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ग्रीन हब सेंट्रल इंडिया फेस्टिवल में प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करती फिल्में

विकाश कुमार:

20-21 जुलाई को भोपाल के रविन्द्र भवन में ग्रीन हब सेंट्रल इंडिया फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। इस फेस्टिवल में ग्रीन हब इंडिया फेलोशिप कार्यक्रम के अंतर्गत तीसरे बैच के फेलोज की डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की प्रदर्शनी हुई। एक साल की फेलोशिप के दौरान मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के ग्रामीण और आदिवासी युवाओं को फिल्म और वीडियो बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी।

फेस्टिवल में मानव-वन्यजीव संघर्ष, जैविक खेती, पारंपरिक बीज बैंक, जलग्रहण प्रबंधन, शिक्षा, जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान आदि विषयों पर फिल्मों की प्रस्तुति एवं उन पर विस्तृत चर्चा हुई।

पहला दिन

फेस्टिवल के पहले दिन ग्रीन हब की फाउंडर रीता बनर्जी ने ग्रीन हब फेलोशिप के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि ग्रीन हब फेलोशिप की शुरुआत उत्तर पूर्वी भारत में हुई थी, उसके बाद 2021 में सेंट्रल इंडिया में इसकी शुरुआत हुई। अब हिमालयन क्षेत्रों के युवाओं के लिए भी फेलोशिप का विस्तार हुआ है। ग्रीन हब एक परिवार है जिसमें फेलोशिप के बाद भी फेलोज को हर तरह का सहयोग दिया जाता है। महाशक्ति सेवा केंद्र की अध्यक्ष पूजा आइयेंगर ने बताया कि फेलोशिप में आदिवासी एवं ग्रामीण युवाओं ने अपने समाज की कहानियों को बताने के लिए स्टोरीटेलिंग की विधि सीखी। उनके वक्तव्य के बाद फेस्टिवल का प्रोमो वीडियो लॉन्च किया गया।

फेस्टिवल का उद्घाटन फुलझरिया बाई द्वारा किया गया। फुलझरिया बाई बैगा आदिवासी समुदाय से आती हैं और मध्य प्रदेश में मिल्लेट की खेती की संरक्षक हैं। वह डिंडोरी ज़िले के गौरा कन्हारी गाँव में अपने सामुदायिक बीज बैंक के माध्यम से सैकड़ों बाजरा बीजों का संरक्षण करके देसी कृषि, जैव विविधता का संरक्षण कर रही हैं। अपने वक्तव्य में फुलझरिया बाई ने कहा कि “वह ना केवल अपने और अपने परिवार के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए बीज बचा रही है।” पहले दिन फुलझरिया बाई के प्रयासों पर ग्रीन हब फेलो शिबाली विश्वास द्वारा बनाई गई प्रभावशाली फिल्म “फुलझरिया” की प्रदर्शनी हुई। 

उद्घाटन समारोह के बाद की-नोट स्पीच में वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के अनीश अंधेरिया ने महाराष्ट्र के चंद्रपुर ज़िले में मानव-पशु संघर्ष को कम करने के प्रयासों पर विस्तार से बात रखी। भोपाल के आसपास लगभग 100 बाघ (जिनमें से अधिकांश प्रजनन कर रहे हैं) मौजूद हैं, लेकिन यहाँ पर मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं काफी कम हैं। भोपाल में बाघ संरक्षण में स्थानीय समुदाय, वन विभाग एवं लोकल वालंटियर्स की भूमिका पर डॉक्यूमेंट्री की प्रदर्शनी हुई। “अर्बन टाइगर – वालंटियर्स ऑफ भोपाल” फिल्म का निर्देशन आकाश आवेने और चौलेश चाचने ने किया था।

पहले दिन छत्तीसगढ़ की विवेका सिंह और मध्य प्रदेश के धार ज़िले की रेखा वास्केल द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रीवाइविंग कच्छ: वागड़ की रजत बूंदें’ की प्रदर्शनी हुई। फिल्म गुजरात के कच्छ क्षेत्र में पीने के पानी की समस्या पर ध्यान केंद्रित करती है। कच्छ क्षेत्र में पानी खारा है। ऐसे में वहाँ के स्थानीय कोली समुदाय ने पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली का उपयोग करके बारिश के पानी को इकट्ठा कर उसे पीने के लिए उपयोग करते हैं।

विख्यात वाइल्डलाइफ फिल्मकार निशांत कपूर ने भी अपनी फिल्ममेकिंग के रोचक सफर को बयान किया। वाइल्डलाइफ डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के संघर्षों एवं उसकी तकनीकी बारीकियों को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया।

