अंजू मल्होत्रा:
मैं और मेरी तन्हाई,
अक्सर ये बातें करते हैं,
आप होते तो कैसा होता,
आप ये कहते, मैं वो कहती,
आप इस बात पर हंसते,
मैं उस बात पर रो देती।
तन्हाई की इस गहराई में,
कभी ख्यालों का समंदर बहता है,
कभी यादों की कश्ती चलती है।
कभी आपकी मुस्कान की रोशनी,
तो कभी जुदाई का साया घिरता है।
मैं और मेरी तन्हाई,
बस यही सोचते रहते हैं,
क्यों ये दुनिया ऐसी है,
निरंतर चलती रहती है,
यहाँ हर इंसान भागता दिखाई देता है।
क्यों मेरे लफ्ज़ों को समझने वाला,
अब मेरे पास नहीं है !
लेकिन फिर भी,
तन्हाई मेरी साथी बन जाती है,
जो मुझे समझती है,
मेरी हर ख़ामोशी,
हर दर्द को महसूस करती है।
क्योंकि, मैं और मेरी तन्हाई,
अब एक-दूसरे के अपने हो गए हैं।
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अंजू मल्होत्रा, दिल्ली की रहने वाली हैं और प्राइवेट फर्म में अकाउंट और एडमिन डिपार्टमेंट में पिछले 34 सालो से नौकरी कर रही हैं। लिखने का शौक उनको हमेशा से रहा है लेकिन समय की व्यस्तता के कारण वो पहले लिख न सकीं। अब ज़िंदगी में कुछ ऐसा दर्द मिला कि जिंदगी के अकेलेपन मे उपजे भावों को अपनी लेखनी से लिखने की छोटी से कोशिश कर रही हैं और ये अभी शुरुवात ही है।

