संजीव कुमार:
अगर रुकूँ तो जाऊं कहाँ, अगर रुकों तो जाओं कहाँ
मेरे यूँ रुक जाने से, यूँ थक बैठ जाने से
ना मुझे आराम मिलेगा, ना फिर कोई काम मिलेगा।
अगर मानो आज रुक भी जाऊँ, तो घर में सम्मान कहाँ।।
मैं तो एक नारी हूँ, सब माने अबला बेचारी हूँ।
मेरे नसीब में आराम कहाँ, मेरा कोई सम्मान कहाँ।
बस यूँहीं खुद से आरजू करती हूँ,
बिन बतायें सरे दर्द तनहा रखती हूँ ।।
अगर दिया जाए अधिकार मुझे,
तो मैं भी खुद को इंसान मानूँ।
बना दिया मुझको मशीन,
फिर कैसे खुद को सरिता जानूँ ।।
पीते है दाड़ी घर के मर्द
दिखाते जोर जैसे मैं हूँ, कोई पशु समान।
मेरी चीखे दीवारों में कैद, जैसे कोई बेबस जान।।
मार-पिट का यूँ सिलसिला चलता रहा.. चलता रहा।।
चुलेह की इन लपटों में, डब गयी मेरी आवाज,
ढूँढती हूँ, खुद को मैं कोनो के इन आशियानो में,
टूट गये सारे ख्वाब, जेसे पैदा हुए कोई वीराने में।।
अगर रुकूँ तो जाऊं कहाँ, अगर रुकों तो जाओं कहाँ……
घर से जंगल, जंगल से घर का सफर यूँ काट रही हूँ।
जिसको पूंजें उसे अपना सब देवता यूँ मान रही हूँ।॥
पेरों की इन बेड़ियों को मैं फिर तोड़ना चाहती।
एक बार इस खुले आसमान में बहुत बहुत ऊँचा उड़ना चाहती||
टूटा ख्वाबों का यह स्वपन,
हकीकत से फिर यूँ दस्ता हुई।
सामने एक अभद्र, आवाज आई
जिसने मुझे औरत होने की सजा सुनाई,
मुझे औरत होने की सजा सुनाई।।
अगर रुकूँ तो जाऊं कहाँ, अगर रुकों तो जाओं कहाँ
मेरे यूँ रुक जाने से, यूँ थक लके बैठ जाने से
ना मुझे आराम मिलेगा, ना फिर कोई काम मिलेगा।।