हर फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद फेलोज ने फिल्म बनाने की प्रक्रिया के अपने अनुभवों को साझा किया। ऑडिएंस के सवालों का भी सुलझे तरीके से जवाब दिया। फेलोज के अलावा संरक्षण के मुद्दे पर काम कर रहे स्थानीय समुदाय एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के सदस्यों ने भी अपने अनुभव साझा किए।

दूसरा दिन

दूसरे दिन भी कई महत्वपूर्ण फिल्मों की प्रदर्शनी हुई। ‘जल ग्रहण क्षेत्र विकास’ झारखंड में आदिम आदिवासी समुदाय माल पहाड़िया द्वारा जल संरक्षण के प्रयासों को बयान करती है। फिल्म का निर्देशन किरण अदमाचे, रेवा सोलंकी और पूनम जवाड़े द्वारा किया गया था।

मुकेश महतो और आकाश आवेने की फिल्म “माहुल – एक सोच परिवर्तन” बंगाल के पुरुलिया ज़िले में स्थानीय समुदाय द्वारा महुआ को विभिन्न खाद्य पदार्थ के तौर पर बनाने के वैकल्पिक रोज़गार के शुरुआती प्रयास को दिखाती है। 

2021 में मध्य प्रदेश सरकार की नई नीति के कारण, आदिवासी स्वयं सहायता समूह (SHG) व्यावसायिक रूप से महुआ शराब का उत्पादन कर सकते हैं। इस समूह में पचास प्रतिशत महिलाएं होनी चाहिए। फेस्टिवल वेन्यू पर भी एक स्टॉल पर प्रदर्शनी के लिए महिला समूह द्वारा महुआ शराब के दो ब्रांड रखे गए थे। महुआ पर विख्यात एक्सपर्ट अनिरुद्ध मुखर्जी ने महुआ के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने नई नीति के तहत समुदाय में वैकल्पिक रोज़गार में सकारात्मक बदलावों पर प्रकाश डाला।

पारुल कुंकल और सिया कैथवास द्वारा झारसुगुड़ा, ओडिशा में समुदाय के बीच प्राकृतिक खेती प्रथाओं को बढ़ावा देने में सेवा संगठन की 30 साल की यात्रा पर फिल्म की भी प्रदर्शनी हुई।

आखरी दिन मशहूर वाइल्डलाइफ फिल्मकार आकांक्षा सूद की नई फिल्म की प्रदर्शनी हुई। इसके अलावा कर्नाटक की कंजर्वेशन एक्सपर्ट और फिल्मकार त्रिशाला अशोक ने भी भारत में वन्यजीव तस्करी की गंभीर समस्या का वर्णन किया। सोशल मीडिया में वन्यजीव के साथ क्रूरता के वीडियो बड़े स्तर पर अपलोड किए जा रहे हैं। उन्होंने वन्यजीव तस्करी रोकने के लिए आम नागरिकों के लिए सुझाव भी साझा किए।

फेस्टिवल के अंत में तीसरे बैच के फेलोज को सर्टिफिकेट प्रदान किया गया एवं नए चौथे बैच के फेलोज का परिचय सत्र भी हुआ। ग्रीन हब सेंट्रल इंडिया के एलुमनाई ने भी फेलोशिप के बाद अपनी यात्रा पर बात रखी। ज़्यादातर एलुमनाई फेलोशिप खत्म होने के बाद अपने क्षेत्र में वापस लौटकर समुदाय के साथ मिलकर प्रकृति एवं जैव विविधता संरक्षण में सक्रियता से काम कर रहे हैं। अपने क्षेत्र के ज्वलंत मुद्दों पर फिल्मों का भी निर्माण कर रहे हैं।

फेस्टिवल वेन्यू पर पोस्टर प्रदर्शनी एवं स्टॉल्स

फेस्टिवल के दौरान सांस्कृतिक गतिविधियां भी शामिल थीं। विभिन्न राज्यों के लोक गीत पेश किए गए। झारखंड के माल पहाड़िया समुदाय के लोक गीतकार चांदनी और एफसी ने भी अपने गीतों से समा बांधा।

फेस्टिवल वेन्यू पर फेलोज एवं आदिवासी महिला समूह द्वारा पारंपरिक आभूषण, कपड़े, खाद्य सामग्री जैसे मिलेट आदि के स्टॉल भी लगाए गए थे। तीसरे बैच के फेलोज द्वारा खींची गई तस्वीरों की फोटो प्रदर्शनी भी की गई थी।

Author

  • विकास युवा विचारक, स्वतंत्र पत्रकार एवं प्रगतिशील सिनेमा आंदोलन से जुड़े हैं, झारखंड के निवासी,हैं और फिलहाल विशाखापटनम में रहते है।

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