के लिए प्रतिवर्ष के निमित्त आवश्यक वित्तीय प्रबंधन कर दिया जाए एवं उपरोक्त समस्याओं का उचित सुधार कर दिया जाए, तो निश्चित रूप से इससे ग्रामीण जीवन जीविका में सकारात्मक परिवर्तन होना संभव है। पर क्या आज के इस दौर में इस रोज़गार गारंटी कानून को सरकारें सही तरह से लागू करने की गारंटी को सुनिश्चित कर पाएंगी? और यही आज के दौर में ग्रामीण मज़दूर वर्गों का सबसे बड़ा सवाल है।

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