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संघर्ष से जूझता भारत का आदिवासी – एक कविता

अंतरसिंग निगवाले:

मैं संघर्ष से नहीं डरता
मैं भारत का आदिवासी हूँ।
मैं प्रकृति की आंचल में रोज जीता हूँ।
अपनी सांस को टुकड़ों में भरता हूँ।

मैं इस देश की हवा-मिट्टी हूँ।
मैं भारत का आदिवासी हूँ।
मेरे समाज में विकास का ख्याल तक नहीं।
मैं भारत का आदिवासी हूँ।

कोतवाल हर रीत में जाफा (न्योता) लाता है।
मुझे जंगल से बेदखल करने बस एक लिफाफा आता है।
अपने समाज को हंसता देख मुझे कईं अरसा हो गया।
न जाने कोनसा काल आ गया।
अब तो चिड़िया चहकती भी नहीं
मैं संघर्ष से नहीं डरता।

हाँ, मैं नैतिक हूँ
अपने उजड़ते समाज के घर आंगन से नहीं डरता।
मैं भारत का आदिवासी हूँ,
मैं संघर्ष से नहीं डरता।

मगर में डरता हूँ। हाँ मैं भी डर जाता हूँ।
मैं डरता हूँ नफरत की आग से
हवा में फैली अफवाह से डरता हूँ।
मैं सैलाब-ए-गुमराह से डरता हूँ।

मुझे डर है मेरी सर ज़मी को मेरे अपने उजाड़ेंगे।
समाज के नाम पर ये खुद को सवारेंगे।
मैं मजबूर हूँ, कमजोर हूँ, मैं उनसे नहीं लड़ सकता।
मैं अपनो की तरफ धनुष-बाण लेकर नहीं बढ़ सकता।
मैं बस बोल सकता हूँ।

हजारों साल की ये सभ्यता को
गौर से देखो, सुनो आवाज तुम,
मन की जरा गहराई से सोचो,
तुम्हें क्या सच में लगता है, कोई अपना पराया है।

हुआ है पैदा इस देश में जो बाहर से आया है।
सभी का खून हे शामिल,
लगी कुर्बानियां सबकी,
हमने सभी की हड्डियों को जोड़कर भारत बनाया है।

तुम्हे गर प्यार है इससे तो दिल से अपनाओ,
कोई पूछे गर मजहब तो मानवता बतलाओ।
मैं भारत का आदिवासी हूँ
मैं संघर्ष से नहीं डरता।

Author

  • अंतरसिंग, मध्यप्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से एम.टेक. किया है। वर्तमान में वे देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की जनजातीय अध्ययनशाला में अध्ययनरत हैं।

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