लाएबा सिद्दीकी:
कोविड-19 महामारी के बाद भारत में बहुत सारे लोगों की नौकरियाँ चली गईं और कंपनियों में अनिश्चितता बढ़ गई। इसके साथ ही संस्थानों और कार्य के तरीकों में भी बड़े बदलाव आए। बहुत से काम ऑफ़लाइन से ऑनलाइन हो गए चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य सेवा, फैशन इंडस्ट्री, फूड ग्रॉसरी या अन्य सेवाएँ। इस बदलाव के कारण गिग वर्क (Gig Work) देश के श्रम बाज़ार का एक अहम हिस्सा बन गया है।
गिग अर्थव्यवस्था क्या है?
गिग अर्थव्यवस्था का मतलब है अल्पकालिक (कम समय के लिए होने वाला) और लचीले काम, जो आम तौर पर डिजिटल और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से होते हैं। जैसे: Swiggy, Zomato, Instamart, Zepto, Amazon Flex और कई फ्रीलांस सेवाएँ। यह न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती है, बल्कि महिलाओं को भी काम करने का अवसर देती है और उन्हें देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने का मौका मिलता है।
महिलाओं के लिए गिग वर्क क्यों महत्वपूर्ण है?
पहले, हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएँ घर से बाहर कदम नहीं रख सकती थीं। लेकिन समय और शिक्षा के बढ़ने के साथ महिलाएँ अब कामकाजी दुनिया में कदम रख रही हैं। गिग वर्क महिलाओं को लचीले काम का अवसर देता है। कोई भारी 10-5 की नौकरी नहीं, घर के काम और बच्चों के साथ संतुलन बनाना आसान। पढ़ी-लिखी महिलाएँ फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन और ग्राफिक्स डिज़ाइन जैसे काम घर बैठे कर सकती हैं, जिससे उन्हें सुविधाजनक माहौल और आर्थिक लाभ दोनों मिलते हैं। कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी गिग वर्क से अपने लिए और परिवार के लिए काम कर सकती हैं, जैसे ब्यूटी सर्विसेज़, सिलाई, लोकल डिलीवरी या घरेलू प्रबंधन से जुड़ा काम। इससे उन्हें स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का अनुभव मिलता है।
अनदेखे पहलू
गिग वर्क स्वतंत्र ठेका-आधारित काम होता है। इसमें कौन-सा काम और कितनी आय होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। कोई सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा, वेतन अवकाश या मातृत्व अवकाश नहीं। महिला गिग वर्कर्स अक्सर रात में काम करती हैं और सुरक्षा की कमी, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और शिकायत न कर पाने जैसी समस्याओं का सामना करती हैं। कई बार एल्गोरिद्म महिलाओं को कम भुगतान वाले काम की ओर ले जाता है, क्योंकि उन्हें इन डिजिटल तकनीकों की जानकारी नहीं होती। हाल ही में ग्वालियर में एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें महिलाओं के लिए योग का प्रचार करने वाली वॉल आर्ट को तोड़ा गया। इस घटना ने दिखाया कि महिलाएँ सार्वजनिक जगहों में भी सुरक्षित नहीं हैं।
डिजिटल डिवाइड की सीमा
स्वतंत्रता के 78 साल बाद भी भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 70% है, जबकि पुरुषों की 80% है। डिजिटल उपकरण जैसे स्मार्टफ़ोन और कंप्यूटर उपलब्ध कराना भी चुनौती है। राजस्थान के जालोर ज़िले में 15 गाँवों में पंचायत ने महिलाओं पर स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी, यह कहकर कि स्मार्टफ़ोन उन्हें “बर्बाद कर रहे हैं”। ऐसी सामाजिक मान्यताएँ महिलाओं को मुख्यधारा में आने से रोकती हैं।
हाल के विकास और नीति की खामियाँ
Code on Social Security, 2020 गिग और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स (डिलीवरी पार्टनर, राइड-हेलिंग ड्राइवर, फ्रीलांसर) को कानूनी मान्यता देता है। Swiggy, Zomato, Ola, Uber जैसी कंपनियों को सालाना टर्नओवर का 1-2% सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में योगदान करना होता है। बजट 2025-26 में सरकार ने ई-श्रम पोर्टल और आयुष्मान भारत योजना के तहत स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से लाभ देने की कोशिश की। माइक्रोक्रेडिट योजनाएँ गिग वर्कर्स और घरेलू कर्मचारियों को वित्तीय सहायता देती हैं। लेकिन अमल की कमी और निगरानी की कमज़ोरी के कारण लाभ सही तरीके से नहीं पहुँच पाते।
महिलाओं का आकर्षण गिग अर्थव्यवस्था के लिए
गिग अर्थव्यवस्था सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि विकास का मुद्दा भी है। देश का विकास तभी संभव है जब महिलाएँ भी श्रम शक्ति में शामिल हों। पुरुषों जितना ही महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण है। “The City Makers” किताब में भी बताया गया है कि महिलाएँ भारत का स्थायी भविष्य बना रही हैं। हाँ! महिलाएँ काम कर सकती हैं और नेतृत्व कर सकती हैं। मीडिया भी महिलाओं को शामिल करने वाली सामग्री बढ़ा रहा है। 2023 की फिल्म Kathal ने जाति और लिंग असमानताओं पर व्यंग्य किया और महिलाओं की प्रशासन में भागीदारी को दिखाया। इससे महिला सशक्तिकरण, सतत विकास लक्ष्य 5 और 8 (Gender Equality और Decent Work & Economic Growth) को भी बढ़ावा मिलता है। देश को यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाएँ सुरक्षित माहौल में काम करें, और उन्हें 1091 राष्ट्रीय हेल्पलाइन जैसी सुविधाओं की जानकारी हो। भारत जैसे डिजिटल-फर्स्ट देश में महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और समानता को सुनिश्चित करना ज़रूरी है, ताकि विकास समावेशी और टिकाऊ हो।
फोटो फीचर –इक्वल टाइम्स

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